" /> बेटी हूं

बेटी हूं

ना जख्म दे मुझे ऐ मर्द जात,
मेरे बिन तेरी क्या औकात ?
बेटी हूं अभिशाप नहीं,
औरत हूं कोई पाप नहीं,
अरे! तू भूला…..
मैं दुर्गा हूं,
मैं काली हूं,
मैं ही तो गंगा कहलाई।
मां मुझमें है, पुत्री भी मैं हूं,
पत्नी रूप भी मुझमें समाई।
जीवन देने की शक्ति मुझमें,
यह दुनिया है मेरी बसाई।
प्यार भरा है सागर सा मन में,
तुझको मेरी कदर ना आई।
चीर हरण मेरा तू करता है,
मेरा जन्मा मुझी को डंसता,
ना कर मुझे मजबूर,
ना समझ मुझे तू अबला।
जिस दिन रूद्र रूप ले लूंगी
नामुमकिन होगा तेरा बचना।
ना जख्म दे मुझे ऐ मर्द जात,
मेरे बिन तेरी क्या औकात?
-संगीता पांडेय `हिंदुस्थानी’