बैडमिंटन विश्व ने चौथी बार देखा, एक गुरु के दो चेलों की रोमांचक जंग

किसी भी गुरु के लिए ये धर्म संकट होता है कि उसके चेले आपस में भिड़े और ऐसे चेले जिन पर गुरु का सारा दारोमदार होता है किंतु ये भी उस गुरु के लिए गर्व का विषय होता है कि दुनिया में उसके ही चेले नाम कमा रहे हैं और वो अंतिम भिड़ंत में आमने-सामने होते हैं। जी हां, सायना नेहवाल और पीवी सिंधु बैडमिंटन गुरु गोपीचंद की शिष्या हैं। कॉमनवेल्थ में उस समय रोचक मोड़ आ गया जब दो खिलाड़ी फाइनल में थीं और उनके कोच एक ही थे। गोपीचंद के लिए संकट ये था कि वो जीत के लिए किसे क्या कहें? फिर भी खेलधर्म निभाते हुए अपनी दोनों शिष्याओं को उन्होंने जीत के लिए आशीर्वाद दिया और उनमें जो अच्छा खेला वो जीता। कॉमनवेल्थ खेलों के इतिहास में भी ये पहली बार था जब बैडमिंटन के फाइनल मुकाबले में सायना नेहवाल और पीवी सिंधु-दो हिंदुस्थानी खिलाड़ी थे। ये किसी सुपर संडे से कम नहीं था। यदि आईपीएल में दो मैचों को लेकर सुपर संडे माना जा रहा था तो कॉमनवेल्थ के इस मुकाबले ने इस संडे को सुपर से ऊपर कर रखा था।
दिलचस्प यह था कि एक ही कोच से शुरुआत करनेवाली सायना और सिंधु, गोपीचंद अकादमी में कोर्ट पर एक दूसरे के साथ ट्रेनिंग किया करती हैं और दोनों एक-दूसरे के सामने जीत के लिए लड़ रही थीं। सायना और सिंधु का सफर भी कई मायनों में मजेदार रहा है। २८ साल की सायना और २२ साल की पीवी सिंधु कई बार भिड़ चुकी हैं और इससे पहले तक चार मुकाबलों में सायना ही ३-१ से भारी पड़ी थीं। अब ये आंकड़ा ४-१ का हो गया है। इस सफर में यदि इस २०१८ – गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स में सायना की जीत को जोड़ लें तो इसके पहले २०१८ – इंडोनेशिया मास्टर्स में भी दोनों आमने-सामने थीं और यहां भी सायना ने सिंधु को हराया था। वर्ष २०१७ नेशनल चैंपियनशिप में भी सायना ने बाजी मारी थी किंतु २०१७ – इंडिया ओपन में सिंधु ने सायना को मात दी थी। २०१४- इंडिया ग्रां प्री में भी दोनों आमने सामने थीं तब भी सायना जीती थी। इस तरह देखें तो सिंधु भले ही सायना से विश्व रैंकिग में ऊपर हो किंतु मात सायना ने ही उन्हें दी है।
सायना नेहवाल हिंदुस्थानी बैडमिंटन में सनसनी के रूप में उभरी थीं और दुनिया में हिंदुस्थान का नाम बैडमिंटन में चमका दिया था। १७ मार्च १९९० को जन्मी सायना पहली बार तब सुर्खियों में आई जब २००३ में उन्होंने चेक ओपन में जूनियर टाइटल जीता। १५ साल की उम्र में जब उन्होंने ९ बार की चैंपियन अपर्णा पोपट को हराया तो लोगों को लगा कि ये कौन नई खिलाड़ी है? फिर २००६ में सायना अंडर-१९ चैंपियन बनीं। यहां से उन्होंने जो उड़ान ली वो अब तक जारी है हालांकि बहुत से उतार-चढ़ाव इस सफर में आए। सायना के नाम कई रिकॉर्ड और जीतें दर्ज हैं। बैडमिंटन में ओलिंपिक पदक जीतनेवाली वो पहली हिंदुस्थानी खिलाड़ी बनीं। साल २०१५ में बैडमिंटन में दुनिया की नंबर वन रैंकिंग हासिल करनेवाली वो पहली हिंदुस्थानी महिला खिलाड़ी रहीं। सुपर सीरीज जीतनेवाली भी वो पहली ही हिंदुस्थानी महिला खिलाड़ी थीं। २०१० में दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में सायना ने कॉमनवेल्थ गेम्स के इसी तरह के आखिरी दिन को स्वर्णमयी बनाया था, जब हिंदुस्थान की झोली में ९९ मेडल थे, उसे एक और पदक की जरूरत थी ताकि वो अपना शतक पूरा कर सके। १००वां मेडल दिलाने और गोल्ड जीतने का दबाव सायना पर था। जबरदस्त मैच में सायना ने १९-२१, २३-२१, २१-१३ से फाइनल जीता था। फिर २०१२ में लंदन में ओलिंपिक पदक जीता और १० सुपर सीरीज अपने नाम की। तकनीकी रूप से दक्ष और मानसिक रूप से मजबूत- ये सायना की खूबियां रही हैं। ये उनका जलवा ही था कि २०१२ में किसी गैर क्रिकेटर खिलाड़ी के साथ किसी वंâपनी ने करीब ७४ लाख डॉलर की बड़ी मार्केटिंग डील साइन की लेकिन कई बार बड़े मैचों में मिली हार के बाद उनकी क्षमता पर सवाल भी उठे और वो अपने कोच गोपीचंद से अलग हो गर्इं। २०१६ में रियो ओलिंपिक में सायना को गंभीर चोट लगी। ये उनके लिए बड़ा झटका था। इसके बाद से उन्होंने धीमी लेकिन अच्छी वापसी की है और साथ ही वापसी हुई है गुरु-शिष्य की पुरानी जोड़ी की। कॉमनवेल्थ मेडल उनकी उपलब्धियों में एक और इजाफा है।
दूसरी ओर पीवी सिंधू के सफर को देखें तो वो भी लगभग सायना की तरह ही रहा। हालांकि अपनी हाइट की वजह से सिंधु कई मायनों में सायना से लाजवाब रहीं, किंतु आज भी मानसिक टूर पर वो सायना के लेबल तक नहीं पहुंच सकी हैं। ५ जुलाई १९९५ को तेलंगाना में जन्मी २२ साल की पीवी सिंधु का सितारा इन दिनों काफी बुलंद चल रहा है और विश्व रैंकिंग में वो तीसरे नंबर पर हैं। सायना नेहवाल की तरह सिंधु को तराशने और संवारने का काम भी उनके कोच गोपीचंद ने किया है। सायना की ही तरह कम उम्र से ही सिंधु की जीत का सिलसिला शुरू हो गया था- अंडर १०, अंडर १३ जैसे मुकाबले वो लगातार जीतने लगी। २०१३ और २०१४ में उन्होंने लगातार दो साल वल्र्ड चैंपियनशिप मेडल जीते। बैडमिंडन में किसी हिंदुस्थानी महिला ने ऐसा पहली बार किया था। ये वो समय था जब सायना नेहवाल भी टॉप फॉर्म में चल रही थीं और दोनों के बीच कॉम्पीटीशन शुरू हो चुका था। २०१६ के ओलिंपिक में सिंधु फाइनल में पहुंचनेवाली पहली हिंदुस्थानी महिला बनीं। फाइनल में वो हार जरूर गर्इं लेकिन रजत पदक जीतना उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी जबकि सायना चोट लगने के बाद ओलिंपिक से बाहर हो गई थीं। करीब ५ पुâट ११ इंच लंबी पीवी सिंधु के पिता पीवी रमन्ना और मां पी विजया वॉलीबाल खिलाड़ी रह चुकी हैं। फिलहाल सायना और सिंधु दोनों एक ही गुरु गोपीचंद की शिष्या हैं, एक ही जगह ट्रेनिंग लेती हैं और ऐसे ही फॉर्म में चलती रहीं तो उनका सामना दोबारा भी हो सकता है। महिला बैडमिंटन में एक तरह की क्रांति की जो शुरुआत सायना ने की है सिंधु उसी को आगे बढ़ा रही हैं। अंग्रेजी में एक कहावत है ‘मोर द मेरियर’ यानी जितना ज्यादा हो उतना अच्छा है और हिंदुस्थान के लिए ये प्रतिद्वंद्विता अच्छी खबर है। २२ साल की सिंधु का सपना है कि जो गोल्ड वो रियो ओलिंपिक में न जीत सकीं, वो टोक्यो ओलंपिक में जीतें।
हिंदुस्थानी बैडमिंटन का ये सुनहरा वक्त चल रहा है, जब पुरुषों में श्रीकांत दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी है, वहीं दो दो महिला खिलाड़ी दुनिया की सरताजों में शामिल है और दुनिया उनसे खौफ खाती है। कोच गोपीचंद के लिए भी ये उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा गौरवशाली पायदान है, जहां उनकी सिखाई दोनों खिलाड़ी आसमान पर ध्रुव तारे की तरह दमक रही है।