बाॅली बचन… खोपड़ी की खलबली!

ऐसा कम होता है पर होता है। एक ही विषय पर बनी दो फिल्में बॉक्स ऑफिस पर टकराती हैं। इसमें एक का नुकसान और एक का फायदा हो जाता है। कभी-कभी दोनों का नुकसान हो जाता है। अब इस बार एक ही विषय पर बनी दो फिल्में फिर से टकरार्इं, ‘उजड़ा चमन’ और ‘बाला’। दोनों का ही मुख्य किरदार गंजा है। यहां तक तो ठीक। पर गंजे सिर पर बाल उगाने के लिए फव्वारे से पानी डालनेवाला डिजाइन भी एक जैसे। मतलब विषय के साथ ही डिजाइन की भी कॉपी। ऐसे में खोपड़ी पर मची इस खलबली से दर्शकों का कनफ्यूज होना स्वाभाविक था।
‘उजड़ा चमन’ में सनी सिंह जबकि ‘बाला’ में आयुष्मान खुराना हैं। जहां तक आयुष्मान का सवाल है तो उनके बारे में एक चीज पक्की है कि वे कुछ अलग विषय उठाने के साथ ही सॉफ्ट व स्मूद स्क्रीनप्ले के मामले में पारंगत हैं। जो काम आमिर खान बड़े वैâनवास पर करते हैं, वही काम आयुष्मान खुराना छोटे स्केल पर करते हैं। अब चाहे ‘विकी डोनर’, ‘अंधाधुन’ हो या फिर ‘बधाई हो’, आयुष्मान ने अपनी एक पैâन फॉलोइंग तैयार कर ली है। सनी सिंह भी हल्के-फुल्के रोल के लिए जाने जाते हैं मगर अभिनय व एचिवमेंट कुछ खास नहीं है। खैर, गंजेपन के साथ ही एक और चीज दोनों फिल्मों में कॉमन है और वो हैं कल्लू मामा। सौरव शुक्ला दोनों ही फिल्मों में मौजूद हैं और उनकी सबसे खास बात है कि वे नेचुरल गंजे हैं। पर बात यहीं खत्म नहीं होती। सौरव के साथ एक खासियत और है, और वह है कि वे इसी विषय पर एक फिल्म कुछ बरस पहले बना चुके हैं। उस फिल्म का नाम था ‘घ्श् २४’। यह कोई अंग्रेजी फिल्म नहीं थी। इसमें रजत कपूर और रणवीर शोरे मौजूद थे। उस फिल्म में रजत गंजे होते हैं और एक लड़की के प्यार में रजत को अपना गंजापन बहुत चुभता है। वह अपनी उम्र के बारे में झूठ बोलता है और इस तरह फिल्म की हल्की-फुल्की कहानी आगे बढ़ती है। अब जब ‘बाला’ भी रिलीज हो गई और तो पता चला कि ‘उजड़ा चमन’ की लाइफटाइम कमाई (करीब ११ करोड़ रुपए) ‘बाला’ ने एक दिन में ही कमा डाले। ट्रेड के जानकारों का मानना है कि बॉक्स ऑफिस पर ‘बाला’ १०० करोड़ रुपए का आंकड़ा छू लेगी। अगर ऐसा होता है तो स्पष्ट है कि बाला की खोपड़ी में ज्यादा दम है।
पहले भी हो चुकी है टक्कर
अतीत की बात है। ६० के दशक में पर्दे पर झांसी की दो रानियां टकरा चुकी हैं। वर्ष २००२ की बात है, बॉलीवुड को अचानक शहीद भगत सिंह पर प्यार उमड़ पड़ा था। तब तो बॉबी देओल और अजय देवगन जैसे सितारे भगत सिंह के लिए बॉक्स ऑफिस पर शहीद होने के लिए तैयार हो गए थे। तीसरे भगत सिंह सोनू सूद थे। बॉक्स ऑफिस पर इतने भगत सिंह के टकराव से जाहिर है कि सारे निर्माताओं को नुकसान हुआ। सुभाष घई और सावन कुमार जैसे निर्माता भी अपने ‘खलनायक’ और ‘खलनायिका’ के साथ टकराए थे जिसमें खलनायिका बेदम साबित हुई थी। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि विषय सूझते नहीं है। कॉपी, चोरी, मारोलॉजी जैसे जुमले मेकर्स को प्रिय हैं। करोड़ों रुपए सितारों पर खर्च कर देनेवाले मेकर्स अच्छे लेखक और कहानी को प्रमोट करने में कंजूस होते हैं। तो अच्छी मौलिक कहानी कहां से आए!!