" /> बुद्धि से सर्वश्रेष्ठ बने गणेश

बुद्धि से सर्वश्रेष्ठ बने गणेश

भगवान गणेश को सभी देवी-देवताओं में प्रथम पूज्य माना गया है। उनके सर्वश्रेष्ठ होने के पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं। इन्हीं कहानी में एक इस प्रकार है। एक समय की बात है जब पार्वती-पुत्र कार्तिकेय सहित सभी देवताओं में यह बहस छिड़ गई कि ब्रह्मांड में सर्वश्रेष्ठ देव कौन है। अंतत: इस बहस का निष्कर्ष निकालने के लिए महादेव ने सभी देवों के बीच एक प्रतियोगिता रखी। प्रतियोगिता में कार्तिकेय, इंद्र देव, सूर्य देव, वायु देव, अग्नि देव और अन्य सभी देव भाग लेने को आतुर थे। तब ब्रह्मा देव और श्री विष्णु ने श्री गणेश को भी इस प्रतियोगिता में भाग लेने का आदेश दिया। प्रतियोगिता कुछ ऐसी थी कि जो भी देव, धरती-आकाश समेत पूर्ण ब्रह्मांड के ३ चक्कर लगा कर सबसे पहले कैलाश में प्रवेश करेगा, वही सर्वश्रेष्ठ देवता कहलाएगा। अब सभी देव अपने बड़े और शक्तिशाली वाहनों में सवार हो गए, जैसे कार्तिकेय ने मयूर की सवारी की, इंद्र देव अपने गज पर विराजे, वायु देव की तीव्रता से तो कोई भी अनजान नहीं था। ऐसी स्थिति में नन्हे गणेश सोच में पड़ गए कि उनका वाहन तो छोटा-सा मूषक है और वो तो इतनी तेज दौड़ भी नहीं पाएगा, अब वे इस प्रतियोगिता में कैसे भाग लें। यह सोचते-सोचते वे अपने माता–पिता शिव पार्वती के पास पहुंचे और उनके सामने दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गए। सभी देव अपना-अपना वाहन लेकर निकल चुके थे किंतु पुत्र गणेश ने कैलाश में ही अपने माता-पिता दोनों को सर्व शक्तिशाली व पूर्ण ब्रह्मांड मानकर उनके चारों ओर ही ३ चक्कर लगा लिए। सभी देवताओं में सबसे पहले पूर्ण ब्रह्मांड का चक्कर लगाकर यह साबित किया कि वे सर्वश्रेष्ठ देव हैं। इस कार्य से श्री गणेश ने अपनी बुद्धि, चतुराई और माता-पिता की ओर समर्पण का एक बड़ा उदाहरण दिया। यह देखकर मां पार्वती ने खुश होकर श्री गणेश को सर्वश्रेष्ठ पुत्र होने का भी वरदान दिया।

श्री हरि ने की थी गणेश की अराधना
भगवान गणेश जी से जुड़े किस्से कहानियों में एक किस्सा ऐसा भी मिलता है, जिसमें श्रीहरि विष्णु जी द्वारा भगवान होते हुए भी गणपति की पूर्ण विनम्रता और विधि के साथ पूजन करने का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि भगवान गणपति की नटखट शैतानियों से श्री विष्णु भी नहीं बच पाए।
एक बार श्री विष्णु ध्यान में लीन थे और उनका शंख कहीं खो गया और लंबे अरसे के बाद जब वे अपने तप से जागे तो यह देख अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपने शंख को हर जगह ढूंढ़ा, उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी किंतु उनका शंख कहीं भी नहीं मिला। फिर अचानक उन्हें कैलाश पर्वत से एक ध्वनि सुनाई दी। वह ध्वनि उनके शंख की थी, श्री विष्णु तुरंत कैलाश पर्वत जा पहुंचे और वहां जाकर देखा कि गणपति वह शंख बजा रहे थे। भगवान विष्णु द्वारा बहुत देर तक मांगने पर भी श्री गणेश ने शंख उन्हें नहीं दिया तब भगवान विष्णु ने महादेव से निवेदन किया कि वे गणपति से शंख मांगे किंतु गणेश भगवान ने महादेव की बात को भी अनसुना कर दिया। अब गणपति को मनाने के लिए श्री विष्णु ने गणपति का विधि-विधान से पूजन किया और साथ ही शंख वापस देने का अनुग्रह भी किया तब जाकर गणपति ने खुश होकर विष्णु जी का शंख वापस कर दिया।