९९ फीसदी धड़ाम!

हाल ही में २५ अक्टूबर को ३ फिल्में रिलीज हुईं, जिनमें ‘हाउसफुल ४’ बड़ी फिल्म है और इस मास-मसाला फिल्म की ओपनिंग दिवाली को देखते हुए ठीक-ठाक रही। मगर बेसिर-पैर की यह फिल्म कई दर्शकों का सिरदर्द बढ़ानेवाली साबित हो रही है। मगर त्योहारी सीजन होने के कारण वीकेंड में अच्छी कमाई हो जा सकती है। दूसरी फिल्म ‘सांड की आंख’ ऑफबीट फिल्म है और क्लास दर्शकों के लिए है। शुरुआत धीमी है। तीसरी फिल्म कुछ जुगाड़ टाइप है और मेड इन चाइना का हश्र कोई बहुत उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता।
हाल ही में जब केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मुंबई में मंदी से संबंधित एक सवाल के जवाब में ये कहा कि स्थिति उतनी खराब नहीं है, जितनी बताई जा रही है तो मीडिया एक्टिव हो उठी। खासकर उनके जवाब पर कि हाल ही में रिलीज हुई फिल्मों ने एक दिन में १२० करोड़ की कमाई की। अब मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक रणबांकुरे तलवार लेकर निकल पड़े। हालांकि मुंबई फिल्मनगरी है और रविशंकर ने हल्के-फुल्के अंदाज में चुटकी लेते हुए यह बात कही थी। मगर जिस अंदाज में टीवी चैनलों में बैठे एंकर्स ने इसको इश्यु बनाया और बाकी चपंडुक टाइप के अर्थशास्त्रियों ने नोबल स्तर का रिसर्च कर डाला वो वाकई अद्भुद था! रविशंकर ने कोई गलत आंकड़ा नहीं दिया था। उस दिन ३ फिल्में रिलीज हुई थीं और उसमें ऋतिक रोशन-टायगर श्राफ की फिल्म ‘वॉर’ ने करीब ५२ करोड़ रुपए की जबरदस्त ओपनिंग ली थी। २ अन्य फिल्में भी रिलीज हुई थीं और तीनों ने मिलकर १२० करोड़ का आंकड़ा छुआ था। फिर इस पर बहस हुई कि फिल्मों का देश की अर्थव्यवस्था में कितना योगदान है? तो कुछ ज्ञानीजनों ने बताया कि बहुत ही कम है। लगभग न के बराबर।
दरअसल यह मामला देश की अर्थव्यवस्था में फिल्मों के योगदान का था ही नहीं। फिल्में मनोरंजन का साधन है और इसका नंबर किसी भी इंसान के लिए सबसे आखिर में आता है। सबसे पहले रोटी का नंबर है। भूख मिटाना जरूरी है। रोटी के बाद कपड़ा का नंबर दूसरा है। तन ढंकना जरूरी है। फिर छत चाहिए यानी मकान। जब रोटी, कपड़ा और मकान की मूल आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं तब बारी घूमने-फिरने और मनोरंजन की आती है। यानी मनोरंजन बाद में आता है। अब रविशंकर ने इसी संदर्भ में बात कही थी कि जब लोग एक दिन में मनोरंजन के नाम पर १२० करोड़ रुपए निकाल दे रहे हैं तो फिर अर्थव्यवस्था उतनी भी खराब नहीं है।
बहरहाल, ‘वॉर’ ने तीसरे सप्ताह में भी १९.५० करोड़ रुपए कम लिए जिससे इसकी कुल कमाई २९० करोड़ तक पहुंच चुकी है। यहां तक तो बात ठीक है पर बॉक्स ऑफिस पर इसके अगले शुक्रवार को १२ फिल्में रिलीज हुर्इं थीं। एक दिन में इतनी ज्यादा फिल्मों के रिलीज होने की मिसाल विरले ही है। अब जरा इनके बिजनेस पर भी गौर कीजिए। इन सभी १२ फिल्मों ने मिलकर पहले दिन डेढ़ करोड़ रुपए का कलेक्शन किया। इनमें सबसे बड़ी फिल्म सैफ अली खान की ‘लाल कप्तान’ थी, जिसकी ओपनिंग ५० लाख रुपए थी। इसके बाद ३५ लाख के साथ ‘घोस्ट’ रही। तीसरे नंबर पर २० लाख की ओपनिंग के साथ रही ‘पी से प्यार, एफ से फरार’। इसके बाद की सभी फिल्मों ने ०-३ लाख रुपए तक की कमाई की है। कुछ फिल्म के थिएटर में तो दर्शक ही नहीं पहुंचे और शो तक वैंâसिल करने पड़े। इनके साथ एक हॉलीवुड की अंग्रेजी फिल्म भी रिलीज हुई जिसे सबसे ज्यादा ७० लाख की ओपनिंग मिली, इस तरह से इस फिल्म ने सभी हिंदी फिल्मों को पछाड़ दिया। अब रविशंकर प्रसाद का मजाक एक बार फिर उन्हीं के अंदाज में उड़ाया जा सकता है कि कहां है अर्थव्यवस्था अच्छी? १२ फिल्में मिलकर सिर्फ १.५ करोड़ जुटा पा रही हैं? ये तो बहुत बुरी दशा है। सिर्फ दो सप्ताह में अर्थव्यवस्था १२० करोड़ से १.५ करोड़ पर सिमट गई। मेरा गणित कमजोर है। सो अगर इस फिल्मी अर्थव्यवस्था का कुछ गुणा-गणित लगाएं तो सिर्फ दो सप्ताह में अर्थव्यवस्था करीब ९९ प्रतिशत धड़ाम हुई है! स्थिति वाकई चिंतनीय है!!