" /> भक्तों की रक्षा के लिए श्री हरि बने कछुआ : कुर्म जयंती आज

भक्तों की रक्षा के लिए श्री हरि बने कछुआ : कुर्म जयंती आज

ब्रह्मा, विष्णु और महेश यह तीन देवता सृष्टि के, रचियता है। यह बात हम पुराणिक कथाओ में सुनते आए हैं और कई ऐसे उदहारण हमारे धार्मिक ग्रंथो मे लिखे हैं, जहा अलग-अलग युग मे भगवान ने अपने भक्तो के कष्ट हरने के लिए अलग-अलग अवतार लिए हैं। कथाओ के अनुसार, जब भी संकट आया है तब, समय-समय पर अलग-अलग अवतार लेकर भगवान ने राक्षसों और दानवों का वध किया है।

जैसे सतयुग में भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया था, इसी तरह भगवान विष्णु के दशावतार में से ‘कूर्म’ अर्थात कछुआ श्री हरि अर्थात भगवान विष्णु का दूसरा अवतार है। सनातन धर्म में कछुए को कूर्म अवतार अर्थात कच्छप अवतार कहकर संबोधित किया जाता है। पद्म पुराण के अनुसार कच्छप के अवतरण में भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के समुद्र मंथन के समय मंदरमंद्रांचल पर्वत को अपने कवच पर थामा था। शास्त्रों में कच्छप अवतार की पीठ का घेरा एक लाख योजन का वर्णित किया गया है। इस प्रकार वासुकीनाथ श्री भगवान विष्णु के कच्छप अवतार ने मंदरमंद्रांचल पर्वत तथा श्री वासुकि अर्थात शेषनाग की सहायता से देवों एंव असुरों ने समुद्र मंथन करके चौदह रत्नों की प्राप्ति की।
शास्त्रानुसार असुरों के राजा दैत्यराज बलि के काल में असुर, दैत्य और दानव बहुत शक्तिशाली हो गए थे। उस समय उन्हें दैत्य गुरु शुक्राचार्य की महाशक्ति प्राप्त थी। देवता लोग दैत्यों की बढ़ रही शक्ति से बहुत परेशान थे। देवताओं के राजा देवराज इंद्र भी दैत्यों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे क्योंकि एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवराज इंद्र को घमंड में चूर देखकर उन्हें शक्तिहीन होने का श्राप दे दिया था तथा इंद्र के शक्तिहीन होने का लाभ उठाते हुए दैत्यराज बलि ने इंद्र लोक पर भी अपना राज्य स्थापित कर लिया। जिस कारण इंद्रदेव और सभी देवता इधर-उधर कंदराओं में छिप कर अपना समय बिताने लगे।
परेशान इंद्रदेव भगवान विष्णु के पास गए तथा उन्हें दैत्यराज बलि के अत्याचारों के बारे में बताया। तब भगवान विष्णु ने देवताओं के दुख को दूर करने के लिए सागर में पड़े अमृत के घड़े को बाहर निकाल कर पीने की सलाह दी ताकि सभी देवता अमर हो सकें। इसके लिए सागर मंथन किया जाना था, जिसके लिए दैत्यों का सहयोग जरुरी था। देवताओं को निर्भय बनाने के लिए देवर्षि नारद ने भी अहम भूमिका निभाई और दैत्यराज बलि को चालाकी से अमृत पीने का लालच देकर सागर मंथन के लिए तैयार कर लिया। देवता तो पहले ही अमृत पीने के लिए सागर मंथन करना चाहते थे। दैत्यों ने अपना हित देखकर देवताओं के साथ वैर-विरोध मिटाते हुए सागर मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मधानी बनाने के लिए उखाड़ा और वह उसे समुद्र के निकट ले आए।
नागराज वासुकी को रस्सी (नेती) बनाया गया और उसे मंदराचल पर्वत के गिर्द लपेटा गया परंतु जैसे ही सागर मंथन शुरु किया तो पर्वत पानी में कोई ठोस आधार न होने के कारण डूबने लगा। ऐसे में भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार लेकर मंदराचल पर्वत को सहारा दिया। देवताओं और दैत्यों ने मिलकर सागर मंथन किया। भगवान विष्णु ने देवताओं के दुखों को दूर करने के लिए कछुए यानि कूर्म के रुप में अवतार लिया और उनके मनोरथ को सफल बनाया।

इसलिए उसकी पूजा-अर्चना भी की जाती है और इसे शुभ माना जाता है। कछुए का प्रतीक एक प्रभावशाली यंत्र है, जिससे वास्तु दोष का निवारण होता है तथा जीवन में खुशहाली आती है। वास्तु तथा फेंगशुई में इसको स्थापित करने के कुछ सिद्धांत बताए गए हैं, जिसे अपनाकर हम वास्तु की इस अमूल्य धरोहर से लाभान्वित हो सकते हैं। कछुए को घर में रखने से कामयाबी के साथ-साथ धन-दौलत का भी समावेश होता है। इसे अपने ऑफिस या घर की उत्तर दिशा में रखें। कछुए के प्रतीक को कभी भी बैडरूम में न रखें। कछुए की स्थापना हेतु सर्वोत्तम स्थान ड्राईंग रूम है। घर में कछुए की प्रतिमा रखने से हवा एवं जल के सभी दोष मुक्त होते हैं तथा अच्छी ऊर्जा घर में प्रवेश करती है। उत्तर दिशा में कछुए को स्थापित करना शुभ माना जाता है। इसे घर की पूर्व दिशा में भी रखा जा सकता है। जिस घर में कछुए की प्रतिमा रहती या जीता जागता कछुआ रहता है, उसके घर में अकाल मृत्यु की संभावना नहीं रहती तथा हर प्रकार के सुख-समृद्धि का आगमन बना रहता है। बांझपन के दोष को भी कछुआ दूर करता है।