" /> बैंक, कर्ज और भगोड़ों का संकट

बैंक, कर्ज और भगोड़ों का संकट

कोरोना महामारी के बीच रिजर्व बैंक ने ५० बढ़े बकायेदारों के ६८,६०७ करोड़ रुपए का कर्ज बट्टे खाते में डाल लिया है। इनमें विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के कर्ज भी शामिल हैं। देश जब आर्थिक बद्हाली का संकट झेल रहा है, तब यह खबर चौंकाती है। तय है कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली तो खस्ताहाल है ही, राजनीतिक इच्छाशक्ति भी कमजोर है। इस पर गंभीर चिंतन करने की बजाय वाक्युद्ध छिड़ गया है। जबकि इन्हें बैंकिंग प्रणाली की खामियां ढूंढ़ने की जरूरत है। यह सही है कि लंबे समय तक कर्ज की वापसी नहीं होने पर उसे डूबते कर्ज में डालने के लिए ‘राइटिंग ऑफ‘ प्रक्रिया अपनाने का प्रावधान है और यह व्यवस्था देश के स्वतंत्र होने के बाद से ही बनी हुई है। लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद और उनकी सरकार द्वारा कर्ज देने और वसूलने के सिलसिले में कई नए कानून बना दिए जाने के बावजूद स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है। मामले का खुलासा सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी गई जानकारी से हुआ है। दरअसल बैंक भली-भांति जानते हैं कि ऋण-वसूली एक कठिन और लंबी प्रक्रिया है इसलिए डिफाल्टर्स का कर्ज डूबंत खाते में डालने में ही भलाई है।
कुछ साल से सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंक घोटालों और इरादतन बकायेदारों (विलफुल डिफॉल्टर्स) द्वारा कर्ज नहीं चुकाए जाने के कारण गंभीर अर्थ संकट से जूझ रहे हैं। नतीजतन बैंकों में एनपीए और विलफुल डिफॉल्टरों से जुड़े मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसकी शुरुआत १९९९ में हुई थी। इस समय केंद्रीय सर्तकता आयोग ने २५ लाख रुपए या उससे अधिक की धांधलेबाजी के बारे में जानकारी एकत्रित करने के निर्देश आरबीआई को दिए थे। लेकिन ये निर्देश रिजर्व बैंक ने ठंडे बस्ते में डाल दिए। नतीजतन कर्ज चुकाने की क्षमता रखने वाले कर्जदारों ने भी कर्ज नहीं चुकाया। उल्टे, विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी की तरह कई बकायेदार बड़ी पूंजी लेकर देश से ही पलायन कर गए। गोया, २०१६ में सरकारी बैंकों के गैर निष्पादित कर्ज (एनपीए) में भारी बढ़ोत्तरी हो गई। ३१ दिसंबर तक यह रकम ६,१४,८७२ करोड़ रुपए तक पहुंच गई। जबकि २०१५ तक यह रकम १.७५ लाख करोड़ थी।

इस तथ्य से सभी भलिभांति परिचित हैं कि बैंक और साहूकार की कमाई कर्ज दी गई धनराशि पर मिलने वाले सूद से होती है। यदि ऋणदाता ब्याज और मूलधन की किस्त दोनों ही चुकाना बंद कर दें तो बैंक के कारोबारी लक्ष्य पूरे नहीं होंगे ? हालात इतने बद्तर हैं कि ४० सूचीबद्ध बैंकों का ६,८३,४७९ करोड़ रुपए डूबंत खाते में आ गया है। ऐसी कंपनियों की संख्या लगभग ११०० है, जो वर्षों से किस्त नहीं चुका रही हैं। चूंकि सरकार और बैंक इस कर्ज को वसूलने के लिए सख्ती से पेश नहीं आ रहे हैं, इसलिए यह आशंका भी पनप रही है कि सरकार और बैंकों की साठ-गांठ के चलते आम जनता की गाढ़ी कमाई की पूंजी हड़पने के लिए कुछ बड़े कॉर्पोरेट घरानों ने यह सुनियोजित ढंग से षड्यंत्र रचा है। इस नजरिए से मध्य-प्रदेश की महेश्वर विद्युत परियोजना में इस सच का खुलासा भी हुआ है। इस परियोजना को १९९४ में मध्य-प्रदेश विद्युत मंडल से छीनकर निजी कंपनी एस कुमार को दे दिया गया था। किंतु दो दशक बीत जाने के बावजूद काम तो पूरा हुआ नहीं, अलबत्ता प्रदेश सरकार ने फिर से अधूरी योजना को पूरी करने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। इस दौरान कंपनी के कई करोड़ रुपए माफ किए गए। बावजूद एस कुमार पर परियोजना के लिए सार्वजानिक बैंकों का २४०० करोड़ रुपए बकाया है। एनपीए की सूची में एस कुमार का नाम पांचवें स्थान पर है।

सबसे ज्यादा ५१ फीसदी कर्ज विनिर्माण,लौह अयस्क, शराब, इस्पात, कपड़ा, विमानन, खनन और ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियां के पास है। हैरानी इस बात पर भी है कि बैंक और सरकार इन कर्जदारों के नामों की अधिकृत सूची भी सार्वजनिक नहीं करते हैं। जिस तरह से कालाधन के जमाखोरों के नाम छिपाने की कोशिशें होती हैं, उसी तर्ज पर इन उद्योगपतियों के नामों पर पर्दा पड़ा हुआ है। इस बाबत उद्योगपतियों की दलील है कि कंपनियों ने कर्ज लेकर जो निवेश किया,ल। वह अर्थव्यवस्था की बद्हाली के कारण लाभदायी नहीं रहा। हालांकि भारतीय बैंक कर्मचारी महासंघ ने जरूर डिफाल्टरों की सूची को पहले ही सार्वजनिक कर दिया है। कर्ज में डूबी ११२९ ऐसी कंपनियां हैं, जिन पर निरंतर कर्ज बढ़ रहा है। इस वजह से बैंक सुचारू रूप से चल रही परियोजनाओं को नया कर्ज नहीं दे पा रहे हैं। इससे इन परियोजनाओं और कारखानों का उत्पादन सीमित रह गया है। जिसका असर देश की अर्थव्यस्था पर पड़ रहा है। यदि यही कर्जदार लघु, मंझोले या किसान होते तो इनकी संपत्ति कुर्क हो गई होती? रिर्जव बैंक के नियम तो ये हैं कि यदि कोई ऋणी तीन महीने तक किस्तें नहीं चुकाता है तो उसे दोषी की श्रेणी में डाल दिया जाए। परंतु एनपीए के सूरमाओं का बाल भी बांका नहीं हो रहा है।

देश के बैंकों में जमा पूंजी करीब ८० लाख करोड़ है। इसमें ७५ प्रतिशत राशि छोटे बचतकर्ताओं और आम जनता की है। कायदे से तो इस पूंजी पर नियंत्रण सरकार का होना चाहिए, जिससे जरूरतमंद किसानों, शिक्षित बेरोजगारों और लघु व मंझोले उद्योगपतियों की पूंजीगत जरूरतें पूरी हो सकें। लेकिन दुर्भाग्य से यह राशि बड़े औद्योगिक घरानों के पास चली गई है और वे न इसे केवल दाबे बैठे हैं, बल्कि गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। जबकि फसल उत्पादक किसान और शिक्षित बेरोजगार आत्महत्या कर रहे हैं। बावजूद विंडबना है कि औद्योगिक घरानों को आसानी से हजारों करोड़ का कर्ज मिल जाता है, जबकि छोटे कर्जदारों को बैंकों के कई-कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। विसंगति यह भी है कि उद्योगों को तो कम ब्याज दर पर कर्ज मिलता है, जबकि किसान को ट्रेक्टर पर १८ प्रतिषत ब्याज दर से कर्ज दिया जाता है, वह भी कृषि भूमि गिरवी रख कर। इन बाधाओं की वजह से नवीन उद्यमियों व नवोन्मेषियों को अपना कारोबार षुरू करना ही मुश्किल होता है? घर के लिए कर्ज लेना भी कठिन होता है। यही वजह है कि आम आदमी सूदखोर महाजनों के चंगुल में फंसता जा रहा है। ऐसी विषम कठिनाइयों के चलते माइक्रो फाइनेंस का धंधा पूरे देश में फला-फूला है। जबकि ये ३० फीसदी की ऊंची सालाना ब्याज दर पर गरीब और मध्य वर्ग के लोगों को कर्ज देते हैं। लेकिन यह कर्ज का ऐसा दुश्चक्र है, जिसमें फंसकर व्यक्ति उबर नहीं पाता। यहां तक कि कई कर्जदार आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं। इस हकीकत से पता चलता है कि बैंकिंग क्षेत्र कमजोर तबकों का साहरा बनने में नाकाम रहे हैं। जबकि इसके विपरीत यही बैंक धनी वर्ग की सुख-सुविधाएं बढ़ाने, औद्योगिक क्षेत्र के वित्तीय स्रोत खोलने और कुप्रबंधन के चलते डूबने वाली कंपनियों को उबारने का जरिया जरूर बने हैं।