मतलब समझे?

किसी ने कहा था…. कुछ वर्ष पहले, ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा।’ एकदम कड़क आवाज… जुमला भी जबरदस्त। लोग बोले, वाह! अब लगी वाट इनकी। सिस्टम का करप्शन खत्म समझो। भ्रष्ट तंत्र सावधान! मतलब चेतावनी ‘साहब’ की है न! अब तो आएंगे ये पहाड़ के नीचे। बाबू ‘भ्रष्टाचारी’ वगैरह भी टेंशन में… खुराक कम करनी पड़ेगी। सन्नाटा ही छा गया सिस्टम में…। हम हिंदुस्थानी भी न… बातों का तुरंत अर्थ निकाल लेते हैं। बात समझे नहीं और जोड़ दिया किसी से। अब साहब क्या बोले थे? ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा। ’मतलब ‘न खाऊंगा तो समझे, ‘न खाने दूंगा’ यानी किसको? उनको … या तुमको? तुमको ही न! हम बात का गलत अर्थ लगाएं तो गलती उनकी क्या? बेचारे बाबू डिप्रेशन में ही चले गए। कसम से १२५ करोड़ में एक भी समझदार नहीं निकला। सब बुड़बक। किसी को ‘अस्सल’ अर्थ नहीं समझा। इसका तात्पर्य कदापि सरकारी उपक्रम से नहीं था। वो जो ‘खानेबंदी’ की बात थी, वो सिस्टम की नहीं, तुम्हारी थी। तुम्हारी मतलब? तुम्हारी-हमारी सबकी। हां, ‘जुमला’ जबरदस्त था। बिलकुल आईएएस के इम्तहान जैसा,WHAT COMES TWICE IN A WEEK, ONE IN A YEAR? पब्लिक सोच-सोच कर पागल। ऐसा क्या है, जो सप्ताह में दो बार पर साल में एक बार ही आता है? खोपड़ी भन्ना गई। पर जवाब एकदम सिंपल ‘E’… जो ‘WEEK’ में दो बार पर ‘YEAR’ में एक बार आता है। समझे, ऐसा जवाब देकर आईएएस ऑफिसर बना जाता है। अब सही जवाब सबको आता तो सब आईएएस नहीं बन जाते क्या? वैसे साहब के सवाल का तो कोई जवाब ही नहीं। आईएएस भी फेल। बिल्कुल नहीं समझा किसी को। बस, सारा लफड़ा इसमें ही हो गया। सिस्टम को भी लगा कि साहब उनके ही बारे में बोल रहे हैं। सिर्फ साहब को मालूम था अस्सल टारगेट कौन है… बेचारी पब्लिक। बस, साहब बोले और शुरू हो गई पब्लिक की ‘खाना’ बंदी। बाजार से, कारोबार से, रोजगार से और आखिर में… बैंक से भी। तो साहब ने अपना दिया हुआ शब्द पाला की नहीं? अब बोलो, साहब किधर से गलत हैं? पेट्रोल-डीजल महंगा रखा न? नोटबंदी का फटका दिया न? जीएसटी में लटकाया न? महंगाई कायम रखी न? रखा न आपकी ‘खाना’ बंदी का पूरा खयाल? ये मतलब था ‘न खाने दूंगा’ का। समझे अब? बोलो, साहब हुए न आईएएस से भी स्मार्ट? बेकार में बेवजह की गलतफहमी पाली आपने… और टेंशन बेचारे सिस्टम को। अब देखो, अगर इसके मायने सिस्टम से होते या सरकारी उपक्रम से होते तो क्या उनकी बैंक, जिनमें आपका पैसा जमा है, नहीं सुनती उनकी? क्या बिसात है बैंकों की साहब के सामने? पर सुनी क्या उन्होंने? नहीं न? खाया न आपका पैसा? और वो जो यूपीए के टाइम में खाते और खिलाते थे, उसको डबल, डबल से ट्रिपल और फिर ट्रिपल से पता नहीं कितना गुना कर डाला। हां, बैंकों को अड़चनें जरूर आर्इं खाने में, पर उन्होंने सबको खिलाया विजय माल्या को भी और नीरव मोदी को भी। अड़चनों को अवसर में कैसे बदलते हैं, सीखना चाहिए बैंकों से। अब नोटबंदी की अड़चन को भी बैंकों ने अवसर में बदला ना? पता है न कैसे? इसे कहते हैं मौके पर चौके मारना। हर घंटे ९ करोड़… हर दिन २१७ करोड़ ‘खा’ डाले और डकार भी नहीं मारी उन्होंने। किसने? सरकारी बैंकों ने! जबदरस्त रहा न ये सरकारी ‘उपक्रम’। ये तो पब्लिक ने टेंशन दे दिया गलतफहमी का… नहीं तो बैंकों का टारगेट और जबरदस्त था। खैर, फिर भी कम नहीं है। हां, यूपीए के टाइम कम था थोड़ा। एनपीए देखें तो २०१३ में १५६ हजार करोड़ था, जो २०१४ तक मुश्किल से २१७ हजार करोड़ तक पहुंचा। २०१५ में नई सरकार के टाइम में थोड़ा गलतफहमी का टेंशन था, तो भी एनपीए २६३ हजार करोड़ पहुंचा डाला। टेंशन खत्म हुआ तो २०१६ में सीधे ५०२ हजार करोड़, २०१७ में ६४१ हजार करोड़ और अभी २०१८ में सीधे ८५७ हजार करोड़ का ‘रायता’ पैâला डाला। ‘खा’कर जो नुकसान किया वो ८० से ८७ हजार करोड़ का अलग से। पंजाब-सिंध बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, युनाइटेड बैंक, देना बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, सिंडिकेट बैंक, आंध्रा बैंक, कॉर्पोरेशन बैंक, कैनरा बैंक, यूके बैंक, इलाहाबाद बैंक, सेंट्रल बैंक, यूनियन बैंक, ऑरिएंटल बैंक, बैंक ऑफ इंडिया और अपनी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया सबने कमाल दिखाया। हां, सबसे जबरदस्त कमाल आईडीबीआई का रहा। पीएनबी कैसे पीछे रह सकती थी? उसने नुकसान में बाजी मारी तो आईडीबीआई ने एनपीए में। इंडियन बैंक और विजया बैंक ने खाली-पीली मुनाफा करके नाक कटा डाली। उस पर ये प्राइवेट बैंक वाले। उन्होंने भी फोकट में ४२ हजार करोड़ का फायदा कर डाला। खैर, देर से ही सही, सबकी गलतफहमी खतम हो गई। अब साहब क्या बोले थे, उसका मतलब सबको समझ आ गया न। सिस्टम तो पहले ही समझ गया। अब आप भी समझ जाओ।