मच्छरों की ‘नसबंदी’!

मच्छरों ने पूरी दुनिया में कोहराम मचा रखा है। मुंबई भी इससे अछूता नहीं। यहां भी खाड़ी व झोपड़पट्टीवाले इलाके में इनकी भरमार है। इसके कारण कई घातक बीमारियां पैâलती हैं, जिससे हजारों लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं। इन मच्छरों की रोकथाम करने के लिए न जाने कितने उपाय किए गए पर इनकी संख्या है कि घटने की बजाय बढ़ती ही जाती है। पर अब लगता है कि वैज्ञानिकों ने इन मच्छरों के सफाए की ठान ली है। ये वैज्ञानिक मच्छरों की नसबंदी के लिए रिसर्च कर रहे हैं। ये एक दवा बना रहे हैं, जो इन मच्छरों की तेज रफ्तार से होनेवाली पैदावार पर लगाम लगाएगी।
आनेवाले वक्त में मलेरिया और डेंगू जैसी घातक बीमारियों पर लगाम लग सकती है। मच्छरों से पैदा होनेवाली इन बीमारियों से हर साल हजारों लोगों की मौत हो जाती है। ऐसे में अमेरिकी वैज्ञानिक एक ऐसा ड्रग बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं, जिससे मच्छरों के जन्म पर नियंत्रण रखा जा सकेगा। यूनिवर्सिटी ऑफ अरिजोना के शोधकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने मादा मच्छरों के लिए एक ऐसा प्रोटीन खोजा है, जो उनके बच्चों के सेने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। जब वैज्ञानिकों ने इस प्रोटीन को ब्लॉक कर दिया तो मादा मच्छरों ने डिफेक्टिव सेल्सवाले अंडे दिए, जिनकी वजह से भ्रूण अंदर ही मर गए। शोधकर्ताओं की टीम ने कहा कि अगर ऐसा ड्रग या दवाई विकसित की जाए जो इस प्रोटीन पर टार्गेटेड हो, उससे मधुमक्खियों जैसे लाभकारी कीड़ों को नुकसान पहुंचाए बिना मच्छरों की आबादी को कम करने का एक तरीका मिल सकता है। यूनिवर्सिटी के केमिस्ट्री और बॉयोकेमिस्ट्री डिपार्टमेंट के चीफ रोजर मीसफेल्ड ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण खोज है, इससे न सिर्फ मच्छरों की जनसंख्या पर नियंत्रण पाया जा सकता है बल्कि यह अन्य तरीकों की तुलना में कहीं ज्यादा सुरक्षित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मच्छर दुनिया के सबसे घातक जानवरों में से एक हैं। संगठन ने चेतावनी दी है कि मलेरिया के खिलाफ वैश्विक प्रगति रुक रही है। २०१६ में लगभग २१६ मिलियन लोग इस बीमारी से संक्रमित हुए, जिनमें से ४ लाख ४५ हजार लोगों की मौत हो गई। इन लोगों में मुख्य रूप से शिशु और छोटे बच्चे शामिल थे। मीसफेल्ड ने कहा कि मच्छरों को नियंत्रित करने के लिए जिन मौजूदा तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, वे बेहद पुराने हैं। इतने लंबे समय से इस्तेमाल किए जाने की वजह से मच्छर प्रतिरोधी बनते जा रहे थे। उन्होंने कहा कि शोध टीम यह जानकर हैरान थी कि जिन मादा मच्छरों पर ट्रीटमेंट किया गया, वे अपने बाकी जीवनकाल के दौरान रिप्रड्यूस नहीं कर सकती थीं। उन्होंने आगे उम्मीद जताई कि इस नई खोज की वजह से आनेवाले पांच सालों में कीटनाशकों की एक नई खेप तैयार की जा सकेगी।