मजबूर मजदूर लापरवाही लील रही है

हिंदुस्थान में सबसे ज्यादा ऊंची इमारतें मायानगरी मुंबई में हैं। इन इमारतों में देश के संपन्न लोग रहते हैं। मगर इन इमारतों को बनाने में जो मजदूर अपना खून-पसीना बहाते हैं, उनकी सुरक्षा में बिल्डर व ठेकेदार भारी लापरवाही बरतते हैं। यही कारण है कि काम के दौरान हर वर्ष दर्जनों मजदूरों की मौत हो जाती है। जब भी कोई हादसा होता है तो जांच के आदेश दिए जाते है, बिल्डर/ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज होता है। एक-दो लोगों की गिरफ्तारी भी होती है। फिर मामला ठंडा पड़ जाता है और मजदूरों की जिंदगियों के साथ खिलवाड़ का सिलसिला जारी रहता है। कल चेंबूर की घटना इसका प्रमाण है, जहां २ मजदूरों की ऊंची इमारत से गिरने से मौत हो गई।
ऐसी घटनाएं रुकती नहीं क्योंकि पेट की आग के सामने लाचार मजदूर मौत के साए में मजदूरी करने को मजबूर रहता है। देश में बेरोजगारी इतनी है कि अगर कोई काम के लिए मना करता है तो १० दूसरे हाजिर हो जाते हैं। भवन निर्माता एवं ठेकेदार शायद इसीलिए मजदूरों की सुरक्षा को ज्यादा महत्व नहीं देते हैं। थोड़े से पैसे बचाने के लालच और जल्दबाजी के चक्कर में भवन निर्माण पर सुरक्षा संबंधित नियमों की अनदेखी की जाती है, जिसका खामियाजा मजदूर एवं उसके परिवार को भुगतना पड़ता है। बीते सप्ताह गोरेगांव में एक १८ वर्षीय मजदूर इसी तरह हादसे का शिकार हो गया था। ठाणे में १८ मंजिला इमारत की परांची गिरने से ८ मजदूर घायल हो गए थे। एक अनुमान के अनुसार हर साल अकेले मुंबई में ६० मजदूरों की मौत भवन निर्माण कार्य के दौरान होनेवाले विभिन्न हादसों में होती है। भवन निर्माण स्थलों पर कार्य में जान जाने के खतरे से अवगत होने के बाद भी मजदूर इस काम को करते हैं। पेट की आग और परिवार को पालने की बेबसी के कारण वे ऐसा करने को मजबूर होते हैं। मुंबई में हजारों ऊंची इमारतें बनकर तैयार हैं, जिनमें सबसे ऊंची इमारत ३२० मीटर ऊंची बताई जाती है। अभी सैकड़ों इमारतें निर्माणाधीन हैं, जिनमें कुछ तो ५०० मीटर तक ऊंची भी हो सकती हैं। ऐसे में पहले से मौजूद इमारतों के रखरखाव तथा नई बन रही इमारतों में कार्यरत हजारों मजदूरों की सुरक्षा को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। भवन निर्माताओं, ठेकेदार तथा सभी संबंधित पक्षों को मजदूरों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए।