" /> बुढ़ा वृक्ष बनेगा सहारा

बुढ़ा वृक्ष बनेगा सहारा

सरकारी कर्मचारियों की इमेज इतनी डैमेज है कि, धारणा बन गई कि ये नौकरी में भी और नौकरी के बाद भी पेंशन लेते हैं। सरकारी नौकरी का ये महत्‍वपूर्ण आकर्षण है। जबकि पेंशन वृद्धावस्‍था के भरण-पोषण हेतु होती है जैसे, ‘आओ बैठो, आज तुम्‍हारी पेंशन बांध देता हूं / ए दर्द सुन अब हर महीने बाद मिला कर मुझसे।’ जब मंत्रियों, सांसदों, विधायकों को पेंशन है तो निजी क्षेत्रों के काम करने वाले कर्मियों, पत्रकारों, लेखकों आदि की भी होनी चाहिए, दीपशिखा कहती हैं, ‘कोई निकालो इनका हल, बिना पेंशन वैâसे बितेगा कल?’ मतलब पेंशन न हो तो कितना टेंशन है पर हरियाणा सरकार ने ‘प्राण वायु देवता’ नाम से अनोखी पेंशन योजना शुरू की, जिसमें ७५ वर्ष के ऊपर उम्र वाले वृक्षों की देखभाल करने वालों को प्रति वृक्ष २,५०० पेंशन मिलेगी। अंबाला वन संरक्षण विभाग के हैरतजीत कौर ने ये हैरत भरी जानकारी दी कि उनके पास ५५ वृक्षों की सूची भी आ गई। इससे किसानों, भूमिहीन मजदूरों को लाभ होगा, वृक्षों के कटने पर रोक लगेगी, पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, हवा की गुणवत्‍ता में सुधार होगा। किसानों को पेंशन तो मिलती नहीं पर ये बूढ़े मूक वृक्ष उनका सहारा बनेंगे। वीर मलीहाबादी लिखते हैं, ‘मुहब्‍बत की जमा पूंजी तो एक झटके में लुट गई, अब यादों की पेंशन है, उम्‍मीदों का सहारा है। इस योजना ने उम्‍मीद की किरण दिखाई है।
श्राद्ध नहीं, श्रद्धा पक्ष
सितबंर में पूरे देश में केंद्रीय सरकारी क्षेत्र हिंदी को झाड़-पोंछकर चमकाएंगे। उपहास करने वाले ‘सिग्‍नल’ को ‘आवक जावक नियंत्रक यंत्र’ कहकर खिल्‍ली उड़ाते हुए इसे हिंदी का श्राद्ध पक्ष कहेंगे पर ये श्रद्धा पक्ष है। वे चाहें तो ‘सिग्‍नल’ को ‘संकेतक’ भी कह सकते हैं। देश के नीति-निर्धारकों यानी हिंदुस्थानी प्रशासनिक सेवा जैसे महत्‍वपूर्ण पदों की भर्ती करने वाले संस्‍थान ‘संघ लोक सेवा आयोग’ में भाषाई अस्मिता को लेकर विश्‍व का पहला और लंबा धरना चला कि भर्ती परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्‍म हो पर आजादी के ७५ वें अमृत महोत्‍सव के बाद भी ये काम और हिंदी को हम राष्‍ट्रभाषा नहीं बना पाए। महाराष्‍ट्र के मराठी और स्‍कूली शिक्षा विभाग ने आदेश जारी करके केंद्रीय बोर्ड के स्कूलों में मराठी के विषयों को पढ़ाना जरूरी कर दिया। उल्‍लंघन होने पर संबंधित व्‍यक्ति-स्‍कूल पर एक लाख रुपए का जुर्माना होगा। हिंदुस्थानी प्रौद्योगिकी संस्‍थान व काशी हिंदू विवि के निदेशक प्रो. प्रमोद जैन ने बताया कि यह देश का पहला ऐसा इंजीनियरिंग विवि होगा जहां बीटेक की पढ़ाई हिंदी में होगी। नई शिक्षा नीति में शिक्षा का माध्‍यम मातृभाषा में होना संबंधित क्षेत्र की भाषा का सम्‍मान होगा। उपमहाप्रबंधक (राभा) विपिन पवार से दूरभाष पर बात की तो कोरोना की तरह संदेश आया-मध्‍य रेल राजभाषा पखवाड़ा मना रहा है। हम अपना अधिक से अधिक काम हिंदी में करें और क्षेत्रीय भाषा तथा अंग्रेजी का प्रयोग नियमानुसार करें। इसमें क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी को भी उचित मान दिया है। भाषाओं से वैâसी ईर्ष्या? सभी ज्ञान का भंडार हैं और उत्‍तम हैं पर हिंदी सर्वोत्तम है। यदि सभी बैंक, उपक्रम, केंद्रीय कार्यालय आदि अपने दूरभाष में मध्‍य रेल जैसे संदेश का प्रावधान करें तो सितबंर में ‘हिंदी पखवाड़ा’ सार्थक होगा। तरंगों के साथ हिंदी भी झूमेगी और वातावरण हिंदीमय होगा पर इसे दिल से करें, मंत्रालय के आदेश से नहीं।
महिलाओं की परीक्षा
बचपन में (जब हम छोटे थे तो) परीक्षा के नाम से रूह कांपती थी। तब स्‍कूलों में पढ़ाने की परंपरा थी और परीक्षा देने का रिवाज था। जब हिंदुस्थान में परीक्षा न देकर परीक्षा पास के मामले में कोई क्रांति‍ नहीं हुई तो कोरोना ने आगे आकर ये क्रांति की और बिना परीक्षा के लोगबाग शांति से पास हुए पर हिंदुस्‍थान में महिलाएं सदा परीक्षा देती आई हैं। सीता मां को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। सती अनुसुइया की परीक्षा लेने त्रिमूर्ति ब्रह्मा,विष्‍णु, महेश ब्राह्मणवेश में अत्रि आश्रम पहुंचे थे। मैत्रेयी ने पति के साथ वनों में भटककर, संघर्ष के बाद महिलाओं का मान बढ़ाया। द्रौपदी सहित रानी लक्ष्‍मीबाई, रजिया सुल्‍तान, रानी दुर्गावती (एक लंबी सूची है) को परीक्षा देनी पड़ी। सावित्री बाई फुले को महिलाओं को पढ़ाने के लिए स्कूल खोलने हेतु इस प्रथम महिला शिक्षिका को कड़ी परीक्षा के बाद सफलता मिली। अफगान में तालिबानी महिलाएं परीक्षा दे रही हैं। हिंदुस्थानी तालिबानी भी महिलाओं की काबिलियत पर प्रश्‍न उठाते हैं। संविधान में स्‍त्री-पुरुषों को समान हक है। अच्‍छी खबर ये है कि अब राष्‍ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) की परीक्षा महिलाएं दे सकती हैं, जिसके बाद उनकी भर्ती हो सकेगी। अब हिंदुस्थानी फौजों में महिलाओं को बराबरी का अधिकार के साथ शौर्य प्रदर्शन के अवसर और रक्षा सेनाओं में उनकी नौकरी की संभावनाएं बढ़ेंगी। बिजनौर के कवि हितेश शर्मा लिखते हैं, ‘बेटियां, भारत देश की विश्‍वास हैं / हर परीक्षा में होती सदा पास हैं / एक बेटी बनी राष्‍ट्रपति देश की / अपनी प्रतिभाओं का पूर्ण आभास है।’ ये आभास सच हो रहा है।
चरैवेति-चरैवेति चलते रहो
आज हर कोई दौड़ रहा है, विशेषकर युवा पीढ़ी। पूछो तो पसीना पोंछते हुए कहते हैं, ‘पता नहीं कहां जाना है? हम तो बस, बेतहाशा दौड़ रहे हैं, मंजिल का पता नहीं है। दौड़ने में एतराज नहीं है पर सड़कों की तासीर और गड्ढों के मिजाज को देखकर दौड़ें। गड्ढे सड़कों का सिंदूर हैं, बरसात में वे थोड़े उग्र हो जाते हैं और सड़कें संकोच में संकुचित हो जाती हैं। गड्ढों के मामले में हम आत्‍मनिर्भर हैं, मजाल की कोई देश आगे निकल जाए। जो सड़कों की इस रचनात्‍मक प्रतिभा से वाकिफ हैं वे हवाई जहाज से दौड़ते हैं। जैसे किसान इधर-उधर दौड़ रहे हैं, सरकार रास्‍ता रोक रही है। हमारे यहां तो चलते रहो, चलते रहो कहा गया है, रुकना मौत के समान है। काबुल में मद्यपान करते हुए जॉडी ब्रैगर, गॉल्‍ड और गेबे तीन दोस्‍तों में शर्त लगी कि वे नक्‍शे पर जहां ऊंगली रखेंगे, वहां तक वे दौड़ेंगे। एक ने ऊंगली रखी और तेज धावक की तरह वे दौड़ पड़े। तीनों दुर्गम पहाड़ी इलाकों से होते हुए ४०० किमी दौड़े कि पड़ोसी देश ताजिकिस्‍तान की बारटांग घाटी पहुंच गए जो दुनिया का दूरस्‍थ निर्जन क्षेत्र है और ७ दिनों में कुरकुल झील पहुंच गए। इस अजीब रेस की सोर्सी फिल्‍म्‍स ने डाक्‍युमेंट्री भी बनाई पर ऐसी दौड़ से क्‍या फायदा जिस (जगह) को हम जानते नहीं! राजनसिंह कहते हैं कि तेरे गिरने में हार नहीं/ तू इंसान है, अवतार नहीं, गिर, उठ, चल, दौड़, भाग..क्‍योंकि जीवन संक्षिप्‍त है, इसका कोई सार नहीं। बस,दौड़ सार्थक हो!

(लेखक सुप्रसिद्ध व्‍यंग्‍यकार, मंच संचालक और स्‍तंभकार हैं)