" /> मध्य प्रदेश की ‘उल्टी बारात’!

मध्य प्रदेश की ‘उल्टी बारात’!

भगवान देता है और कर्म नाश कर देता है। यही हालत कांग्रेस पार्टी की हो गई है। मध्य प्रदेश कांग्रेस में बगावत हो गई। विधिमंडल में कांग्रेस में फूट पड़ गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस के लगभग २२ विधायकों ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। सिंधिया ने भाजपा में प्रवेश किया। इससे कमलनाथ की सरकार अल्पमत में आ गई। मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार अगर गिरती है तो उसका श्रेय भाजपा का चाणक्य मंडल न ले। कमलनाथ की सरकार जो गिरती हुई दिख रही है उसका कारण उनकी लापरवाही, अहंकार और नई पीढ़ी को कम आंकने की प्रवृत्ति है। दिग्विजय सिंह और कमलनाथ मध्य प्रदेश के पुराने नेता हैं। कमलनाथ भी पुरातन हैं। उनकी आर्थिक शक्ति अधिक है इसलिए बहुमत के मुहाने पर रहते हुए यहां-वहां से विधायकों को इकट्ठा करके समर्थन प्राप्त किया था। ये सच भले ही हो फिर भी मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को नजरअंदाज कर राजनीति नहीं की जा सकती। सिंधिया का प्रभाव पूरे राज्य पर भले ही न हो लेकिन ग्वालियर और गुना जैसे बड़े क्षेत्रों में सिंधियाशाही का प्रभाव है। विधानसभा चुनाव के पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ही कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा थे। लेकिन बाद में वरिष्ठों ने उन्हें एक ओर कर दिया और दिल्ली हाईकमान उन्हें देखता रह गया। उस समय मध्य प्रदेश की स्थिति गुत्थम-गुत्थावाली थी जरूर लेकिन लोकसभा चुनाव हारनेवाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को ‘कबाड़’ में डालना कांग्रेस के लिए आसान नहीं था। इस असंतोष के कारण समय-समय पर चिंगारियां फूट रही थीं। उस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा था और बहुमत के मुहाने पर बैठी सरकार को हम खींच ले जाएंगे, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ऐसा भ्रम पाले बैठे थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया बहुत कुछ नहीं मांग रहे थे। शुरुआत में उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष पद मांगा था। उसके बाद उन्होंने राज्यसभा की उम्मीदवारी मांगी, ऐसी चर्चा है। इनमें से कोई एक मांग भी मान ली गई होती तो कांग्रेस पर ये नौबत नहीं आ पाती। ज्योतिरादित्य जैसा नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में नहीं गया होता। सिर्फ ८ महीने पहले ही इन्हीं ज्योतिरादित्य ने भाजपा को ‘लोकतंत्र का गला घोंटनेवाली पार्टी’ के रूप में संबोधित किया था। उन्होंने यह प्रतिक्रिया भाजपा द्वारा उधेड़बुन करके कर्नाटक की कांग्रेस-जेडी (एस) की सरकार गिराने के बाद दी थी। १५ दिन पहले ही दिल्ली में हिंसा के बाद उन्होंने भाजपा नेताओं पर ‘द्वेष की राजनीति’ पैâलाने का आरोप लगाया था। अब वही ज्योतिरादित्य ये कहकर भाजपावासी हो गए हैं कि ‘अब कांग्रेस पार्टी पहले जैसी नहीं रही।’ सच कहें तो गत विधानसभा चुनाव में बड़ी लड़ाई लड़ते हुए राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी। उस समय उसका श्रेय राहुल गांधी को मिला था। इन दोनों राज्यों को भाजपा से खींचना आसान नहीं था। दोनों ही राज्यों में भाजपा के तत्कालीन दिग्गज सरकार चला रहे थे। कांग्रेस संगठन वहां शिथिल हो चुका था। मोदी का प्रभाव था ही। ऐसी परिस्थिति में युवाओं, किसानों और मेहनतकशों ने कांग्रेस को वोट दिया था। दोनों राज्यों में भाजपा की हार हुई थी और कांग्रेस सरकार ‘टोंक’ पर बनाई गई। इसलिए खुद को वरिष्ठ समझनेवाले पुरातन लोगों के हाथ मुख्यमंत्री का पद लग गया। अगले लोकसभा चुनाव में दोनों राज्यों में कांग्रेस की हार हुई। पूरे राजस्थान से कांग्रेस को एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली। मुख्यमंत्री गहलोत के पुत्र जोधपुर मथुरा विधानसभा क्षेत्र से बुरी तरह हारे। खुद श्री गहलोत जोधपुर में डेरा जमाए बैठे थे और वहीं मध्य प्रदेश में कमलनाथ के पुत्र ने जैसे-तैसे जीत हासिल की। जब पुराने लोग असफल साबित होते हैं तब नए लोगों को मौका देकर उनके नेतृत्व पर भरोसा करने की आवश्यकता होती है। वैसा हुआ नहीं। इसलिए राजस्थान में भी युवा और जुझारू सचिन पायलट तथा मुख्यमंत्री गहलोत में संघर्ष जारी है। वो नहीं मिटा तो राजस्थान भी मध्य प्रदेश का रास्ता चुन लेगा, ऐसा छाती ठोंककर कहा जा रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पहले असम और हरियाणा हारे। असम के कुछ मजबूत नेता दिल्ली का चक्कर लगाकर थक गए और आखिरकार भाजपावासी हो गए। इसलिए असम में भाजपा की सरकार आई। कांग्रेस नेतृत्व पुराने लोगों के जाल में अटका हुआ है। इससे नए लोगों में तिलमिलाहट है और ये मध्य प्रदेश के घटनाक्रम से स्पष्ट हो गया। सोनिया गांधी पुराने नेताओं का प्रतिनिधित्व कर रही होंगी फिर भी प्रियंका गांधी और राहुल गांधी को चाहिए कि वे युवाओं की नब्ज पकड़ें। मध्य प्रदेश में आगे क्या होगा ये जल्द ही समझ में आ जाएगा लेकिन वहां के घटनाक्रम को देखकर महाराष्ट्र के भाजपावाले ज्यादा न कूदें। मध्य प्रदेश की राजनीति अपनी जगह है, महाराष्ट्र में कमलपंथी दिन में सपने न देखें। राज्य की महाविकास आघाड़ी सरकार उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में चल रही है। वो मजबूत और अभेद्य है। वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता। इसलिए हम सिर्फ इतनी ही सलाह दे सकते हैं कि वे सपना देखना छोड़ दें। भाजपा ने लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया को पूरी ताकत लगाकर हराया। पार्टी के कई महारथी वहां पर जमे हुए थे। उन्हीं ज्योतिरादित्य सिंधिया का आज भाजपा ने गाते-बजाते पार्टी में प्रवेश कराया। उनके नेतृत्व गुण की स्तुति की। मतलब पिछले साल भाजपा ने उनकी ‘हार की यात्रा’ निकाली। आज उनका मान-सम्मान करते हुए पार्टी में ले लिया। मध्य प्रदेश की यह ‘उल्टी बारात’ भाजपा के लिए भले खुशगवार लग रही हो फिर भी कांग्रेस के वर्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ भी कोई नए खिलाड़ी नहीं हैं, बल्कि मंजे हुए राजनीतिज्ञ हैं। वे जुगाड़ू और करामाती नेता हैं। वे आसानी से हार नहीं माननेवाले। कुछ महीने पहले जिस प्रकार महाराष्ट्र में अनपेक्षित राजनीतिक घटनाक्रम हुआ वैसा ही धक्कादायक ‘प्रयोग’ मध्य प्रदेश में भी हो सकता है। मध्य प्रदेश में ‘उल्टी बारात’ में नाचनेवाले भाजपा के ‘बाराती’ इस बात का खयाल रखें!