" /> बाहरियों की आरती, कोरोना के पीछे ‘ईडी’ की मुसीबत लगानी है क्या?

बाहरियों की आरती, कोरोना के पीछे ‘ईडी’ की मुसीबत लगानी है क्या?

लगभग ४० वर्ष पहले एक ‘सी’ ग्रेड की फिल्म ‘हवस के शिकार’ आई थी। महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी जिस विकार को बढ़ाना चाहती है वो राजनीतिक ‘हवस के शिकार’ का ही एक प्रकार है। पूरा देश और हमारा महाराष्ट्र कोरोना वायरस से एक युद्ध के रूप में लड़ाई लड़ रहा है। जनता की जान से खेलनेवाले वायरस से इतनी बड़ी लड़ाई महाराष्ट्र के इतिहास में कभी नहीं हुई थी। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में जब पूरा मंत्रिमंडल बड़ी लड़ाई लड़ रहा है, ऐसे में भाजपा के कुछ बाहरी ‘अक्लमंदों’ ने टीका-टिप्पणी की आरती उतारी है। उद्धव ठाकरे को प्रशासनिक अनुभव नहीं है और महाराष्ट्र को फिर से अनुभवी देवेंद्र फडणवीस की आवश्यकता है। ये सब कौन कह रहा है। ये वे लोग कह रहे हैं जिन्होंने अपनी सारी जिंदगी कांग्रेस या राष्ट्रवादी कांग्रेस में बिताई और फिर ‘हवा’ पानी देखकर भाजपा में कूद गए। ऐसे मेंढक अगर फडणवीस के लिए ‘कोरोना मुहिम’ शुरू कर रहे होंगे तो महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पर ये वैâसी नौबत आन पड़ी है? क्या उनका अधोपतन हुआ है? ऐसा ही समझा जाएगा। ऐसे किराए के भक्तों का फडणवीस ने अगर ‘क्वारंटाइन’ नहीं किया तो उनकी बची-खुची इज्जत भी मिट्टी में मिल जाएगी। महाराष्ट्र पर संकट है, ये संकट कुछ राजनेताओं द्वारा निर्मित संकट नहीं है। ये महाराष्ट्र में आया हुआ संकट ‘आयातित’ है। उसका संक्रमण न बढ़े इसके लिए लड़ाई लड़नी होगी और वो बड़ी ताकत से लड़ी जा रही है। लोगों का साथ और समर्थन मिल रहा है तथा सरकार जनता के साथ खड़ी है। अगर ये सब देखकर विरोधी दल के पेट में दर्द हो रहा होगा तो भाजपा के ये भाड़ोत्री बगलबच्चे मानवता के शत्रु हैं। ये समय एक-दूसरे पर दोषारोपण करने और राजनीतिक खुराफात करने का नहीं बल्कि एक-दूसरे की मदद करके महाराष्ट्र और देश को ‘कोरोना’ से बचाने का समय है। प्रधानमंत्री ने भी देश से आह्वान किया है। उनका भी स्वागत है। मोदी को कोरोना से लड़ने का अनुभव कम है इसलिए फिर से अनुभवी डॉ. मनमोहन सिंह को बुलाओ, ऐसा कोई कहेगा तो क्या होगा? कोरोना छोड़िए देश की अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी है। तो फिर उसे सुधारने के लिए वित्त विशेषज्ञ डॉ. मनमोहन सिंह की देश को आवश्यकता है, ऐसा किसी को प्रतीत हुआ तो? ‘इस समय फडणवीस होने चाहिए थे’, ऐसा प्रचार करना मतलब लाशों पर राजनीति करने जैसा है। फडणवीस को राज्य चलाने का अनुभव है और उद्धव ठाकरे को है कि नहीं, ये महाराष्ट्र की जनता तय करेगी। भाजपा के बाहरियों को ये अधिकार किसने दिया? फडणवीस का अनुभव कोरेगाव-भीमा दंगों के दौरान क्या और वैâसे काम आया ये पूरे देश ने देखा। जब पूरा महाराष्ट्र दंगे में जल रहा था उस समय ‘अनुभव’ हाथ-पैर बटोरकर बैठा था। सांगली की बाढ़ में उस फंसे हुए नाटकीय अनुभव के दर्शन हुए। महाराष्ट्र पिछले ५ सालों में लगभग ५० साल पीछे चला गया और भक्तगणों का ढोल-मंजीरा लेकर केवल भजन शुरू था। नोटबंदी के कारण उद्यमी महाराष्ट्र को पीछे हटना पड़ा और अनुभवी फडणवीस नोटबंदी के समर्थन में शहनाई बजाते रहे। परिणामस्वरूप लाखों लोग बेरोजगार हो गए। सत्ता के बल पर उन्होंने विरोधी दल को तोड़ा। वे टूटे लोग भी विधानसभा चुनाव हार गए। शिवसेना को दिया हुआ वचन इन लोगों ने नहीं निभाया। आखिर तक यहां वहां करते रहे और ‘अनुभवी’ मुख्यमंत्री को महाराष्ट्र गंवाना पड़ा। उन्हें झूठ बोलने का अनुभव था ये सच है लेकिन महाराष्ट्र में झूठ नहीं चलता। मुख्यमंत्री ठाकरे की सरकार को सौ दिन पूरे हो गए हैं। ये सरकार गिर जाएगी और ज्यादा-से-ज्यादा ‘११’ दिन ही चलेगी, ऐसा बोलनेवाले मुंह छिपाकर घूम रहे हैं। मोदी और शाह जैसे बड़े अनुभवी नेतृत्व के बावजूद सीएए कानून पर देश की राजधानी जल उठी। १०० लोगों की जान चली गई। अन्य राज्यों में भी बखेड़ा खड़ा हुआ लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की मुस्तैदी के चलते मुंबई-महाराष्ट्र शांत रहा। महाविकास आघाड़ी सरकार में कोई कमी नहीं है और राज्य में भी कोई उठा-पटक नहीं है सब कुछ अच्छे से चल रहा है। फूट का कोरोना वायरस यहां कब का मर चुका है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे आज महाराष्ट्र को वायरस मुक्त करने के लिए मैदान में उतरे हैं। फडणवीस ने कुछ अलग क्या किया होता? फडणवीस सरकार ने इस स्वास्थ्य आपातकाल को भी राजनीतिक इवेंट बना दिया होता, और क्या? कोरोना वायरस को गटककर डकार दी होती या वायरस के पीछे सीबीआई, ईडी आदि लगाकर वायरस की बोलती बंद कर दी होती? महाराष्ट्र में सीबीआई, ईडी आदि से पैदा बदले का वायरस ठाकरे सरकार ने मार दिया है। उसी प्रकार से कोरोना वायरस भी मारा जाएगा। तब तक विरोधी दल नाक पर ‘मास्क’ और मुंह पर लगाम लगाए, यही ठीक है!