ब्रह्मा, विष्णु व रुद्र का स्वरूप है अयोध्या

श्रीराम और रावण के बीच युद्ध समाप्त हो चुका था। रावण की मृत्यु और विभीषण के राज्याभिषेक के बाद भगवान श्रीराम से कहा गया कि भगवान कुछ दिन लंका का आतिथ्य स्वीकार करें। भगवान श्रीराम ने मना कर दिया। लक्ष्मण ने प्रतिप्रश्न किया, ‘क्यों?’ तब भगवान बोले-
अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।
अर्थात ‘हे लक्ष्मण! यद्यपि यह लंका सोने की बनी है, फिर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। (क्योंकि) जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।’ प्रश्न उठता है कि जन्मभूमि अयोध्या को भगवान श्रीराम ने स्वर्ग से भी सुंदर क्यों कहा? इसका उत्तर अथर्ववेद की एक ऋचा में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताकर दिया गया है और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। अयोध्या को सप्त पुरियों में से एक बताया गया है-
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवंतिका।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका:।।
अर्थात अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, काञ्चीपुरम, उज्जैन, पुरी और द्वारिका-ये सात मोक्षदायी हैं।
वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, ‘अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या’ और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है इसलिए भगवान श्रीराम ने इसे स्वर्ग से भी ज्यादा महान कहा है। स्कंदपुराण के अनुसार अयोध्या शब्द ‘अ’ कार ब्रह्मा, ‘य’ कार विष्णु है तथा ‘ध’ कार रुद्र का स्वरूप है।
सरयू नदी के तट पर बसे इस नगर की रामायण अनुसार विवस्वान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु महाराज द्वारा स्थापना की गई थी। माथुरों के इतिहास के अनुसार वैवस्वत मनु लगभग ६६७३ ईसा पूर्व हुए थे। ब्रह्माजी के पुत्र मरीचि से कश्यप का जन्म हुआ। कश्यप से विवस्वान और विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु थे। वैवस्वत मनु के १० पुत्र- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यंत, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध थे। इसमें इक्ष्वाकु कुल का ही ज्यादा विस्तार हुआ। इक्ष्वाकु कुल में कई महान प्रतापी राजा, ऋषि, अरिहंत और भगवान हुए हैं। इक्ष्वाकु कुल में ही आगे चलकर प्रभु श्रीराम हुए। अयोध्या पर महाभारत काल तक इसी वंश के लोगों का शासन रहा।
पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मा से जब मनु ने अपने लिए एक नगर के निर्माण की बात कही तो वे उन्हें विष्णुजी के पास ले गए। विष्णुजी ने उन्हें साकेतधाम में एक उपयुक्त स्थान बताया। विष्णुजी ने इस नगरी को बसाने के लिए ब्रह्मा तथा मनु के साथ देवशिल्पी विश्वकर्मा को भेज दिया। इसके अलावा अपने रामावतार के लिए उपयुक्त स्थान ढूंढने के लिए महर्षि वशिष्ठ को भी उनके साथ भेजा। मान्यता है कि वशिष्ठ द्वारा सरयू नदी के तट पर लीलाभूमि का चयन किया गया, जहां विश्वकर्मा ने नगर का निर्माण किया। स्कंद पुराण के अनुसार अयोध्या भगवान विष्णु के चक्र पर विराजमान है।
बेंटली एवं पार्जिटर जैसे विद्वानों ने ‘ग्रह मंजरी’ आदि प्राचीन भारतीय ग्रंथों के आधार पर इनकी स्थापना का काल ई.पू. २२०० के आसपास माना है। इस वंश में राजा रामचंद्रजी के पिता दशरथ ६३वें शासक हैं।
अयोध्या पहले कौशल जनपद की राजधानी थी। प्राचीन उल्लेखों के अनुसार तब इसका क्षेत्रफल ९६ वर्ग मील था। वाल्मीकि रामायण के ५वें सर्ग में अयोध्या पुरी का वर्णन विस्तार से किया गया है। वाल्मीकि रामायण के बालकांड में उल्लेख मिलता है कि अयोध्या १२ योजन-लंबी और ३ योजन चौड़ी थी।
‘कोसल नाम मुदित: स्फीतो जनपदो महान। निविष्ट: सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान्।।’
अर्थात ‘सरयू नदी के तट पर संतुष्ट जनों से पूर्ण धनधान्य से भरा-पूरा, उत्तरोत्तर उन्नति को प्राप्त कौशल नामक एक बड़ा देश था। इसी देश में मनुष्यों के आदिराजा प्रसिद्ध महाराज मनु की बसाई हुई तथा तीनों लोकों में विख्यात अयोध्या नामक एक नगरी थी।’ नगर की लंबाई, चौड़ाई और सड़कों के बारे में महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं- ‘यह महापुरी बारह योजन (९६ मील) चौड़ी थी। इस नगरी में सुंदर, लंबी और चौड़ी सड़कें थीं।’
वाल्मीकि जी अयोध्या की सड़कों की सफाई और सुंदरता के बारे में लिखते हैं, ‘वह पुरी चारों ओर पैâली हुई बड़ी-बड़ी सड़कों से सुशोभित थी। सड़कों पर नित्य जल छिड़का जाता था और फूल बिछाए जाते थे। इंद्र की अमरावती की तरह महाराज दशरथ ने उस पुरी को सजाया था। इस पुरी में राज्य को खूब बढ़ानेवाले महाराज दशरथ उसी प्रकार रहते थे, जिस प्रकार स्वर्ग में इंद्र वास करते हैं।
महर्षि आगे लिखते हैं, इस पुरी में बड़े-बड़े तोरण द्वार, सुंदर बाजार और नगरी की रक्षा के लिए चतुर शिल्पियों द्वारा बनाए हुए सब प्रकार के यंत्र और शस्त्र रखे हुए थे। उसमें सूत, मागध बंदीजन भी रहते थे, वहां के निवासी अतुल धन संपन्न थे, उसमें बड़ी-बड़ी ऊंची अटारियोंवाले मकान जो ध्वजा-पताकाओं से शोभित थे और परकोटे की दीवारों पर सैकड़ों तोपें चढ़ी हुई थीं।
विष्णु अवतार की घोषणा
गोस्वामी तुलसीदास लिखित श्रीराम चरित मानस के बालकाण्ड में रावण के अत्याचारों से बचाने के लिए जब ब्रह्माजी के नेतृत्व में सभी देवता भगवान विष्णु की स्तुति करते हैं तब एक आकाशवाणी के माध्यम से भगवान विष्णु अपने रामावतार की घोषणा करते हैं और लीलाभूमि के प्रारंभ के लिए अयोध्या को चुनते हैं। यथा-
जानि सभय सुर भूमि सुनि बचन समेत सनेह।
गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह।।
अर्थात देवताओं और पृथ्वी को भयभीत जानकर और उनके स्नेहयुक्त वचन सुनकर शोक और संदेह को हरनेवाली गंभीर आकाशवाणी हुई।।
चौपाई:
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा।
तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा।।
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा।
लेहउं दिनकर बंस उदारा।।
कस्यप अदिति महातप कीन्हा।
तिन्ह कहुं मैं पूरब बर दीन्हा।।
ते दसरथ कौसल्या रूपा।
कोसलपुरी प्रगट नर भूपा।।
तिन्ह के गृह अवतरिहउं जाई।
रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई।।
नारद बचन सत्य सब करिहउं।
परम सक्ति समेत अवतरिहउ।।
अर्थात हे मुनि, सिद्ध और देवताओं के स्वामियों! डरो मत। तुम्हारे लिए मैं मनुष्य का रूप धारण करूंगा और उदार पवित्र सूर्यवंश में अपने अंशों सहित मनुष्य का अवतार लूंगा।
कश्यप और अदिति ने बड़ा भारी तप किया था। मैं पहले ही उनको वर दे चुका हूं। वे ही दशरथ और कौसल्या के रूप में मनुष्यों के राजा होकर श्री अयोध्यापुरी में प्रकट हुए हैं। उन्हीं के घर जाकर मैं रघुकुल में श्रेष्ठ चार भाइयों के रूप में अवतार लूंगा। नारद के सब वचन मैं सत्य करूंगा और अपनी पराशक्ति के सहित अवतार लूंगा।
रामजन्म और फिर इसके बाद राजा दशरथ द्वारा पुत्र कामेष्टि यज्ञ किए जाने के बाद भगवान श्रीराम के प्राकट्य को गोस्वामी जी ने निम्नलिखित चौपाइयों में इस प्रकार वर्णित किया है-
नौमी तिथि मधु मास पुनीता।
सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।।
मध्यदिवस अति सीत न घामा।
पावन काल लोक बिश्रामा।।
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ।
हरषित सुर संतन मन चाऊ।।
बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा।
स्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा।।
सो अवसर बिरंचि जब जाना।
चले सकल सुर साजि बिमाना।।
गगन बिमल सकुल सुर जूथा।
गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा।।
बरषहिं सुमन सुअंजलि साजी।
गहगहि गगन दुंदुभी बाजी।।
अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा।
बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा।।
दोहा
सुर समूह बिनती करि पहुंचे निज निज धाम।
जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम।।
शोध में पुष्टि
भगवान श्रीराम के प्राकट्य को दिल्ली में स्थित एक संस्था इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑन वेदा यानी आई सर्वे ने भी की है। संस्था ने खगोलीय स्थितियों की गणना के आधार पर ये निष्कर्ष दिया है कि वाल्मीकि ने तारों की गणना के आधार पर राम जन्म की स्थिति की जानकारी दी है।
आई सर्वे के इस शोध में मुख्य भूमिका अशोक भटनागर, कुलभूषण मिश्र और सरोज बाला ने निभाई है। सरोज बाला इस संस्था की अध्यक्ष भी हैं। इनके अनुसार १० जनवरी ५११४ को भगवान राम का जन्म हुआ था।
वाल्मीकि जी लिखते हैं कि चैत्र मास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में कौशल्यादेवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त सर्वलोकवंदित श्रीराम को जन्म दिया। वाल्मीकिजी कहते हैं कि जिस समय राम का जन्म हुआ उस समय पांच ग्रह अपनी उच्चतम स्थिति में थे।
यूनिक एग्जीबिशन ऑन कल्चरल कॉन्टिन्यूटी प्रâॉम ऋग्वेद टू रोबॉटिक्स नाम की इस एग्जीबिशन में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार भगवान राम का जन्म १० जनवरी, ५,११४ ईसापूर्व सुबह बारह बजकर पांच मिनट पर हुआ था। वाल्मीकि रामायण द्वारा बताए गए ग्रह नक्षत्रों का जब प्लेनेटेरियम सॉफ्टवेयर के अनुसार आकलन किया गया तो राम जन्म की तिथि ४ दिसंबर ईसा पूर्व यानी आज से ९,३४९ साल पहले हुआ। बहरहाल इन शोधों से एकदम अलग जो भारतीय वांग्मय है वह भगवान श्रीराम को ईश्वर का अवतार मानता रहा है।
अयोध्या और साकेत
बौद्ध काल में ही अयोध्या के निकट एक नई बस्ती बन गई थी, जिसका नाम साकेत था। बौद्ध साहित्य में साकेत और अयोध्या दोनों का नाम साथ-साथ भी मिलता है, जिससे दोनों के भिन्न अस्तित्व के बारे में जानकारी मिलती है। अयोध्या और साकेत दोनों नगरों को कई विद्वानों ने एक ही माना है। कालिदास ने भी रघुवंश में दोनों नगरों को एक ही माना है, जिसका समर्थन जैन साहित्य में भी मिलता है। कनिंघम ने भी अयोध्या और साकेत को एक ही नगर से समीकृत किया है, वहीं इसके उलट विभिन्न- विभिन्न विद्वानों ने साकेत को भिन्न-भिन्न स्थानों से समीकृत किया है। ‘अयोध्या’ गंगा के किनारे स्थित एक छोटा गांव या नगर बतलाया गया है। वही ‘साकेत’ उससे भिन्न एक महानगर था इसलिए किसी भी दशा में ये दोनों एक नहीं हो सकते हैं।
कई शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। यहां आज भी हिंदू, बौद्ध, इस्लाम एवं विशेषकर जैन धर्म से जुड़े अवशेष देखे जा सकते हैं। जैन मत के अनुसार यहां चौबीस तीर्थंकरों में से पांच तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। क्रम से पहले तीर्थंकर ऋषभनाथ जी, दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ जी, चौथे तीर्थंकर अभिनंदननाथ जी, पांचवे तीर्थंकर सुमतिनाथ जी और चौदहवें तीर्थंकर अनंतनाथ जी। इसके अलावा जैन और वैदिक दोनों मतों के अनुसार भगवान रामचंद्र जी का जन्म भी इसी भूमि पर हुआ। उक्त सभी तीर्थंकर और भगवान रामचंद्र जी सभी इक्ष्वाकु वंश से थे। इसका महत्व इसके प्राचीन इतिहास में निहित है क्योंकि भारत के प्रसिद्ध एवं प्रतापी क्षत्रियों सूर्यवंशी की राजधानी यही नगर रहा है। उक्त क्षत्रियों में दाशरथी रामचंद्र अवतार के रूप में पूजे जाते हैं।
सातवीं सदी के चीनी यात्री ह्वेन सांग ने इसे ‘पिकोसिया’ संबोधित किया है। उसके अनुसार इसकी परिधि १६ली (एक चीनी ‘ली’ बराबर है १/६ मील के) थी। संभवत: उसने बौद्ध अनुयायियों के हिस्से को ही इस आयाम में सम्मिलित किया हो। ह्वेन सांग के अनुसार यहां २० बौद्ध मंदिर थे तथा ३००० भिक्षु रहते थे। बौद्ध मान्यताओं के अनुसार बुद्ध देव ने अयोध्या अथवा साकेत में १६ वर्षों तक निवास किया था। आईन-ए-अकबरी के अनुसार इस नगर की लंबाई १४८ कोस तथा चौड़ाई ३२ कोस मानी गई है।
उत्तर भारत के तमाम हिस्सों में जैसे कौशल, कपिलवस्तु, वैशाली और मिथिला आदि में अयोध्या के इक्ष्वाकु वंश के शासकों ने ही राज्य कायम किए थे। अयोध्या और प्रतिष्ठानपुर (झूंसी) के इतिहास का उद्गम ब्रह्माजी के मानस पुत्र मनु से ही संबद्ध है। जैसे प्रतिष्ठानपुर और यहां के चंद्रवंशी शासकों की स्थापना मनु के पुत्र ऐल से जुड़ी है, जिसे शिव के श्राप ने इला बना दिया था, जिसके नाम पर इसका नाम इलावास पड़ा, जो बाद में इलाहाबाद कहलाया। उसी प्रकार अयोध्या और उसका सूर्यवंश मनु के पुत्र इक्ष्वाकु से प्रारंभ हुआ।
भगवान श्रीराम के बाद बाद लव ने श्रावस्ती बसाई और इसका स्वतंत्र उल्लेख अगले ८०० वर्षों तक मिलता है। कहते हैं कि भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने एक बार पुन: राजधानी अयोध्या का पुनर्निर्माण कराया था। इसके बाद सूर्यवंश की अगली ४४ पीढ़ियों तक इसका अस्तित्व बरकरार रहा। रामचंद्र से लेकर द्वापरकालीन महाभारत और उसके बहुत बाद तक हमें अयोध्या के सूर्यवंशी इक्ष्वाकुओं के उल्लेख मिलते हैं। इस वंश का बृहद्रथ, अभिमन्यु के हाथों ‘महाभारत’ के युद्ध में मारा गया था। महाभारत के युद्ध के बाद अयोध्या उजड़-सी गई लेकिन उस दौर में भी श्रीराम जन्मभूमि का अस्तित्व सुरक्षित था, जो लगभग १४वीं सदी तक बरकरार रहा।