बेमेल ब्लड ग्रुप का किडनी ट्रांसप्लांट

आमतौर पर किडनी ट्रांसप्लांट के लिए दोनों व्यक्तियों का ब्लड ग्रुप एक होना चाहिए पर अब बेमेल ब्लड ग्रुप का भी किडनी ट्रांसप्लांट किया जा सकता है। वोकहार्ट अस्पताल में एक ६० वर्षीय व्यक्ति का बेमेल ब्लड ग्रुप होने के बावजूद उसकी किडनी का सफल ट्रांसप्लांट पूरा किया गया। नेप्रâोलॉजी विभाग के डॉ. एम. एम. बहादुर के नेतृत्व में बेमेल ब्लड ग्रुपवाले मरीज का किडनी ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक पूरा किया।
किडनी की समस्या से ग्रस्त ६० वर्षीय बुजुर्ग नटवर (नाम बदला हुआ) के परिवार के सदस्य उलझन में थे क्योंकि मरीज की पत्नी ही उन्हें किडनी डोनेट करनेवाली थी और उनका ब्लड ग्रुप मरीज के ब्लड ग्रुप से बिल्कुल अलग था। मरीज की पत्नी का ब्लड ग्रुप- एबी पॉजिटिव था, जबकि मरीज का ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव था। डॉ. बहादुर, डॉ. चंदन और उनकी टीम ने परिस्थिति को देखते हुए किसी भी जटिलताओं से बचने के लिए कोरोनरी एंजियोग्राफी सहित ऑपरेशन से पूर्व मूल्यांकन के साथ मरीज को ट्रांसप्लांट के लिए तैयार किया। एंटी-ब्लड ग्रुप के एंटी बॉडीज को दबाने के लिए डॉ. ने रीटक्सिमैब इंजेक्शन दिया। अलग-अलग ब्लड ग्रुप के खिलाफ पहले से तैयार एंटीबॉडी को बाहर निकालने के लिए उन्होंने प्लाज्माफेरेसिस किया। एंटी-ब्लड ग्रुप एंटीबॉडीज के टाइटर्स के स्वीकार्य स्तर तक पहुंचने के बाद ट्रांसप्लांट किया गया था। ट्रांसप्लांट के बाद मरीज के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार हुआ है। डॉ. चौधरी कहते हैं कि पेयर्ड किडनी एक्सचेंज, जिसे ‘स्वैप ट्रांसप्लांट’ के नाम से भी जाना जाता है, तब होता है जब किडनी डोनेट करनेवाले जीवित व्यक्ति एवं मरीज का ब्लड ग्रुप असमान हो। अक्रॉस ब्लड ग्रुप बहुत दुर्लभ नहीं है लेकिन ऐसा चुनिंदा केंद्रों में ही होता है। डायलिसिस पर ५ साल तक जीवित रहने की दर की तुलना में ट्रांसप्लांट से आयु में वृद्धि के साथ-साथ वर्षों तक जीवन का आनंद लेना संभव है।