" /> मनहूस फरवरी न आए कभी!

मनहूस फरवरी न आए कभी!

अतीत में कुछ तारीखें ऐसी गुजरी हैं, जिन्होंने सिर्फ दर्द के सिवाए कुछ नहीं दिया। वो तारीखें जब भी लौटकर आएंगी तो तन-मन को झकझोरने के अलावा कुछ और नहीं करेंगी? पिछली साल की तरह इस साल की फरवरी भी मनहूस गुजरी। पिछले वर्ष आतंकियों द्वारा पुलवामा में ४४ जवानों के कत्लेआम से पूरा देश रो पड़ा था। पुलवामा का दर्द आज भी टीस देता है। कमोबेश, वैसा ही इस साल की फरवरी में भी हुआ। दिल्ली में दंगे हुए, दंगों ने दर्जनों लोगों के घरों के चिरागों को बुझा दिए। काश, ऐसी मनहूस फरवरी भविष्य में कभी न आए। दिल्ली दंगों की आग फिलहाल धीरे-धीरे ठंडी पड़ रही है। पर, दंगों ने जो जख्म दिए हैं, वह शायद कभी भर पाएं। जब भी फरवरी आएगी, लोगों के जख्म हरे होंगे। चौबीस फरवरी की काली सुबह को दिल्लीवासी शायद ही कभी भुला पाएंं।
िंहसावाले दिन राजधानी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हिंदुस्थान में मेहमान के रूप में थे, लिहाजा समूचे िंहदुस्थान की नजरें उन पर थीं। उसी वक्त दिल्ली में खूनी होली खेलने की तैयारी भी हो रही थी। दिल्लीवासी बेखबर थे, आनेवाले खतरों से अंजान थे। हर दिन की तरह लोग अपने काम-धंधों में व्यस्त थे। दिल्ली का यमुनापार कहा जानेवाला पूर्वी इलाका जो हमेशा से भाईचारे और अमन-शांति के लिए जाना जाता है, उसमें अचानक हलचल होने लगती है। देखते ही देखते ताबड़तोड़ पत्थरबाजी शुरू हो जाती है। दुकान में बैठे दुकानदारों, सड़कों पर चलते राहगीरों और घरों में आराम से बैठे लोगों पर एकदम से दंगाई हमला कर देते हैं। दंगाईयों ने घरों को आग के हवाले करना शुरू कर दिया। लोग कुछ समझ पाते, इसके पहले ही उनके ऊपर हमला कर उन्हें मारना शुरू कर दिया। घंटे भर के अंतराल में घायलों और लाशों का अंबार गलियों में लग गया। पुलिस ने जब तक आकर मोर्चा संभाला, तब तक दंगाई अपने मंसूबों को पूरा कर चुके थे।
दरअसल दंगे की पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। िंहसा सुनियोजित थी, दंगों में जिन पेट्रोल बमों का इस्तेमाल किया गया, वह एक दिन में निर्मित नहीं होते, कई दिन लगते हैं। दंगों में आधुनिक हथियारों के इस्तेमाल की जगह दंगाईयों ने देशी और जुगाडू हथियारों का प्रयोग किया। गुलेल, पत्थर, बम गोले, पेट्रोल बम, एसिड, तेजाब भरे गुब्बारे आदि का प्रयोग किया गया। दंगा पूरा का पूरा स्क्रिप्टेड था। दंगों में इस्तेमाल होनेवाले सामानों को पहले िंहसाग्रस्त इलाकों में पहुंचाया गया, फिर तय समय पर उनका प्रयोग किया गया। िंहसाग्रस्त इलाकों में स्थानीय पुलिस-प्रशासन और अर्धसैनिक बलों के पहुंच जाने के बाद भी करीब तीन घंटों तक रुक-रुक कर पत्थरबाजी होती रही। शाम के वक्त पत्थरबाजी इस कदर तेज हुई जिसने दिल्ली पुलिस को भी भागने पर मजबूर कर दिया।
दंगाई पुलिसवालों पर टियर गैस छोड़ रहे थे। ये नजारा हम पत्रकारों ने अपनी आंखों से देखा। घटना को देखकर पूरी दिल्ली कुछ समय के लिए मानो थम सी गई। अर्धसैनिक बलों के जवानों को जब नहीं रहा गया तो उन्होंने पत्थरबाजों से मुकाबला करने के लिए उनके बीच में कूद पड़े। उनका हौसला देखकर बाकी फोर्स को हौसला मिला फिर भीड़ को खदेड़ने का ऑपरेशन शुरू हुआ लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक पुलिसकर्मी रतनलाल वीरगति को प्राप्त हो चुका था। कई बेकसूर लोग दंगाईयों का निशाना बन चुके थे। चारों ओर चीख पुकार मची हुई थी। घटना के एक दिन पहले यानी २३ फरवरी को चांदबाग में हल्की-फुल्की पत्थरबाजी हुई थी, जो दो गुटों के दरमियान हुई थी लेकिन अगले दिन जो हुआ उसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की होगी?
दंगों में सबसे पहले मौजपुर और जफराबाद चपेट में आए। उसके बाद पूरे नार्थ-ईस्ट दिल्ली में ऐसी आग पैâली कि कई परिवार, कई दुकानें, स्कूल, गाड़ियां, इंसान सब झुलस गए। पूरा दंगा करीब से देखा….बहुत कुछ ऐसा भी देखा, जिसका ङ्किाक नहीं किया जा सकता। दंगों से भड़की आग फिलहाल शांत हो गई है लेकिन कई सवाल ऐसे हैं, जिनका जबाव शायद किसी के पास नहीं। िंहसा होने का मुख्य कारण नागरिकता संशोधन एक्ट का विरोध बताया जा रहा है। इस कानून ने अभी तक किसी की नागरिकता तो नहीं छीनी, लेकिन जाने कई की जिंदगी ले ली। सच तो यह है कि इतने संवेदनशील मुद्दे को लेकर सिर्फ पेड़ के पत्ते हिलाए जा रहे हैं, अभी तक किसी ने जड़ पर प्रहार नहीं किया। जबकि इमानदारी से देखा जाय तो दिल्ली जलने का कारण आईने की तरह साफ है। दिल्ली में लगभग पौने तीन महीने से सड़कों को रोककर महिलाएं धरना-प्रदर्शन कर रही हैं। सारी दुनिया जानती है कि इससे किसी भी देशवासी का कोई नुकसान नहीं होनेवाला। यह बात प्रोटेस्टर भी समझते हैं। मगर राजनीतिक दल और देश तोड़ने का मंसूबा पालनेवाले साजिशकर्ता इस बहाने देश और विदेश में अनावश्यक भ्रम फैला रहे हैं।
दिल्ली का दंगा दो धर्मों के िंखची लंबी खाई का परिचायक है। इसे अफवाह कहें या बेफकूफी? नागरिकता संशोधन कानून के विरोध और समर्थन ने कई दर्जन लोगों की िंजदगी लील ली। हजारों की संख्या में वाहन फूंके गए, सैकड़ों मकान जले और दुकानें लूटी गर्इं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही बनता है कि िंहसा के इस तांडव का आखिर जिम्मेदार कौन है? सोशल मीडिया पर बहुत से लोग विभिन्न दलों के नेताओं के नाम ले रहे हैं। टीवी चैनल्स भी चीख रहे हैं। लेकिन पूरी सच्चाई तो पुलिस जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने से भी काफी कुछ सामने आता है। खैर, दिल्ली फिर से अपने रंगत में आने की कोशिश में है। वैसी ही जो चौबीस घंटे गुलजार रहती थी। धीरे-धीरे दंगों के दाग को भुलाना चाहेगी। फरवरी की २४ तारीख को हमेशा के लिए भूलना चाहेगी।