भगवान विष्णु की तप स्थली है बद्रीनाथ धाम

बदरीनाथ मंदिर, जिसे बदरीनारायण मंदिर भी कहते हैं, अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बदरीनाथ को समर्पित है। यह हिंदुओं के चार धाम में से एक यह धाम ऋषिकेश से २९४ किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित है। इस संदर्भ में एक पौराणिक कथा के अनुसार यहां नीलकंठ पर्वत के समीप भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतरण किया। यह स्थान पहले शिव भूमि (केदार भूमि) के रूप में व्यवस्थित था।
भगवान विष्णुजी अपने ध्यान योग हेतु स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा नदी के पास यह स्थान बहुत पसंद आया। उन्होंने नीलकंठ पर्वत के पास वर्तमान चरण-पादुका स्थल पर ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के समीप बाल रूप में अवतरण किया और क्रंदन करने लगे।
उनका रुदन सुनकर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा। फिर माता पार्वती और शिवजी स्वयं उस बालक के पास उपस्थित हो गए। माता ने पूछा कि बालक तुम्हें क्या चाहिए? उत्तर में बालक ने ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया। इस तरह से रूप बदलकर भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती से यह स्थान अपने ध्यानयोग हेतु प्राप्त कर लिया। यही पवित्र स्थान आज बदरी विशाल के नाम से सर्वविदित है।
जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तब आसमान से बहुत ज्यादा बर्फ गिरने लगी। भगवान विष्णु बर्फ में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देखकर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े होकर एक बेर (बदरी) के वृक्ष का रूप ले लिया और सारी बर्फ को अपने ऊपर सहने लगीं।
माता लक्ष्मीजी भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और बर्फ से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गर्इं। कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी बर्फ से ढकी हुई हैं। उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देखकर कहा कि हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है। सो, आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जाएगा और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बदरी वृक्ष के रूप में की है इसलिए आज से मुझे बदरी के नाथ-बदरीनाथ के नाम से जाना जाएगा। इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बदरीनाथ पड़ा। जहां भगवान बदरीनाथ ने तप किया था, वही पवित्र-स्थल आज तप्त-कुंड के नाम से विश्व-विख्यात है और उनके तप के रूप में आज भी उस वुंâड में हर मौसम में गर्म पानी उपलब्ध रहता है। यह पंच-बदरी में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिंदू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा भी बदरीनाथ व उसके आस-पास अन्य पौराणिक स्थान हैं, जिनमें तप्तकुंड अलकनंदा के तट पर स्थित है जबकि ब्रह्म कपाल में मृत्योत्तर धार्मिक अनुष्ठानों के लिए इस्तेमाल होनेवाला एक समतल चबूतरा है।
शेषनाग की कथित छापवाला एक शिलाखंड–शेषनेत्र और जहां भगवान् विष्णु ने बाल रूप में अवतरण किया था वहां यह भगवान विष्णु के पैरों के निशान एक शिला पर हैं, जिन्हें चरण पादुका कहा जाता है भी दर्शन योग्य है। नीलकंठ पर्वत शिव से जोड़ा जाता है।
जिन्हें बदरीनाथ भगवान जी की माता के रूप में पूजा जाता है, वे यहां माता मूर्ति मंदिर में विराजमान हैं।
भारत का अंतिम गांव माणा भी यहीं पास में स्थित है। माणा से ८ किलोमीटर दूर वसु धारा है, जहां अष्ट वसुओं ने तपस्या की थी। कहते हैं कि जिसके ऊपर इसकी बूंदें पड़ जाती हैं उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वह पापी नहीं होता है। सरस्वती नदी पूरे भारत में केवल माणा गांव में ही प्रकट रूप में है। वेदों और उपनिषदों का लेखन यहां स्थित वेदव्यास गुफा व गणेश गुफा में हुआ था। यहीं पास ही में भीम ने सरस्वती नदी को पार करने हेतु एक भारी चट्टान को नदी के ऊपर रखा था, जिसे भीम पुल के नाम से जाना जाता है। लक्ष्मी वन लक्ष्मी माता के वन के नाम से प्रसिद्ध है। किंवदंती है कि जिस स्थान से राजा युधिष्ठिर ने सदेह स्वर्ग को प्रस्थान किया था वह स्वर्गारोहण मार्ग सतोपंथ यहीं है। अलकनंदा नदी का उद्गम स्थान, जिसे धन के देवता कुबेर का भी निवास स्थान माना जाता है, को यहां अलकापुरी कहते हैं। भगवान विष्णु के तप से उनकी जंघा से एक अप्सरा उत्पन्न हुई, जो उर्वशी नाम से विख्यात हुई। बदरीनाथ कस्बे के समीप ही बामणी गांव में उनका मंदिर है। एक विचित्र बात और है कि जब भी बदरीनाथ जी के दर्शन करें तो उस पर्वत (नारायण पर्वत) की चोटी की ओर देखेंगे तो पाएंगे कि मंदिर के ऊपर पर्वत की चोटी शेषनाग के रूप में अवस्थित है। शेष नाग के प्राकृतिक फन यहां स्पष्ट देखे जा सकते हैं। बदरीनाथ उत्तर दिशा में हिमालय की घाटी में अवस्थित हिंदुओं का मुख्य यात्राधाम माना जाता है। मंदिर में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखंड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है। यह भारत के चार धामों में प्रमुख तीर्थ-स्थल है।