" /> महाराष्ट्र पर अन्याय का समर्थन क्यों करते हो?

महाराष्ट्र पर अन्याय का समर्थन क्यों करते हो?

महाराष्ट्र मेले तरी राष्ट्र मेले
मराठ्याविना राष्ट्रगाडा न चाले
खरा वीर वैरी पराधीनतेचा
महाराष्ट्र आधार या भारताचा
मराठी माणुस की भावी पीढ़ी को ऐसे गौरवपूर्ण शौर्य गीतों का हवाला देना बंद कर देना चाहिए। यह भी बोलना बंद कर देना चाहिए कि हम छत्रपति शिवाजी महाराज और छत्रपति संभाजी राजे के स्वाभिमानी मर्दाना तेवर की बात करते हैं। १ मई को महाराष्ट्र दिन के मुहूर्त को देखते हुए वर्तमान दिल्लीश्वरों ने महाराष्ट्र पर आघात किया और किसी ने चूं तक नहीं की। जो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र मुंबई में शुरू किया जाना था, उसे गुजरात के गांधीनगर में ले जाया गया। इस आघात को करने, महाराष्ट्र को कमजोर तथा मजबूर करने के लिए महाराष्ट्र दिन का मुहूर्त चुना गया। इसके पीछे किसकी क्या भावना थी वो होगी, लेकिन महाराष्ट्र को नीचा दिखाने का सिलसिला कभी रुका नहीं है। इस अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र के गुजरात में शुरू होने से महाराष्ट्र को पेटदर्द होने का कोई कारण नहीं है। ६० साल पहले महाराष्ट्र और गुजरात एक ही राज्य थे। गुजराती और मराठी दोनों हमेशा भाई-भाई के रूप में ही रहे। गुजरात का विकास मुंबई की आर्थिक शक्ति से ही हुआ। गुजरात की अर्थव्यवस्था आज भी महाराष्ट्र के गुजराती बंधुओं के कारोबार पर ही टिकी है। ‘वाइब्रेंट गुजरात’ का हमेशा उदाहरण दिया जाता है। उस वाइब्रेंट गुजरात का सपना साकार करने में मुंबई में फले-फूले गुजराती उद्योगपतियों का योगदान है। इसे नहीं भुलाया जा सकता। श्री मोदी और श्री शाह, इन दोनों नेताओं के उदय के पहले मुंबई के गुजराती समाज का रक्षक मराठी माणुस यानी शिवसेना ही थी और आगे भी रहेगी। इसलिए इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि वित्तीय सेवा केंद्र का विवाद मराठी बनाम गुजराती का है। ये राज्य में अधिकार, अस्मिता और प्रशासकीय तैयारी का मामला है, लेकिन केंद्र में केवल गुजरात प्रेमी सरकार होने के कारण विशेषाधिकार का प्रयोग कर मुंबई में बननेवाले अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र को गांधीनगर ले जाया गया है। इस बारे में महाराष्ट्र में चूं तक नहीं हुई। अब यह वित्तीय केंद्र मुंबई के बदले गांधीनगर कैसे गया, इस पर आरोप-प्रत्यारोप शुरू है जोकि निरर्थक है। महाराष्ट्र की वर्तमान ‘ठाकरे सरकार’ लगभग १०० दिन पहले ही बनी है। इसलिए इन सभी भागदौड़ का ठीकरा उन पर फोड़ना ठीक नहीं होगा, लेकिन राज्य सरकार को इस निर्णय के खिलाफ एक मजबूत भूमिका अपनानी होगी, ऐसी मराठी जनता की अपेक्षा होगी और ये सही है। मुंबई देश की आर्थिक व्यवस्था का केंद्र है। रिजर्व बैंक, स्टॉक एक्सचेंज, बीमा कंपनियों से लेकर सारी आर्थिक व्यवस्थाएं मुंबई में ही हैं। इसलिए ये अंतरराष्ट्रीय केंद्र मुंबई में ही बने, ऐसा तय हुआ तथा इसकी तैयारी भी शुरू थी। दो पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और पृथ्वीराज चव्हाण एक-दूसरे पर जो आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं, इससे महाराष्ट्र को क्या हासिल होगा? चव्हाण कई सालों तक केंद्र में थे और बाद में मुख्यमंत्री बने। उनका कहना है कि २०१४ तक मुंबई में वित्तीय केंद्र के प्रस्ताव पर केवल चर्चा हुई थी। इस दौरान महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक राज्यों की ओर से वित्तीय केंद्र के लिए प्रस्ताव भेजे गए थे। हालांकि २०१४ में केंद्र में भाजपा की सत्ता आ गई। इसके बाद १ मई, २०१५ को मोदी सरकार ने मुंबई और बेंगलुरु का प्रस्ताव रद्द करके अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र अमदाबाद के गिफ्ट सिटी में स्थापित करने का निर्णय लिया।
उस समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फडणवीस थे और उन्होंने मुंबई पर होनेवाले इस अन्याय का विरोध नहीं किया। अब भी वे महाराष्ट्र का पक्ष लेने की बजाय गुजरात की बात कैसे सही है, इसकी वकालत कर रहे हैं जो कि क्लेशदायक है। दूसरी ओर मुंबई में सेवा केंद्र बनेगा कि नहीं, यह सवाल नहीं है लेकिन ऐसे केंद्र बनाने में मुंबई कैसे कमजोर साबित हुई है और देश की अर्थव्यवस्था में मुंबई का योगदान क्या है? ऐसे सवाल भारतीय जनता पार्टी के कुछ नए उगे नेताओं की ओर से पूछा जा रहा है। यह बात गुस्सा दिलानेवाली है। भविष्य में ये लोग ऐसा भी सवाल कर सकते हैं कि महाराष्ट्र को गढ़ने में छत्रपति शिवराय का क्या योगदान था? मुंबई के लिए जो १०५ लोग शहीद हुए, यह गलत है और वे लोग प्लेग से मरे थे, ऐसी भी लफ्फाजी वे करेंगे। ऐसी बयानबाजी करनेवाले लोगों को हुतात्मा स्मारक के बगल में एक खंभा गाड़कर उससे बांधकर रखना चाहिए। इतने निर्लज्ज लोग महाराष्ट्र में रहते हैं, महाराष्ट्र से ही बेईमानी करते हैं, इसे कैसे सहा जाए? मुंबई आधे देश का पेट पालती है। देश की आर्थिक व्यवस्था में लगभग ३० प्रतिशत का योगदान सिर्फ मुंबई का होता है। अब इसे यहां के कुछ लोग नकारते होंगे तो उन्हें इस राज्य में रहने का कोई अधिकार नहीं है, ऐसा ही कहा जाना चाहिए। तकनीकी रूप से गांधीनगर में शिफ्ट किए गए आर्थिक केंद्र के मामले में गुजरात की बात सही भी हो सकती है लेकिन दिल्ली में मोदी सरकार के होने के कारण गुजरात का पलड़ा भारी है। मुंबई के कई वित्तीय संस्थानों, उद्योग-व्यापार आदि को गुजरात शिफ्ट करके महाराष्ट्र का बड़ा नुकसान किया ही गया है। विरोधी दल में रहते हुए शिवसेना ने इस बारे में आवाज उठाई थी। अब यह काम श्री फडणवीस और उनके नेतृत्व में विरोधी दल के नेताओं को करना चाहिए। फडणवीस महाराष्ट्र की बजाय महाराष्ट्र पर अन्याय करनेवालों का पक्ष लेकर बोल रहे होंगे तो ऐसा विरोधी दल किसी काम का नहीं है और महाराष्ट्र का नुकसान करनेवालों को जनता ही मुंबई के अरब सागर में डुबा देगी। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के विधान परिषद की सदस्यता के संदर्भ में फडणवीस ने जितनी मेहनत की, उतनी ही मेहनत महाराष्ट्र पर होनेवाले इस अन्याय के विरोध में करते तो ठीक था। महाराष्ट्र का खाना और महाराष्ट्र पर अन्याय करनेवालों की तारीफ करना, यह शिवराय के धर्म में बिल्कुल नहीं। लंदन में तीन स्थानों पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र का काम होता है। इसी तर्ज पर अपने यहां भी मुंबई और अमदाबाद में वित्तीय केंद्र शुरू हो सकते हैं, ऐसा एक प्रस्ताव फडणवीस ने रखा है। अब ये प्रस्ताव लेकर वे कहीं फिर राजभवन न चले जाएं। इस मामले में महाराष्ट्र पर अन्याय हुआ है और केंद्र सरकार ने पक्षपात किया है, यह उन्हें स्वीकार है क्या? उन्हें ऐसा लग रहा होगा तो महाराष्ट्र पर अन्याय के खिलाफ उन्हें एक प्रस्ताव आगामी विधानसभा में रखना चाहिए। वरिष्ठ नेता शरद पवार ने भी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र मुंबई में ही होना चाहिए और इसे गुजरात ले जाने के मामले पर सरकार पुनर्विचार करे, ऐसी मांग करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को एक पत्र लिखा है। ये सही भी है। उनके द्वारा दी गई यह चेतावनी कि इस केंद्र के मुंबई से बाहर जाने पर देश का आर्थिक नुकसान होगा, सही है। महाराष्ट्र के इस मामले पर राजनीतिक मतभेदों को एक तरफ रख देना चाहिए। पहले महाराष्ट्र और राजनीतिक दलों के झंडे उसके बाद। महाराष्ट्र मरा तो राष्ट्र मरेगा, यह सिर्फ बोलना नहीं है बल्कि करके दिखाना होगा। चिंतामनराव देशमुख के इस्तीफे का मामला महाराष्ट्र के हर नेता को बार-बार पढ़ना चाहिए। मतलब महाराष्ट्र पर अन्याय करनेवालों की वकालत करनेवालों के मुंह शायद बंद हो जाएं। सच कहें तो केंद्र सरकार को भी इस मामले में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा। ये महाराष्ट्र के न्यायपूर्ण अधिकार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र पर मुंबई के असली हक का सवाल है, ये केंद्र के सत्ताधीशों को समझना चाहिए। ये राजनीतिक मामला नहीं है बल्कि राज्य के हित का मामला है। इसके लिए लड़ने की जिम्मेदारी सिर्फ राज्य सरकार की ही नहीं कही जा सकती बल्कि ऐसे समय में विरोधी दल को भी सहयाद्रि की गर्जना करनी चाहिए। संयुक्त महाराष्ट्र का मुंबई के लिए की गई लड़ाई विरोधी दल ही लड़ा और जीता, यह इतिहास अमर है!