मंदिर पर मध्य-रास्ता, अयोध्या अधर में

राम भक्तों को बड़ी उम्मीद थी कि कल सुप्रीम कोर्ट अयोध्या मामले में कोई महत्वपूर्ण रुख अपनाएगा। मगर ऐसा हुआ नहीं और राम मंदिर निर्माण का मामला मध्यस्थता के मोड़ पर पहुंच गया। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अयोध्या मामला एक बार फिर अधर में लटक गया। अब जस्टिस कलीफुल्ला की अध्यक्षता में गठित पैनल को इस समस्या को सुलझाने के लिए ८ सप्ताह का समय दिया गया है। इस पैनल में अध्यात्म गुरु श्री श्री रविशंकर और वकील श्रीराम पंचू को भी शामिल किया गया है। अब जहां सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का कुछ लोगों ने स्वागत किया है वहीं कुछ लोगों का मानना है कि पहले भी ऐसे प्रयास किए जा चुके हैं और कुछ हुआ नहीं इसलिए इससे कुछ नहीं सिर्फ वक्त बर्बाद होगा।

अयोध्या मामला मध्यस्थों के पास जाने के बाद यहां अयोध्या में माहौल गरम हो उठा है। कई लोगों ने इसका स्वागत किया है तो वहीं कई लोगों ने इस पर संदेह व्यक्त किया है। सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश एफएमआई कलीफुल्ला के नेतृत्व में तीन सदस्यीय समिति का गठन कर आपसी बातचीत से समस्या को सुलझाने का निर्णय दिया है जिसमें आर्ट ऑफ लीविंग के श्री श्री रविशंकर और वकील श्रीराम पंचू बतौर सदस्य शामिल हैं। कई लोगों को इस समिति में श्री श्री रविशंकर का शामिल होना नहीं भाया।

राम जन्मभूमि पर विराजमान रामलला के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने ‘दोपहर का सामना’ से बातचीत में कहा कि मंदिर-मस्जिद कहीं भी बनाए जा सकते हैं लेकिन भगवान श्री राम की जन्मभूमि बदली नहीं जा सकती। कोर्ट ने राम जन्मभूमि के प्रकरण पर समिति बना कर आम सहमति से इसके समाधान की जो पहल की है उसका स्वागत है। श्री श्री रविशंकर ने पहले भी प्रयास किया था पर असफल रहे। वे दोनों पक्षों को जानते हैं, हो सकता है उनके फॉर्मूले को दोनों पक्ष स्वीकार कर लें तो इसका समाधान हो जाएगा।

मुस्लिम पक्ष की ओर से लंबे समय से यह केस लड़ रहे बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक एडवोकेट जफरयाब जिलानी ने कहा कि हम कोर्ट के आदेश पर सहयोग करेंगे। इसके पहले २०१० में हाईकोर्ट ने धारा-८९ के तहत सुनवाई करते हुए सभी पक्षकारों के वकीलों से अपने चेंबर में पूछ कर ये लिख दिया था कि इस मामले में मध्यस्थता से समाधान संभव नहीं है। इस प्रकार का प्रयास न्यायालय द्वारा पहले कभी नहीं हुआ था।

राम जन्मभूमि न्यास के वरिष्ठ सदस्य पूर्व सांसद डॉ रामविलास दास वेदांती ने कहा कि अयोध्या की धरती पर किसी कीमत पर किसी नई मस्जिद के लिए कोई जगह नहीं है। वहां किसी प्रकार की नई मस्जिद का निर्माण होने नहीं दूंगा। बाबर के नाम पर तो हिंदुस्थान के किसी भी कोने में मस्जिद का निर्माण होने नहीं दूंगा। राम के नाम पर रामकोट है, राम जन्म भूमि है राम के नाम पर सरयू नदी है। राम के नाम पर सब कुछ है। अगर अयोध्या की धरती पर मस्जिद बनती है तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के साथ आत्मदाह कर लूंगा।

महंत रमेश दास का कहना कि जो शुरू से ही इस मामले से न जुड़ा हो, जिसे अयोध्या और भगवान राम से कोई मतलब न रहा हो, ऐसे लोगों की बातचीत से कुछ नहीं होनवाला है। इसके पहले १३-१४ लोगों ने बातचीत से इस मामले के समाधान का प्रयास किया था जिसका परिणाम शून्य रहा।

 

९० के दशक के फायर ब्रांड नेता अयोध्या के पूर्व सांसद विनय कटियार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के
फैसले का स्वागत है लेकिन इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि जहां राम की जन्मभूमि है और जहां पूजा होती है, जिस स्थान को लेकर ढाई-तीन लाख लोग बलिदान हो गए, कई बार युद्ध हो चुका, उस स्थान पर सिर्फ राम मंदिर का ही निर्माण होगा। दुनिया की कोई भी ताकत उसको रोक नहीं सकती, पूजा अनवरत चलती रहेगी। ‘मध्यस्थता की कोशिश तो पहले भी हो चुकी है?’ इस सवाल पर उन्होंने कहा कि चंद्रशेखर जी ने भी प्रयास किया था लेकिन दो सरकारें चली गर्इं इसलिए मामला लटक गया, ऐसी स्थिति में कुछ भी कहना कठिन है।

इस मामले में मुस्लिम पक्षकार हाजी महबूब ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय सहर्ष स्वीकार है। उन्होंने कहा कि बहुत लोग चाहते हैं कि यह मामला ऐसे ही लटका रहे। आपसी बातचीत से ही इस विवाद का हल हो सकता है। मध्यस्थता के लिए जिन नामों का चयन किया गया है, वे योग्य हैं।

 

निर्मोही अखाड़े के प्रवक्ता प्रभात सिंह ने मध्यस्थता की सलाह का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि कोर्ट की यह पहल अच्छी है, सभी मुख्य पक्षकार चाहते हैं कि समाधान हो जाए। बाकी सब ठीक है, मामला केवल २.७७ एकड़ भूमि का है। उसका क्या स्वरूप हो वही तय करना है।

विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता शरद शर्मा ने कहा कि इस मुकदमे को लेकर विहिप ने मध्यस्थता जैसी किसी व्यवस्था पर विश्वास नहीं जताया है। उन्होंने कहा कि मेरी मांग है कि सुप्रीम कोर्ट साक्ष्यों के आधार पर अपना पैâसला सुनाए। पहले भी कई बार मध्यस्थता की बातें  हुईं  लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। शर्मा ने कहा कि अयोध्या में शीर्ष साधु-संतों की कमी नहीं है। राम जन्मभूमि के विवाद को लेकर मध्यस्थता का औचित्य समझ से परे है। एक दर्जन बार यह कोशिश हो चुकी है। इस प्रकार की मध्यस्थता की पहल का परिणाम क्या निकला, यह संपूर्ण राष्ट्र को मालूम है! सर्वोच्च न्यायालय का इस देश की जनता सम्मान करती है। उसका जो भी प्रयास राम जन्मभूमि को लेकर है वह भी कर के देख ले, हम प्रतीक्षा करेंगे। फिलहाल राम जन्मभूमि को प्राप्त करने के लिए लाखों हिंदुओं ने जिसके लिए आहुति दी, जिसके लिए न्यायिक प्रक्रिया में ७० वर्षों से हिंदू समाज उलझा हुआ है, उसे इस मध्यस्थता से क्या प्राप्त होगा? उन्होंने कहा रामलला जहां विराजमान हैं, वह उनकी ही जन्मभूमि है, जिस पर आक्रमणकारियों ने बलात रूप से बाबरी नामक ढांचे को खड़ा कर हिंदू भावनाओं पर कुठाराघात किया, अपमानित करने के लिए इस प्रकार का षड्यंत्र किया। अब भगवान राम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर के अलावा किसी भी प्रकार का ढांचा हिंदू समाज स्वीकार करनेवाला नहीं है। उन्होंने स्मरण कराते हुए कहा पूर्व में भी १ दर्जन से अधिक अवसर आए जब देश के प्रधानमंत्री तक ने राम जन्मभूमि विवाद में मध्यस्थता कराने का प्रयास किया लेकिन मुस्लिम पक्ष सदैव भागता रहा। पूज्य संतों ने पूर्व में भी लाखों-करोड़ों राम भक्तों के सम्मुख यह घोषित कर रखा है कि अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा में मस्जिद का कोई औचित्य नहीं है। आज भी हिंदू समाज उसी पर कायम है।

राम जन्मभूमि न्यास के महंत नृत्यगोपाल दास के उत्तराधिकारी महंत कमलनयन दास ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट लगातार इस मामले को लटकाने का काम कर रहा है, जिससे करोड़ों हिंदू जनमानस को ठेस पहुंच रही है। उन्होंने कहा कि श्री श्री रविशंकर को इस मामले में डालने से कुछ नहीं होनेवाला है। कमलनयन दास ने कहा कि हम किस बात के लिए मुसलमान के घर जाकर समझौता करें? राम जन्मभूमि सिर्फ हिंदुओं का है।

राम जन्मभूमि मामले में हिंदू पक्षकार महंत धर्मदास ने कहा कि जज का ये काम सराहनीय है, क्योंकि इस बार इन्होंने समझौता कराने के लिए एक पैनल गठित किया है जो अपनी रिपोर्ट जज को देंगे। यह और अच्छी बात है कि यह पैनल अयोध्या में सारी प्रक्रिया करेगा। इस पैनल की रिपोर्ट के आधार पर जज को पैâसला करना है। इसका हम स्वागत करते हैं।