" /> मध्यांतर… जुबानी जमा खर्च का हिसाब तो जनता मांगेगी!

मध्यांतर… जुबानी जमा खर्च का हिसाब तो जनता मांगेगी!

मध्यप्रदेश में जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे राजधानी भोपाल में अटकलों का बाजार गर्म होता जा रहा है। चाहे चंबल का सियासी रण हो या मालवा निमाड़ और बाकि अन्य सीटें, मतदाताओं की चुप्पी ने सभी राजनैतिक दलों को बैचेन कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषक केवल अंदाज ही लगा पा रहे है की आगे क्या होगा। भारतीय जनता पार्टी जहां आत्ममुग्ध दिखाई दे रही है, वहीं कांग्रेस पार्टी वापसी के लिए पूरा जोर लगा रही है। कमलनाथ जिस ढंग से पूरा चुनाव सञ्चालन कर रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि नतीजे उनके पक्ष में आ सकते हैं। हालांकि सारे गणित फिलहाल उनके पक्ष में नहीं हैं और मामला विशुद्ध रूप से अब जनता के पाले में है। कांग्रेस ने बड़ी खूबसूरती के साथ चंबल में भाजपा को नहीं बल्कि सिंधिया को घेर लिया है। सिंधिया उस समय कांग्रेस की रणनीति से झुंझला गए जब एक बैठक में उन्होंने मार्मिक अपील की कि गांव-गांव तक ये संदेश भिजवा दो कि ये चुनाव महाराज का है और उनकी इज्जत दांव पर लगी है। इसके बाद भू-माफिया वाला विवाद भी कांग्रेस पार्टी ने बहुत जोर-शोर के साथ उठाया है। दरअसल ये चुनाव सिंधिया के भविष्य को तय करेंगे। इधर सिंधिया को ग्वालियर में भाजपा के असंतुष्ट नेताओं से भी खतरा लगातार बना हुआ है। भाजपा के अंदरखाने कि जो खबरें हैं, उन पर यदि भरोसा किया जाए तो सिंधिया के सुसराल बड़ौदा राजघराने का केंद्र में अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी के साथ काफी अच्छा संबंध है और जब सिंधिया भाजपा में शामिल हुए थे, तब वो बाकायदा एक कॅरियर प्लान लेकर शामिल हुए थे। इसमें बड़ौदा राजघराने ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस सिलसिले में ही ये माना जा रहा है कि सिंधिया भविष्य में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की दावेदारी भी कर सकते हैं और ये बहुत गौर से समझने पर दिखाई भी पड़ता है। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने मध्यप्रदेश के उन इलाकों के कार्यकर्ताओं में पैठ बनाने की कोशिश की जहां से उन्हें भविष्य में समर्थन की जरुरत पड़ सकती है। इस नजरिए से देखा जाए तो भाजपा के अंदरूनी मामले में कुछ सुगबुगाहट जरूर चल रही है, जिसका इन चुनावी नतीजों पर असर साफ दिखाई पड़ सकता है। ये इसलिए भी सोचा जा सकता है कि भाजपा ने भी चुन-चुन के असंतुष्ट नेताओं को चुनावों में बड़ी जिम्मेदारियां दी हैं। अब यही बात सिंधिया समर्थक पूर्व कांग्रेसियों को असुरक्षा की भावना से भर रही है क्योंकि उनको पता नहीं है कि दूध की रखवाली बिल्ली से कैसे करवाई जाती है! चुनावी मैदान में भी सभी पूर्व कांग्रेसी नेता अपनी पुरानी टीम पर ज्यादा भरोसा करते नजर आ रहे है। बाहरी तौर पर बहुत कुछ नजर नहीं आता लेकिन मध्यप्रदेश की ठाकुर लॉबी चाहे भाजपा हो या कांग्रेस, किसी गुनताड़े में है। खासकर चंबल में तो यही नजर आ रहा है।
मुरैना जिले की पांच सीटों पर भी सब कुछ ठीक नहीं है। गौरतलब है कि यहां से लोकसभा संसद केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर है और उनकी ही लोकसभा सीट पर राजनीति का अखाड़ा सजा हुआ है। हार हो या जीत, दोनों ही स्थिति में नरेंद्र सिंह तोमर की हार होगी। इधर ग्वालियर में जयभान सिंह पवैया और प्रभात झा भी महल विरोधी माने जाते हैं और उन पर भी चुनावी दायित्व है तो सिंधिया पर हर तरफ से दबाव बना हुआ है। भाजपा में अंदरूनी तौर पर और कांग्रेस पार्टी में भी सिंधिया फैक्टर को खत्म करने में वैसे तो पूरी पार्टी एक साथ है लेकिन दिग्गविजय सिंह इन सभी नतीजों में पहेली बने हुए हैं। उनका रुख हालांकि पार्टी की लाइन में है लेकिन, प्रदेश कि ठाकुर लॉबी ने क्या तय कर रखा है, ये तो दोनों ही दल नहीं जानते।
कमलनाथ का प्लान बी!
भोपाल के राजनैतिक गलियारों में चुनाव परिणामों के बाद क्या होगा, इस पर अभी से मंथन शुरू हो गया है। प्लान ए के मुताबिक कांग्रेस कुछ सत्रह सीटों पर जीतने का प्रयास करेगी, इसके बाद यदि पंद्रह सीटें जितने में कामयाबी मिल गई तब कमलनाथ का प्लान बी काम करेगा जिसमे अभी से ही भाजपा के पुराने और एकदम नए विधायकों की कुंडली बनाई जाना शुरू हो गई है। इस कवायद के साथ ही कांग्रेस पार्टी छोड़ कर भाजपा गए कुछ विधायकों पर भी नजर रखी जा रही है। कुल मिला कर कमलनाथ आर-पार की लड़ाई में दिखाई दे रहे हैं और अगर चुनाव परिणाम कांग्रेस के अनुकूल नहीं आते हैं तब निर्दलीय, सपा और बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर कमलनाथ कोई सियासी तिकड़म लगा सकते हैं। राजनैतिक विश्लेषक ये मानते हैं कि ठीक अजीत जोगी की तर्ज पर मध्यप्रदेश में भी भाजपा को तोड़ा जा सकता है। जब छत्तीसगढ़ राज्य बना था तब कांग्रेस के नवोदित नेता अजीत जोगी ने भाजपा के १३ से भी ज्यादा विधायकों को तोड़ लिया था। फिलहाल कमलनाथ इस लड़ाई को टेक्निकल ढंग से लड़ते दिखाई दे रहे हैं। वहीं भाजपा इस बात से बेपरवाह नजर आ रही है। कछुआ और खरगोश की कहानी के अपने सबक हैं, जिसे सभी को याद रखने कि जरूरत है।
अभी कमलनाथ केवल तकनीकी रूप से खुद को मजबूत बनाने में लगे हुए हैं और आगे-पीछे हर परिस्थिति में अपनी रणनीति को कैसे आगे बढ़ाना है? इस पर ज्यादा काम कर रहे हैं। मध्यप्रदेश के ये चुनाव कुछ और लोगों के राजनैतिक कैरियर पर असर डालेंगे। इनमें कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र सिंह तोमर, उमा भारती , जयभान सिंह, प्रभात झा और कांग्रेस पार्टी में दिग्गविजय सिंह और चंबल के डॉक्टर गोविंद नारायण सिंह प्रमुख हैं। अब कौन किसको कब और कहां साध लेगा, कौन किसके काम आ जाएगा, ये तो अब चुनाव परिणामों से ही पता चलेगा। इतना तो तय है कि इन चुनावों के बाद मध्यप्रदेश की राजनीति में एक नए ही युग की शुरुआत होगी, कुछ बुर्ज ढह जाएंगे तो कुछ नए खड़े होंगे। कोई वापसी करेगा तो कोई नई पदस्थापना में जाएगा। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल अपनी अपनी संगठन की कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं, ये तो वक्त ही बताएगा। जुबानी जंग भी इस चुनाव में पहली बार देखने को मिल रही है जो शायद पहले कभी इतनी नहीं हुई। भाजपा हो या कांग्रेस एक-दूसरे को पीछे छोड़ने के चक्कर में कोई भी कसर नहीं छोड़ना चाहता है। जुबान फिसलने के मामलों में भी सिंधिया समर्थकों ने नया ही रिकॉर्ड कायम किया है। कई बार भाजपा को ही कई मंत्रियों ने निशाने पे ले लिया और बाद में डैमेज कंट्रोल करने में पसीने भी आ गए। इन सभी के बीच जनता जनार्दन का मौन सबसे ज्यादा दिलचस्प है, जो बस खमोशी के साथ ये नजारा देख रही है। १० नवंबर को दूध का दूध पानी का पानी होने की पूरी संभावना है।