बेतुके फतवों का मकड़जाल

साड़ी, सिंदूर और मंगलसूत्र पहनकर संसद में शपथ लेनेवाली तृणमूल कांग्रेस की सांसद नुसरत जहां के खिलाफ बयानों और फतवों का दौर थमा नहीं है। वे अब भी कट्टर मुस्लिम धर्मगुरुओं के निशाने पर हैं। ये बात समझ से परे है कि जब उन्हें इस्लाम से खारिज कर ही दिया है तो मौलवी हजरात उन पर चर्चा ही क्यों कर रहे हैं? मौलवी हजरात का कहना है कि किसी भी मुस्लिम पुरुष अथवा महिला की शादी मुस्लिम से होनी चाहिए। नुसरत एक अभिनेत्री हैं और अब तक यही देखा गया है कि फिल्मों या मनोरंजन के अन्य क्षेत्रों से जुड़े कलाकार, अभिनेता-अभिनेत्री धर्म की फिक्र न करते हुए जो उनका मन करता है, वही करते हैं। नुसरत ने इसी का प्रदर्शन संसद में किया तो बावेला मचा दिया गया। सबसे पहले देवबंद से ही फतवा आया कि नुसरत को इस्लाम से खारिज किया जाता है। न किसी मुस्लिम संगठन ने, न नुसरत के किसी रिश्तेदार ने, न ही किसी अन्य ने ऐसा फतवा मांगा था लेकिन मुस्लिम समाज को कटघरे में खड़ा करनेवालों ने आखिर उक्त फतवे को इस कदर चर्चित कर दिया कि पूरा देश उसी चर्चा में शामिल हो गया। हालांकि इस्लाम में फतवा इस्लामी कानूनों से जुड़े मसले पर किसी काबिल मुस्लिम विद्वान या मुफ्ती द्वारा दिया गया प्रामाणिक कानूनी मत होता है, जिसे मानने की बाध्यता नहीं होती है।
सिंदूर को लेकर इससे पहले अक्टूबर में देवबंद से ही एक फतवा आया था, जिसमें पत्नी की मांग में सिंदूर भरने और पति के भगवा रंग का कपड़ा पहनने पर इस्लाम से खारिज करने को गलत बताया गया था। मामला गाजियाबाद के आसिफ अली का है जिनको भगवा रंग बहुत पसंद है। लिहाजा वह हर साल ईद की नमाज भगवा रंग का कुर्ता पायजामा पहनकर पढ़ते आए हैं। ईद के अलावा वह शादी समारोह और अन्य कार्यक्रमों में भी भगवा रंग के कपड़े ही पहनकर जाते रहे हैं। आसिफ के अनुसार उनके अधिकांश मित्र हिंदू समाज से हैं और वह एक दूसरे से धार्मिक भेदभाव नहीं रखते। लेकिन उन्हीं के अपने कुछ लोग उनके लगातार भगवा रंग को इस्तेमाल करते रहने को गैर इस्लामिक बताते हुए विरोध करते थे। वहीं, आसिफ की पत्नी भी विवाह के बाद से ही मांग में सिंदूर भरती आई हैं। कुछ लोगों ने मांग में सिंदूर भरने और भगवा कपड़े पहनने की शिकायत स्थानीय उलेमा से कर दी। उन जनाब ने दंपत्ति को इस्लाम विरोधी घोषित कर उन्हें इस्लाम से खारिज कर दिया। इस आदेश के बाद धर्मभीरु आसिफ अली और उनकी पत्नी को इस्लाम से खारिज होने का कई महीनों तक दंश झेलना पड़ा। यहां तक कि उनके अपने परिजनों ने भी उनसे किनारा कर लिया। लोगों ने बात करना तो दूर देखना तक बंद कर दिया। जब और कुछ नहीं सूझा तो इस परेशान दंपत्ति ने अधिकृत फतवे के लिए सहारनपुर के देवबंद स्थित देश के प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्थान दारूल उलूम से लिखित फतवा मंगाया। आसिफ के सवाल के जवाब में दारूल उलूम ने फतवा जारी कर बताया कि मांग में सिंदूर भरने से कोई भी मुस्लिम महिला इस्लाम धर्म से खारिज नहीं हो सकती और यदि भगवा रंग के कपड़े पाक-साफ हैं तो उन्हें पहनकर नमाज अदा करने की भी गुंजाइश है। यह फतवा दारूल उलूम के मुफ्ती फखरूल इस्लाम ने जारी किया यानी सिंदूर को लेकर मुस्लिम समाज के मुफ्ती हजरात भी एकमत नहीं हैं। यह सब केवल इसलिए है क्योंकि हर किसी ने इस्लाम की अपनी व्याख्या करने का ठेका जो ले रखा है।
दरअसल फतवा देने का अधिकार भी हर किसी को नहीं है। इस्लाम से जुड़े किसी मसले-मसायल पर कुरान और हदीस की रोशनी में जो सलाह दी जाए, उसे ही फतवा कहा जाता है। फतवा कोई मुफ्ती ही जारी कर सकता है। मुफ्ती बनने के लिए शरिया कानून, कुरआन और हदीस का गहन अध्ययन और सनद जरूरी है। रात-दिन अखबारों, टीवी चैनलों और खबरों में छाए रहनेवाले कथित उलेमा के पास फतवा जारी करने का कोई अधिकार नहीं है लेकिन अमूमन यही ‘पेड उलेमा’ अपनी जुबान से टीवी समाचारों की बहस में और अखबारों में ऐसे बेतुके बयान दे जाते हैं जिसे कम अक्ल एंकर और दर्शक फतवा मानकर मुस्लिम समाज की खिल्ली उड़ाने से बाज नहीं आते जबकि सच्चाई यह है कि हमारे मुल्क में इस्लामी कानून को लागू करवाने के लिए किसी तरह की कोई व्यवस्था नहीं है इसलिए फतवे बेमानी है, ज्यादा से ज्यादा उसे किसी मुफ्ती की राय कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो शरिया कानून से चलनेवाले देशों में ही फतवे का लोगों की जिंदगी पर कोई असर हो सकता है क्योंकि वहां इसे कानूनन लागू कराया जा सकता है। फतवे मंगाने का एक कारण यह भी है कि सही इस्लाम की शिक्षा के अभाव में कई मुसलमानों को पता नहीं होता कि इस्लाम उन्हें क्या करने या क्या न करने को कहता है? इसलिए वे अपने सवालों का जवाब पाने के लिए इस्लामी विद्वानों या मुफ्तियों की शरण में जाते हैं। मुफ्ती उन्हें जवाब और सलाह देते हैं, जिसे शब्दसंग्रह में फतवा के नाम से दर्ज कर लिया गया है। कई बार ऐसे फतवे दिए जाते हैं जिन्हें बर्बर, अमानवीय और इस्लाम को बदनाम करनेवाला कहा जा सकता है। ऐसे फतवे मुसलमानों के लिए लोगों के मन में नकारात्मक भाव पैदा करते हैं।
पैगंबर मोहम्मद साहब ने जिस तरह से अपना जीवन व्यतीत किया उसकी जो प्रामाणिक मिसालें हैं, उन्हें हदीस कहते हैं। पवित्र कुरआन के बाद हदीसों की बड़ी मान्यता है खासकर ‘बुखारी शरीफ’ को सबसे प्रामाणिक पुस्तक माना जाता है, जिन्हें मुस्लिम विद्वान मोहम्मद अल-बुखारी ने एकत्रित किया था। इस हदीस का संग्रह ईसवी सन् ८४६/ यानी २३२ हिजरी के आस-पास पूरा हुआ था अर्थात पैगंबर मोहम्मद साहब के शरीर त्याग करने के लगभग सवा दो सौ साल बाद। लंबे अंतराल के कारण कुरआन और हदीस में विरोधाभास पाया जा सकता है इसलिए इन हदीसों के संकलनकर्ता मोहम्मद अल-बुखारी ने खुद कहा है कि अगर कुरआन और हदीस के बीच कहीं भी विरोधाभास पाया जाता है तो कुरआन को प्राथमिकता दें न कि हदीस को। लेकिन दुर्भाग्य यह भी है कि अक्सर उलेमा और आम मुसलमान कुरआन से ज्यादा हदीसों और मुस्लिम धर्मगुरुओं के बयानों को ज्यादा तरजीह देते हैं जबकि देखा यह भी गया है कि विश्व भर के मुसलमानों ने हेब्रू बाइबिल की कथाओं, यहूदी संस्कृति की कई रस्म-रिवाजों तथा अंधविश्वासों को भी अपनाया है, जिसे अक्सर मुफ्ती साहेबान फतवा बताकर पेश कर देते हैं।
मुस्लिम समाज की ऐसी ही दकियानूसी सोच और कट्टरपंथी विचारधारा के कारण ही अधिकतर गैरमुस्लिमों में बहुमत ऐसे लोगों का है, जो यह मानते हैं कि कट्टरपंथी, जुल्मी, इस्लाम की आलोचना करनेवालों का हत्यारा, औरतों को जबरन बुर्का पहनाने वाला, और बेतुके फतवे जारी करनेवाला ही मुसलमान होता है। अगर मुस्लिम समाज को सचमुच तरक्की करनी है तो धर्म को निजी आस्था के दायरे में सीमित करना होगा। यह तय करना होगा कि फतवे की आड़ में किसी को भी किसी की जिंदगी में अराजकता पैâलाने की इजाजत न मिल सके। खासकर महिलाओं के विषय में और भी जागरूक होने और समाज को जागरूक करने की जरूरत है। महिलाओं ने तो सामाजिक और धार्मिक दायरों में रहने का मानो अनुबंध करा रखा हो। महिलाओं के लिए पाबंदियों से भरे इस समाज में ऐसी सोच को जिंदा रखा जाता है कि वे पितृसत्तात्मक सत्ता को स्वीकार कर लें। भारतीय समाज की हर महिला को इस पीड़ा से गुजरना पड़ता है। फिर पुरुष प्रधान समाज की और भी बेहतर तरीके से अक्कासी करते मुस्लिम समाज में तो इस बात का और भी कड़ी तरह से पालन होता है। सही इस्लाम की शिक्षा से मुसलमानों की दूरी ही अधिकांश समस्याओं की जड़ है, जिसे मुस्लिम समाज समझ तो रहा है लेकिन इस मकड़जाल से निकलने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। ऐसे में मुफ्तियों को बेतुके फतवे जारी करने से परहेज करना पड़ेगा। खासकर तब, जब ऐसे फतवे समाज को बुद्धिहीन, महिला विरोधी और मजाक का पात्र बनाने के साथ ही निरंतर पिछड़ते जा रहे समाज को और भी पतन की ओर ले जा रहे हों।