ब्लैक होल

वैज्ञानिक बताते हैं कि हमारे अंतरिक्ष में ब्लैक होल नामक एक संरचना होती है, जिसमें से कुछ भी बाहर नहीं आता। यहां तक कि वह प्रकाश को भी हजम कर जाता है। ब्लैक होल तब बनता है जब कोई तारा अपना जीवनकाल समाप्त कर नष्ट होने लगे और बिखरने की प्रक्रिया में दूसरे क्षुद्र ग्रहों और तारों को लीलता हुआ अपना आकार विशाल करता जाए। उस तारे के स्थान पर काले रंग का विशालतम गड्ढा बन जाता है जो सर्वभक्षी बनकर सब कुछ लील जाता है। उस ब्लैक होल का आकार हमारे सूर्य से भी करोड़ों अरबों गुना बड़ा हो सकता है। पृथ्वी का आकार तो उसके सामने एक सूक्ष्म कण से अधिक नहीं। यह तो हुई खगोलीय बात लेकिन देखें तो हमारी पृथ्वी पर भी अनेक ब्लैक होल दिखाई पड़ते हैं, जो सब कुछ लील जाते हैं। जैसे अमेरिका एक बड़ा ब्लैक होल है, जो हर चीज लीलने पर आतुर रहता है। जहां तेल के कुएं दिखे, किसी खनिज का भंडार दिखाई पड़ा, वहीं अमेरिका टूट पड़ता है। भले उसे कोई भी रास्ता क्यों न अख्तियार करना पड़े। किसी को आतंकवादी घोषित करना पड़े या कहीं गृहयुद्ध करवाना पड़े वह बाज नहीं आता। धन या पॉवर से संबंधित कोई भी चीज हो, अमेरिका उसे ब्लैक होल से भी तेजी से हड़प लेता है। दूसरी तरफ चीन नामक ब्लैक होल भी है वह जमीन हड़पता है। एक तरफ उसने तिब्बत नाम का पूरा देश निगल लिया, दूसरी तरफ अगल बगल के राष्ट्रों की जमीन निगलने के लिए ब्लैक होल से बड़ा मुंह खोल रखता है। हमारे देश में कई तरह के ब्लैक होल हैं। ये सरकारी और गैरसरकारी कई तरह के होते हैं। ये भी भयानक रूप से चीजें निगलते हैं। कई प्राइवेट कंपनियां ब्लैक होल की तरह देश के संसाधनों को निगल कर आम जनता से उसकी कीमत वसूलती हैं और धन का अंबार लगाती रहती हैं। नेता भी एक तरह के ब्लैक होल होते हैं। ये सब कुछ गड़प करते रहते हैं, उनका पेट कभी नहीं भरता।