महंगाई का विघ्न दूर करो!

उत्साहवर्धक और श्रद्धेय गणेशोत्सव आज चारों ओर हमेशा की तरह धूमधाम से शुरू होगा। राज्य में चारों ओर घरेलू और सार्वजनिक गणपति का आगमन गाजे-बाजे के साथ होगा। अगले दस दिनों तक महाराष्ट्र के घर-घर में, गली-गली में, गांव-गांव में उत्साहमय, श्रद्धा और राष्ट्रीय तथा सामाजिक एकता का अथाह दर्शन होगा। भूमिपुत्र अपना दुख-दर्द भूलकर पर्व-त्यौहार उत्साह और धूमधाम से मनाता है। मगर गणेशोत्सव की बात ही अलग है! मन को चेतनामय प्रेरणा देनेवाले उत्सवों में से एक गणेशोत्सव भी है। काल के अनुरूप उसमें जरूर परिवर्तन हुआ है, होता रहेगा, आगे भी होगा। वैसे भी बदलते वक्त का प्रतिबिंब जिस तरह इंसान की जिंदगी पर पड़ता है उसी तरह वह त्यौहारों में भी दिखाई देता है। इसीलिए गणेशोत्सव में भी परिवर्तन दिखाई दे रहा है। इस परिवर्तन के बारे में वैचारिक मतभेद की हवा प्रतिवर्ष गणेशोत्सव के आगमन से पहले बहने लगती है। इस परिवर्तन को नकारनेवालों की संख्या बहुत ही कम है फिर भी वह अपनी नकारात्मक भूमिका को जोर से पीटने की जिद नहीं छोड़ते और उसी के कारण प्रतिबंध का रोड़ा हर वर्ष सार्वजनिक गणेश मंडलों पर डाला जाता है। वैसे भी हिंदुओं के त्यौहारों पर प्रतिबंध, टिप्पणी, अनदेखी जैसे विघ्न आते ही रहते हैं। कभी पंडाल की लंबाई-चौड़ाई पर प्रतिबंध तो कभी लाउडस्पीकर की आवाज पर ‘बूच’ तो कभी दही-हंडी के रोमांच पर प्रतिबंध, कभी अदालत का हथौड़ा तो कभी प्रशासन और पुलिस का डंडा। ऐसी कई रुकावटों की स्पर्धा को हिंदू त्यौहारों को लांघना पड़ता है। ऊपर से पर्यावरणवादी नामक एक और विघ्न प्रति वर्ष सामने खड़ा रहता है। पर्यावरण और प्रदूषण का विचार न करते हुए उत्सव मनाया जाए, ऐसा कोई भी नहीं कहेगा लेकिन ये सब-कुछ ‘वाद-प्रतिवाद’ सिर्फ हिंदुओं के ही उत्सवों के समय बारिश में उगनेवाले कुकुरमुत्ते की तरह क्यों उगता है? और उत्सव खत्म होते ही सब-कुछ क्यों शांत हो जाता है? यह असली सवाल है। फिर भी जनता ‘कर्ज’ निकालकर ही सही अपना त्यौहार हमेशा की तरह उत्साह से मनाती रहती है। गणेशोत्सव और दही-हंडी जैसे चैतन्य, शक्ति और ऊर्जा के स्रोत कम नहीं हुए हैं, ये महत्वपूर्ण है। इस बार भी गणेशोत्सव की परंपरा की धूम दिखाई दे रही है। श्री गणराय पर होनेवाली अपार श्रद्धा सारे विघ्नों और समस्याओं को मात करती है। हालांकि सरकार के रूप में बैठे लोग जब कर्तव्य और जिम्मेदारी निभाने में कम पड़ते हैं तो खुद को ही संभालने के अलावा जनता के सामने अन्य कोई विकल्प नहीं होता। जनता ने भी इसी राह को चुन लिया है इसीलिए बढ़ती महंगाई के दावानल के बीच गणेशोत्सव का उत्साह और उमंग कम नहीं हुआ है। ‘महंगाई डायन’ खत्म हो इसलिए २०१४ में जिन्हें चुनकर लाए, उन्हीं के कार्यकाल में यह ‘डायन’ फिर जनता की गर्दन पर आकर बैठी है। ऊपर से रोज र्इंधन की मूल्यवृद्धि की मार भी सहनी पड़ रही है। जिन लोगों को यह मूल्यवृद्धि नियंत्रण में रखनी है वही लोग तेल के वैश्विक बाजार की ओर उंगली दिखाकर अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। देश की सुरक्षा, सीमा की अशांति, सामाजिक अस्वस्थता, नोटबंदी और जीएसटी जैसे प्रहार से न संभली अर्थव्यवस्था, रोजगार निर्माण के बारे में सत्ताधारियों के खोखले दावे, किसानों की आत्महत्या और फंसी हुई कर्जमाफी और सत्ताधारी विधायक ही लड़कियों को भगाने की सार्वजनिक बात करते हैं तो राज्य की महिलाओं में भय व्याप्त होने जैसे विघ्न हैं ही। इसे दूर करने की जिम्मेदारी सत्ताधारियों की होती है। मगर उसे दूर करने की बजाय हाथ ऊपर कर जनता को खाई में धकेला जा रहा है। इसलिए महंगाई का विघ्न दूर करो और हमारा जीना आसान बनाओ, ऐसी मन्नत सीधे विघ्नहर्ता गणराय से करनी पड़ेगी। बुद्धि के देवता गणपति सत्ताधारियों को जिम्मेदारी से हाथ न झटकने की सद्बुद्धि दें, यही उम्मीद और प्रार्थना!