भिखारियों की बल्ले बल्ले

दिल्ली हाईकोर्ट ने भिखारियों के भीख मांगते पकड़े जाने पर दंड दिए जाने पर रोक लगा दी है। हाईकोर्ट का मानना है कि जब तक यहां मूलभूत आवश्यकताओं का अभाव है तब तक किसी को भीख मांगने से नहीं रोका जा सकता। भिखारी इस आदेश से खासे प्रसन्न हैं। वे उत्साह से नाचते हुए सिग्नलों पर ट्रैफिक बाधित कर रहे हैं और अपने भीख मांगने के कार्य में लगे हुए हैं। अब सरकारी डंडा उन्हें प्रताड़ित नहीं कर सकता। हमारे देश में भिक्षावृत्ति सदा से सम्मानित समझी गई है। भिक्षुक का पद इस देश में कभी भी दीन-हीन नहीं रहा। वह दान लेकर भी अकड़ना जानता है। कन्यादान जैसे अपूर्व और अनूठे दान में दान लेनेवाला कैसे दादागिरी पर उतारू हो जाता है। कालांतर में भिक्षुकों का पद धीरे-धीरे यहां तक उतर गया कि उन्हें दंड दिए जाने की व्यवस्था हो गई लेकिन धन्य है दिल्ली हाईकोर्ट! जिसने भिखारियों को उनका खोया हुआ पद वापस दिला दिया। अगर गहराई में उतरकर देखा जाए तो यहां कौन भिखारी नहीं है? सुबह मंदिर के बाहर भिक्षुकों को वंâबल बांटनेवाला सेठ भीतर जाकर भगवान के सामने कुर्ता फैलाकर नेमत नहीं मांगता? भिखारियों के खिलाफ डंडा चलाते पुलिसवाले कोने में जाकर सिग्नल तोड़नेवालों के आगे हाथ फैला देते हैं। जिन लोगों ने भिखारियों को जेल करने का कानून बनाया था वे खुद चुनावों में मतदाताओं के चरणों में लोट-लोटकर मतों की भीख मांगते हैं। हर इंसान किसी न किसी स्तर पर भिखारी होता है। भिखारियों को मिली इस राहत पर नाक-भौं सिकोड़नेवाले बहुत से होंगे लेकिन भिखारियों को उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उनकी बल्ले-बल्ले हो चुकी है।