" /> भोले की नगरी काशी में भक्तों ने बाबा विश्वनाथ संग खेली होली, राजसी ठाट से निकली गौना बारात तो झूम उठे भक्त

भोले की नगरी काशी में भक्तों ने बाबा विश्वनाथ संग खेली होली, राजसी ठाट से निकली गौना बारात तो झूम उठे भक्त

धूम-धड़ाका, डमरू की गड़गड़ाहट, शंखनाद, हर-हर महादेव, माता पार्वती की जय का गगनभेदी उद्घोष, फिजा में उड़ते अबीर-गुलाल के बीच बाबा विश्वनाथ का निकली गौना बारात। विश्वनाथ मंदिर के महंत डॉ कुलपति के टेढ़ी नीम स्थित नए आवास पर सुबह से ही गहमा-गहमी रही। दोपहर में भोग आरती के बाद आम भक्तों के लिए श्री काशी विश्वनाथ, माता पार्वती और माता की गोद में बैठे प्रथमेश श्री गणेश की चल रजत प्रतिमा के दर्शन का क्रम शुरू हुआ शाम 04 बजे तक जारी रहा। इस दौरान महंत आवास के आंगन में गीत गवनई का कार्यक्रम चलता रहा। महिलाएं माता के लिए विदायी गीत भी गाती रहीं। जैसे ही बाबा विश्वनाथ की पालकी टेढ़ी नीम से निकली भक्तों नेउ गगनचुंबी जयकारा लगा कर उनका स्वागत किया। इस मौके पर विश्वनाथ मंदिर के आस-पास भक्तों का ऐसा सैलाब था कि तिल रखने की जगह नहीं थी। ऐसे में भक्तों में होड़ लग गई कि पालकी को कांधा देने की। हर-हर महादेव का उद्घोष करते हुए पालकी पहुंची विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में जहां पहले से विद्यमान शिवाला पर इस चल प्रतिमा को स्थापित किया गया। फिर शुरू हुई गौने की रश्म।
पीताम्बर रंग के खादी का जरीदार कुर्ता (मिर्जई), खादी की धोती और गयासुद्दीन की सुनहरी पगड़ी धारण किए बाबा खूब फब रहे थे। वहीं माता का भी अद्भुत श्रृंगार किया गया था। माता की गोद में बैठे गणेश यानी इस पूरे भोले नाथ के परिवार को जो भी देखता, देखता ही रह गया। महिलाओं ने मां गौरा से जहां अखंड सौभाग्या का वर मांगा तो युवतियों ने भोले शंकर सदृश्य पति की कामना की। वहीं पुरुषों ने सुख-समृद्धि की कामना की।
रंगभरी एकादशी पर बाबा के पूजन का क्रम ब्रह्म मुहूर्त में मंहत आवास पर आरंभ हो गया। वैदिक ब्राह्मणों ने बाबा एवं माता पार्वती की चल प्रतिमाओं को पंचगव्य तथा पंचामृत से स्नान कराया। मंत्रोच्चार के बीच स्नान की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद चल रजत प्रतिमाओं दुग्धाभिषेक किया गया। भोर में पांच से आठ बजे तक 11 वैदिक ब्रह्मणों द्वारा षोडशोपचार पूजन किया गया। इसके बाद बाबा को फलाहार का भोग लगाकर महाआरती की गई। मध्याह्न 12 भोग आरती के दौरान दर्शन का क्रम रुका रहा। काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत डा. कुलपति तिवारी ने बाबा की मध्याह्न भोग आरती की। महंत आवास पर दोपहर 12 से सायं साढ़े चार बजे तक शिव की संगीत से अर्चना के लिए शिवांजलि का आयोजन किया गया जिसके तहत महंटके आवास के आंगन में संगीत और संस्कार के रंग बिखरे। नाददेव नटराज स्वरूप की आराधना में राग नटभैरव के माध्यम से शिवांजलि में विशुद्ध शैली में शिव की होली के दृश्यों को संगीत के संस्कारों से जीवंत किया गया।
शिवांजलि का श्रीगणेश रुद्रनाद बैंड के टाइल सांग ‘पार्वती संग सदा शिव खेल रहे होली, भूत, प्रेत बैताल करते ठिठोली…’ से बैंड के लीड सिंगर अमित त्रिवेदी ने किया। राग नट भैरव में निबद्ध उनकी रचना योगी ने माहौल को योगेश्वर शिव की अनुभूतियों से भर दिया। ‘पीकर शिव के नाम का प्याला’ बोल वाले इस गीत पर भक्तों के बीच नाचने की होड़ सी मची रही। सब एक दूसरे के ऊपर गिरते-संभलते लगातार नाचते रहे। उनके साथ जौनपुर के सौरभ शुक्ला, स्नेहा महर्षि, तान्या तिवारी, विदुषी वर्मा, मुकेश अग्रहरि, सिद्धार्थ जयसवाल, आकर्ष शर्मा, राजेश सिंह, बॉबी राडे, अतुल त्रिवेदी, आदित्य त्रिवेदी, प्रिंस वर्मा एवं यशस्वी श्रीवास्तव, बबलू ,विजय शाही, गुड्डू ने गायन और वादन में सहयोग किया।

नृत्य के बाद अमलेश ने बांधा समा
गायन के इस सत्र के बनारस में कुछ देर के लिए बृज उतर आया। विजय बाल्मीकी और उनकी टीम के साथियों ने शिव पार्वती का रूप धारण कर भक्तों को भभूत की होली का अद्भुत एहसास कराया। गायन वादन के दूसरे चरण में पूर्वांचल के चर्चित भजन गायक डा अमलेश शुक्ल अमन ने नागेंद्र हाराय त्रिलोचनाय .. से भजनों का दौर शुरू किया। इस अवसर पर महंत डा. कुलपति तिवारी ने कलाकारों को आशीर्वाद एवं बाबा का स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया। अतिथियों एवं कलाकारों का स्वागत कार्यक्रम के व्यवस्थापक संजीव रत्न मिश्र, कार्यक्रम का संचालन अरविंद मिश्र ‘शांत’ एवं धन्यवाद ज्ञापन कन्हैया दुबे केडी ने किया।
बता दें कि भोले नाथ की शादी की प्रक्रिया वसंत पंचमी से शुरू होती है। महाशिवरात्रि को बाबा का विवाह होता है और उसके बाद रंग भरी एकादशी जिसे अमला एकादशी भी कहते हैं को बाबा मां गौरा का गौना करा कर कैलाश जाते हैं। इस खास दिन के बारे में मान्यता है कि बाबा की पालकी यात्रा का दर्शन करने के लिए देव लोक से सभी देवी-देवता भी पधारते हैं। यह गौना बारात भी ठीक उसी तरह से निकलती है, इसमें अड़भंगी भी होते हैं तो भूत-पिचास की शक्तधारी लोग भी होते हैं।