भिनसार

सिमटा अंधियारा फट गई पौ
निकला सूरज हुआ भिनुसारा
पंछी जागे चहके सारे
चांदी से चमके उजियारे
पंख पैâलाए किरणों ने
नींद छोड़ के हर कोई जागा
ठंडी-ठंडी बहे पुरवाई
जैसे लगे बजे शहनाई
थोड़ी सिहरन थोड़ी ठिठुरन
दिल कितनी तेजी से भागा
चहल-पहल है दूर-दूर तक
है प्रकाश की पहुंच सभी तक
कहां धूप न पहुंची अब तक
किसने आकर तुम्हें जगाया
शांत चित हो या चंचल मन
निर्मल रहता है अंतर्मन
जैसा चाहे वैसा चेतन
बाहर का क्षण भंगुर उजियारा
निकला सूरज हुआ भिनुसारा
-नागेंद्रनाथ गुप्ता, ठाणे