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मद!, जान बचानेवाले सिपाही ने जान गंवाई

मां-बाप का रसूख, पैसा या फिर घर एवं मोहल्ले का माहौल कभी-कभी बच्चों को अभिमानी और उग्र बना देता है। कुछ ऐसे ही हालातों ने एक १७ वर्षीय नाबालिग को हत्यारा बना दिया। परिवार की दबंगई के जोश में उसने एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी का उस समय कत्ल कर दिया, जब पुलिसकर्मी ने हेलमेट और दस्तावेजों के बिना बाइक चलाने के मामले में उसका चालान किया था। ट्रैफिक पुलिस के सिपाही की हत्या के इस मामले को कोर्ट ने गंभीरता से लिया और एक नाबालिग सहित दो आरोपियों के खिलाफ सत्र न्यायालय में सुनवाई का निर्णय लिया। शनिवार को सत्र न्यायालय ने उक्त मामले में बालिग आरोपी को उम्र कैद की सजा सुना दी जबकि नाबालिग आरोपी के खिलाफ मामला फिलहाल विचाराधीन है।
सड़क हादसों में सबसे ज्यादा दुपहिया वाहन चालक अपनी जान गंवाते हैं। लापरवाही या रफ्तार के शौक में संतुलन बिगड़ने या कभी-कभी दूसरे वाहन चालकों की गलती से भी वे हादसे का शिकार होते हैं। हादसाग्रस्त दुपहिया वाहन चालक ज्यादातर सिर में चोट लगने के कारण ही मर जाते हैं। हादसों में जान बचाने के लिए दुपहिया वाहन चालकों को हेलमेट पहनना अनिवार्य किया गया है। हेलमेट के बगैर बाइक चलानेवालों से ट्रैफिक पुलिस जुर्माना वसूलती है ताकि उन्हें सबक मिले और वे कम से कम जुर्माने से बचने के लिए ही अगली बार हेलमेट पहन कर बाइक चलाएं। भले ही ऐसा करने के पीछे पुलिस और कानून का मकसद बाइकरों को उनके जीवन और सुरक्षा का महत्व समझाना होता है लेकिन बाइकर हेलमेट के बिना बाइक चलाने की फितरत को शान और स्टाइल का प्रतीक मानते हैं। प्राय: ट्रैफिक पुलिस द्वारा रोकने या जुर्माना मांगना बाइकरों को अपना अपमान लगता है इसलिए बाइकर खासकर युवक अक्सर ट्रैफिक पुलिस से हुज्जत करने लगते हैं। ३ साल पहले इसी तरह की हुज्जत के कारण ट्रैफिक पुलिस के सिपाही विलास शिंदे को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।
दरअसल २३ अगस्त, २०१६ को सिपाही विलास शिंदे, खार-पश्चिम के एसवी रोड स्थित मैक्लॉइड पेट्रोल पंप के पास तैनात थे। उसी समय उन्होंने एक नाबालिग लड़के को हेलमेट के बिना दुपहिया वाहन चलाते देखा। बिना हेलमेट के बाइक चला रहे १७ वर्षीय इब्राहिम (बदला हुआ नाम) को शिंदे ने रोका और उसका ड्राइविंग लाइसेंस व गाड़ी के कागजात दिखाने को कहा, जो कि बाइकर के पास नहीं थे। शिंदे ने इब्राहिम को निर्देश दिया कि वह अपनी मोटरसाइकिल की चाबी दे और अपने परिवार के सदस्यों को बुलाए। इसके बाद इब्राहिम ने अपने २१ वर्षीय बड़े भाई सलीम (बदला हुआ नाम) को फोन करके वहां बुला लिया। मौके पर पहुंचा सलीम, सिपाही शिंदे से विवाद करने लगा। उसी दौरान सलीम ने डंडे से शिंदे के सिर पर जोरदार प्रहार कर दिया। दोनों भाइयों ने जमीन पर गिरे शिंदे को पेट और छाती आदि में लात से मारा और उनकी जेब से चाबी निकालकर वहां से फरार हो गए। गंभीर रूप से जख्मी शिंदे को इलाज के लिए बांद्रा-पश्चिम के रिक्लेमेशन स्थित लीलावती अस्पताल में भर्ती किया गया, वहां ९ दिन तक मौत से संघर्ष करने के बाद ३१ अगस्त, २०१६ को शिंदे जिंदगी की जंग हार गए।
बताया जाता है कि इब्राहिम एवं सलीम का परिवार उस इलाके में दबंग माना जाता है। उनके परिजनों की राजनीतिज्ञों एवं स्थानीय पुलिस थानों में अच्छी पैठ थी। इसी रसूख ने बच्चों को उद्दंड बना दिया। यहां तक कि उन्होंने बिना हेलमेट के बाइक चलाने के बाद पुलिसकर्मी पर हमला करने तक की हिमाकत कर डाली। तत्कालीन पीआई (अपराध) राजेंद्र काने के मार्गदर्शन में खार पुलिस ने मामला दर्ज करके इब्राहिम और सलीम को २४ घंटे के अंदर गिरफ्तार कर लिया। प्रशासन द्वारा शहीद घोषित किए गए विलास शिंदे की हत्या के मामले में मुंबई की सत्र अदालत ने आरोपी इब्राहिम एवं सलीम के खिलाफ लगे आरोपों को गंभीरता से लिया और सलीम सहित इब्राहिम के खिलाफ सत्र न्यायालय में सुनवाई करने का निर्णय लिया। लगभग ३ वर्ष तक चले इस मामले में कोर्ट ने शुक्रवार को सलीम को दोषी करार दिया है। अदालत ने पुलिसकर्मी विलास शिंदे की हत्या के दोषी सलीम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, साथ ही दोषी पर ५०,००० रुपए का जुर्माना भी लगाया है, वहीं इब्राहिम के खिलाफ मामला फिलहाल कोर्ट में विचाराधीन है।
आरोपी को नहीं है पछतावा
उल्लेखनीय है कि उम्रवैâद की सजा मिलने के बाद भी आरोपी को अपने किये पर कोई पछतावा नहीं है। पुलिस के एक सूत्र की मानें तो शुक्रवार को सजा पर पैâसले के सिलसिले में पुलिस सलीम को कोर्ट में ले जा रही थी, तब उसकी मां ने उसे न्यायाधीश के सामने अपनी कम उम्र, छात्र होने एवं मर्चेंट नेवी में नौकरी किये जाने की दुहाई देने का सुझाव दिया ताकि सजा कम हो सके। तब सलीम ने अपनी मां से उद्दंडता से कहा कि संजय दत्त की फिल्म देख कर आई हो क्या? ये सब सिर्फ फिल्मों में होता है।