बेचारा स्टेशन मास्टर

बिजनौर के पास मुरशदपुर रेलवे स्टेशन का स्टेशन मास्टर ऑन ड्यूटी शराब पीकर नशे में धुत हो गया और वहीं सो गया। फलस्वरूप अनेक ट्रेनें सिग्नल और लाइन क्लीयर का सिग्नल न मिलने से जहां-तहां थम गर्इं। जब उच्चाधिकारियों ने जांच के लिए मौके पर टीम भेजी तो स्टेशन मास्टर अंटागाफिल सोए पड़े मिले। उन्हें उनका नशा उतरने के पहले निलंबित कर दिया गया। मुझे उस बेचारे स्टेशन मास्टर से पूरी सहानुभूति है। वह कितने तरह के दबाव झेलता हुआ नौकरी कर रहा था पता नहीं! हो सकता है, वह अपना तबादला बिजनौर कराना चाहता हो और लालफीताशाही के कारण उसका तबादला न हो पा रहा हो या हो सकता है उसका सुबह घर में बीवी से झगड़ा हो गया हो और वह बिना चाय नाश्ते के ही घर से निकल पड़ा हो। ऐसा भी हो सकता है कि वह गरीब अपनी सास या सालों द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा हो। हमें विज्ञान के बड़े विद्वानों ने समय -समय पर बताया है कि हर क्रिया की कोई प्रतिक्रिया जरूर होती है यहां हो सकता है कि स्टेशन मास्टर की हरकत एक प्रतिक्रिया हो। जब कोई व्यक्ति परिस्थितियों से हार जाता है और उनका मुकाबला कर पाने में असमर्थ हो जाता है, तब वह पलायन का रास्ता चुनता है। यह पलायन आंशिक भी हो सकता है और पूर्ण भी। शराब पीकर खुद को भुला देने की कोशिश आंशिक पलायन है और गले में रस्सी बांधकर पेड़ से लटक जाना संपूर्ण पलायन है। अगर यह स्टेशन मास्टर जहर पीकर सो गया होता तो उसके परिवार को मुआवजा देने की मांग उठने लगती लेकिन चूंकि वह शराब पीकर सोया था और उसके मरने की कोई संभावना नहीं थी। अत: उसे निलंबित करके तिल-तिल मरने का इंतजाम कर दिया गया। स्टेशन मास्टर चाहता तो कुछ और उत्पात कर सकता था लेकिन वह अत्यंत सभ्य शराबियों की तरह चुपचाप सो गया। कुछ ट्रेनें थोड़े समय उसी कारण खड़ी रह गर्इं, जो उनकी नियति भी है। अगर वे उसकी शराबखोरी के कारण न रुकी होतीं तो किसी अन्य कारण से रुकतीं। अगर ट्रेनें बिना रुके गंतव्य पर पहुंच जाएं तो यात्रियों को किसी षड्यंत्र की बू आने लगती है। मेरे खयाल से शराब पीकर गलत सिग्नल न देने और ट्रेनों की टक्कर रोककर हजारों यात्रियों की जान बचाने की एवज में स्टेशन मास्टर का सत्कार किया जाना चाहिए।