" /> बाढ़, महामारी से जूझती जनता में, ९० के दशक को दोहराने की कोशिश

बाढ़, महामारी से जूझती जनता में, ९० के दशक को दोहराने की कोशिश

सियासी सोच, लक्ष्य और लड़ाई को किनारे रख दें तो आज बुधवार की तिथि भूमण्डल के अनन्त कोटि आस्थावान लोगों के लिए जीवन की सबसे मंगलमत घड़ी है। पांच शताब्दी के कालखंड की प्रत्याशा और पांच दशक से ज्यादा वक्त की जद्दोजहद के बाद आज मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जन्मस्थान पर भव्य मंदिर की नींव पड़ रही है। गुजरे तीन दशक से मैंने अयोध्या में बहुत कुछ घटित होते नजदीक से देखा है और अपने निजी अनुभव से कह सकता हूं कि जिस तरह अयोध्या के राजकुल में जन्मे भगवान राम के काल में लोक विवाद का कहीं न कहीं लघु विवाद रहा है, उसी प्रकार उनके मंदिर को भी लेकर कुछ न कुछ चलता ही आ रहा है। सकारात्मक सोच वाले धर्मावलंबी भी मानते हैं कि भगवान राम ने स्वयं समय पर इसका निदान किया है और इसीलिए मानना चाहिए कि अब भी समाधान करेंगे ।
मुझे याद है कि अयोध्या से सटे बाराबंकी, गोंडा, बहराइच, बस्ती, बलरामपुर और श्रावस्ती जिलों के लोगों ने राम मंदिर आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी की थी। हर साल परिक्रमा से लेकर मेले ठेले तक अयोध्या में भारी भीड़ इन्हीं जिले के श्रद्धालुओं की होती है। अवध के ये जिले इन दिनों भीषण बाढ़ की चपेट में हैं। कोरोना संकट के चलते ज्यादातर जिलों में आवागमन पर प्रतिबंधों के साथ रोजी-रोटी का रोना है। इन हालात में तमाम सरकारी प्रयासों के बाद राम मंदिर के भूमि पूजन को लेकर जनता में पहले के जैसा उत्साह और उन्माद नहीं दिख रहा है। हालांकि प्रदेश की योगी सरकार ने महामारी के चलते लोगों से अयोध्या न आने व घरों में ही रहकर पूजा, भजन करने के साथ दीवाली मनाने की अपील की है। प्रदेश भर के मठों मंदिरों और पूजा स्थलों पर दीए जलाने दीवाली मनाने का आह्वान किया गया है।
इन सब आदेशों, निर्देशों, सुझावों, सलाहों के बाद भी लोगों में राम मंदिर को लेकर पहले के जैसा उन्माद नजर नहीं आ रहा है। बड़ी तादाद में मंदिर आंदोलन के लिए खपने और जान गंवाने वाले कारसेवकों व उनके परिजनों को भूमि पूजन कार्यक्रम में न बुलाने को लेकर अलबत्ता कुछ जगहों पर रोष जताया गया है। मंदिर आंदोलन के चर्चित चेहरों अडवाणी, जोशी, कल्याण सिंह की नामौजूदगी, उमा भारती की नाराजगी, अशोक सिंघल, विष्णुहरि डालमिया और महंत रामचंद्रदास परमहंस का गोलोकवासी हो जाना भी लोगों को खल रहा है। निसंदेह लोगों को शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे की कमी भी खूब खलेगी। शिवसेना और बालासाहेब ठाकरे ने ही राम जन्मभूमि आंदोलन को बल देने का काम किया था।
वहीं राम मंदिर निर्माण को उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों के लिए संजीवनी मान चुकी भाजपा ने जी-जान लगा कर एक बार फिर पहले जैसा माहौल बनाने की भरसक कोशिश की है। मुख्यमंत्री के राजधानी आवास में दीवाली मनाने, लखनऊ शहर के हर चौराहे को भगवा रंगने जैसी सरकारी कवायदें की जा रही हैं। समूचा सरकारी अमला कोरोना बाढ़ को छोड़ बीते दो हफ्तों से अयोध्या के लिए जुट चुका है।
अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन है। अजब संयोग कहिए या नियति, इस वक्त बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी अयोध्या से कोसों दूर बाबरी विध्वंस केस में अपनी बेगुनाही के सबूत जुटा रहे हैं। अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखी जा रही है, लेकिन मंदिर के आंदोलन की नींव जिन नेताओं ने रखी, वे कल वहां नहीं होंगे। अभी तक की जानकारी के मुताबिक आडवाणी, जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह के भी इस कार्यक्रम में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होने की संभावना नहीं है।
आडवाणी, जोशी ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया और उसे धार दी। लेकिन भूमि पूजन के लिए वे अयोध्या नहीं जाएंगे। दोनों नेता वीडियो कॉन्प्रâेंसिंग के जरिए समारोह में शामिल होंगे। बताया जा रहा है कि कोरोना संकट को देखते हुए उन्हें समारोह स्थल पर नहीं बुलाया गया है।
मंदिर निर्माण आंदोलन के लिए बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष आडवाणी ने १९९० में गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या तक के लिए रथ यात्रा शुरू की थी। लेकिन आडवाणी को बिहार के तत्कालीन सीएम लालू प्रसाद यादव ने समस्तीपुर जिले में गिरफ्तार करवा लिया था। जब पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर अपना पैâसला सुनाया था तब आडवाणी ने इसपर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि यह बड़ी बात है कि ईश्वर ने उन्हें इस आंदोलन से जुड़ने का मौका दिया। आडवाणी ही वे शख्स थे जिनकी अगुवाई में बीजेपी ने १९९२ के बाद से लगातार बढ़त बनाई। पार्टी ने केंद्र में दिवंगत पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई और आडवाणी उप प्रधानमंत्री बने। बाद में बीजेपी में मोदी युग आने के बाद आडवाणी धीरे-धीरे नेपथ्य में चले गए और फिलहाल पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में शामिल हैं।
राम मंदिर आंदोलन के वक्त मुरली मनोहर जोशी बीजेपी के दूसरे सबसे बड़े कद्दावर नेता थे। उन्होंने मंदिर आंदोलन के लिए योजनाएं बनाईं और उसे पूरी ताकत के साथ पार्टी के लिए जमीन पर उतारा भी। मंदिर आंदोलन के समय पीएम नरेंद्र मोदी और जोशी की जुगलबंदी की तस्वीरें आज भी दिखती हैं। लेकिन जोशी भी मंदिर के भूमि पूजन में सशरीर उपस्थित नहीं रहेंगे। २०१४ के बाद से जोशी धीरे-धीरे पार्टी में पर्दे के पीछे चले गए हैं। अभी जोशी भी पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में शामिल हैं।
राम मंदिर आंदोलन के दौरान उमा भारती बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। बाबरी विध्वंस की जांच के लिए बने लिब्राहन आयोग ने उमा की भूमिका को दोषपूर्ण पाया था। हालांकि बाद में वह केंद्र के वाजपेयी सरकार और मोदी के पहले कार्यकाल में मंत्री भी बनीं। उमा अयोध्या तो जा रही हैं लेकिन पार्टी में उनका रुतबा अब वैसा नहीं रहा है। उमा ने भूमि पूजन को लेकर ट्वीट कर कहा, `मैंने रामजन्मभूमि न्यास के अधिकारियों को सूचना दी है कि शिलान्यास के कार्यक्रम के मुहूर्त पर मैं अयोध्या में सरयू के किनारे पर रहूंगी।’ अयोध्या पहुंचने तक मेरी किसी संक्रमित व्यक्ति से मुलाकात हो सकती है। ऐसी स्थिति में जहां पीएम नरेंद्र मोदी और सैकड़ों लोग उपस्थित हों, मैं उस स्थान से दूर रहूंगी। पीएम मोदी और सभी समूह के चले जाने के बाद ही मैं रामलला के दर्शन करने जाऊंगी।’
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के सचिव डॉ. अनिल मिश्र कहते हैं कि कार्यक्रम में शामिल होने वालों की लिस्ट कम करके १७५ तक की गई है। इसमें ट्रस्ट के सदस्य, स्थानीय जनप्रतिनिधि और अयोध्या के संत-महंत मिला कर ५० लोग रहेंगे। मंदिर आंदोलन से जुड़े प्रमुख लोग और बाहर के संत-महात्माओं और अतिथियों और अन्य प्रमुख लोगों को मिला कर ५० लोगों को रखा गया है।
प्रयागराज के स्वामी वासुदेवानंद महाराज के भी कार्यक्रम में नहीं शामिल होने की बात सामने आई है। जानकारी के मुताबिक चौमासा नक्षत्र के कारण स्वामी वासुदेवानंद महाराज अपनी गद्दी नहीं छोड़ सकते। हालांकि ट्रस्ट ने इन्हें आमंत्रित किया था। राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य के. परासरण भी भूमि पूजन कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे। परासरण सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर के पैरोकार भी रहे। अधिक उम्र होने की वजह से परासरण चेन्नई से ही वीडियो कॉन्प्रâेंसिंग के जरिए भूमिपूजन में शामिल होंगे। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह राम मंदिर भूमि पूजन में शामिल नहीं हो पाएंगे। २ अगस्त को अमित शाह ने ट्वीट कर जानकारी दी कि शुरुआती लक्षणों के बाद जब उन्होंने टेस्ट करवाया तो कोरोना की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। फिलहाल, अमित शाह अस्पताल में इलाज करवा रहे हैं। मंदिर आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेनेवाले और बाबरी विध्वंस मामले में प्रमुख आरोपी रहे शिवसेना के तत्कालीन विधायक और उनके कारसेवक साथियों को भूमि पूजन में न बुलाए जाने से भी नाराजगी है। भाजपा, संघ विहिप को छोड़ तमाम छोटे बड़े धार्मिक संगठन अलग-अलग कारणों से भूमि पूजन कार्यक्रम को लेकर अपनी नाराजगी जता रहे हैं। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने राम को सबका बताते हुए और इस दिन यानी ५ अगस्त को सामाजिक समरसता व अखंडता के लिए यदगार दिवस के रुप में मनाने की अपील जारी की है। कुल मिलाकर राम मंदिर भूमि पूजन के कार्यक्रम को लेकर मीडिया, सरकार व सत्ताधारी दल को छोड़ आमजनों के बीच उत्साह नदारद दिखता है। हालांकि सरकार और भाजपा की कोशिश एक बार फिर से पहला जैसा माहौल कायम करने और उसी के सहारे कम से कम यूपी विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करने की होगी।