होड़ मची थी एक अबला को जिंदा जलाने की

३२ साल से चल रही है मुकदमे की सुनवाई
जयपुर की १८ साल की रूपकंवर की शादी दिवराला के मालसिंह शेखावत से हुई थी। शादी के ७ माह बाद ४ सितंबर १९८७ को मालसिंह की मौत हुई तो उसकी चिता पर जल गई रूपकंवर। ३२ साल बाद अदालत में मामला आने से आज एक बार फिर मामला सुर्खियों में है।
एक चिता जलने के लिए एकदम तैयार थी। गांव के सैकड़ों-हजारों लोगों की भीड़ वहां गायत्री मंत्र का जाप कर रही थी। चिता पर एक लाश और लाश को गोद में रखे १८ साल की लड़की। किसी ने उस चिता में आग नहीं लगाई। आसमान से अपने आप आग लग गई। पति का सिर गोद में लिए मुस्करा रही वह लड़की अपने हाथ आशीर्वाद की में मुद्रा में उठाए थी। उसके बाद अग्नि ने सब कुछ जला दिया और इस तरह एक सुहागन सती हो गर्इं। और सती माता बन गर्इं। राजस्थान के चप्पे चप्पे में ये बनावटी कहानी अपने हिसाब से मिर्च मसाला लगाकर सुनाई जाती है। बताया जाता है कि १५ मिनट तक उसने (रूपकंवर ने) चिता की परिक्रमा की। हमने उसे बताया कि जल्दी करो नहीं तो पुलिस आ जाएगी और गड़बड़ हो जाएगी। उसने ‘मुस्कराते हुए’ कहा फिक्र न करो। फिर वो चिता पर चढ़ गई और पति का सिर गोद में रखा। माल सिंह के छोटे भाई ने माचिस जलाई लेकिन आग नहीं पकड़ी। आग तो अपने आप पकड़ी थी। गांव वाले छाती ठोक कर बताते हैं कि जब वो चिता से नीचे गिर गई तो पैर घसीटकर वापस पहुंच गई। फिर वहां मौजूद हर राजपूत ने अपने घर से घी के कनस्तर लाकर डाले ताकि आग तेज हो जाए। डेढ़ बजे तक काम तमाम हो गया। चिता पर रूपकंवर की मुस्कराती हुई तस्वीर एडिट करके इस तरह बनाई और प्रचारित की गई कि वह सती होते हुए बहुत खुश थी। असल में उस रोज एक मासूम लड़की को जबरन आग में ठेला गया था। वो दहशत के मारे बुरी तरह विक्षिप्तावस्था में थी। वहां एक भी आदमी इस कुकर्म पर सवाल उठाने वाला नहीं था जो उस आग और धुंए में जलती इंसानियत देख पाता। वहां तलवारें लहराते और शोर मचाते राजपूतों की भीड़ थी। होड़ मची थी एक अबला को जिंदा जलाने की।
देवराला में एक स्कूल टीचर था सुमेर सिंह। उसके लड़के माल सिंह की शादी रूपकंवर से हुई थी। माल सिंह बीएससी स्टूडेंट था और रूपकंवर ने हाईस्कूल पास कर रखा था। शादी के ७ महीने बाद रूपकंवर अपने मायके आई हुई थी। ३ दिन बाद उधर अचानक पति की तबीयत बिगड़ गई। उल्टी वगैरह हुई। ये २ सितंबर १९८७ की बात है। अगले दिन रूपकंवर अपने पिता और भाई के साथ उसको लेकर सीकर के अस्पताल आ गए। वहां माल सिंह की हालत में कुछ सुधार हुआ तो रूपकंवर ने अपने भाई और पिता से कहा कि अब आप जाओ, मैं संभाल लूंगी, लेकिन दो दिन बाद सुबह ८ बजे माल सिंह की जान चली गई। १२ बजे तक उसकी बॉडी देवराला ले आई गई। इसी बीच गांव में अफवाह पैâल गई कि रूपकंवर सती होना चाहती है। फिर गांव के कुछ बूढ़े-बुजुर्ग और पंडे टाइप के लोग आए और उन्होंने ये परीक्षा की कि रूपकंवर सती होने लायक है या नहीं? उसके अंदर ‘सत’ है या नहीं। उन्होंने कन्फर्म कर लिया फिर बात पक्की हो गई। उधर चिता तैयार कराई गई। रूपकंवर को सजा-धजाकर हाथ में नारियल देकर गांव में घुमाया गया। उसके बाद राजपूत शमशान में ले जाया गया। जहां चिता सजी थी। पति की मौत के बाद रूपकंवर बदहवास हालत में थीं। वह मानसिक रूप से विक्षिप्त हो चुकी थीं। उसी अवस्था में उनका १६ श्रृंगार किया गया और जलती चिता पर बैठाया गया। वहां मौजूद लोगों द्वारा सती माता के जयकारे लगाए गए और बाद में उनका मंदिर बना दिया गया। रूपकंवर के पिता को इस पूरी घटना के बारे में दूसरे दिन सूचना दी गई। १६ सितंबर को उस कांड की जगह पर सारे रिश्तेदार इकट्ठा हुए। गंगाजल और दूध से पवित्र किया। एक त्रिशूल में चुनरी लपेटकर वहां सती माता का मंदिर बना दिया गया। इस काम में सती के पिता बल सिंह राठौड़ भी थे।