बेघरों की काली दिवाली

दिवाली को खुशियों के त्योहार के तौर पर माना जाता है। ज्यादातर लोग यथाशक्ति इस त्योहार को खुशी-खुशी मनाते हैं तो वहीं समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े कुछ ऐसे भी लोग हैं जो फुटपाथ पर धंधा लगाते हैं और खरीददार द्वारा खरीदे गए उनके सामानों की बिक्री के बाद वे दिवाली मना पाते हैं। मुंबई में ऐसे सैकड़ों की संख्या में लोग मौजूद हैं, जो फुटपाथ पर छोटी-मोटी दुकान लगाते हैं, इनमें हार-फूल-तोरण बेचनेवाले भी शामिल हैं। इस बार तोरण बेचनेवालों की दिवाली काली साबित हुई है क्योंकि अपेक्षा के अनुरूप ग्राहक नहीं हैं।
राधा लक्ष्मण राजपूत लगभग ४० साल से चर्नी रोड स्टेशन के बाहर फुटपाथ पर रहती है। खुले आसमान के नीचे अपनी और अपने परिवार के साथ जीविका चलानेवाली राधा का कहना है कि खुद के पास पैसा नहीं है तो कुलाबा में फूल की दुकान पर मजदूरी पर काम कर रहे हैं। हम दुनिया का भला करते हैं और हमारा भला नहीं हो रहा है। फूल बेचकर हम दुनिया का घर सजाते हैं लेकिन हम अपने फुटपाथ के घर में दीया नहीं जला पाते हैं। राधा दीदी बताती हैं कि जब भी कोई त्योहार आता है तो हमारी उम्मीदें बढ़ जाती हैं। इस बार दिवाली से काफी उम्मीद थी लेकिन महंगाई होने के कारण व्यापार नहीं है। दिवाली पर महीनभर पहले से व्यापार अच्छा होता था लेकिन इस बार नहीं है। सिर्फ दो दिन से धंधे में कुछ तेजी दिखी है बाकी के दिन ग्राहक के लाले पड़े थे, वहीं जे. जे. अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर रहनेवाली शीला पवार ने बताया कि इस बार की दिवाली कड़की में जा रही है। पैसा नहीं है। व्यापार के लिए निवेश (पैसा) नहीं है तो कहां से दिवाली में धंधा लगाएं। इस बार पैसा नहीं होने के कारण फराल नहीं बना रहे हैं केवल सादी-सिंपल दिवाली फुटपाथ पर रंगोली और दीया जलाकर मना रहे हैं। महाराष्ट्र राज्य बेघर अधिकार अभियान के राज्य संयोजक बृजेश आर्य ने बताया कि बेघर लोग भी दिवाली मनाते हैं लेकिन इस महंगाई के वक्त धूमधाम से मनाना बहुत ही कठिन है उम्मीद करते है कि महाराष्ट्र सरकार और मनपा प्रशासन आनेवाले साल में बेघर साथियों को शेल्टरहोम मिल जाएगा तो अगली दिवाली खूब धूमधाम से मानेगी।