महाराष्ट्र में ईडी का बड़ा सत्कर्म : पवार के खिलाफ कार्रवाई से सोए हुए लोग जाग गए!

महाराष्ट्र में चुनाव नीरस और एकतरफा होंगे, ऐसा लग रहा था परंतु पार्टी में भगदड़ के बाद शरद पवार खुद मैदान में उतर आए। राज्य छान डाला। यह सब जब हो रहा था राज्य सहकारी बैंक प्रकरण में ‘ईडी’ ने पवार को आरोपी बना दिया। यह बदले की राजनीति है। ऐसी अफवाह उड़ी और कई सोए हुए लोग जाग गए। राष्ट्रवादी को इसका लाभ होगा क्या?
महाराष्ट्र में बदले की और उतने ही बेमतलब की राजनीति होती दिख रही है। भारतीय जनता पार्टी की जीत के दो मजबूत स्तंभ हैं एक सीबीआई और दूसरा ईडी अर्थात प्रवर्तन निदेशालय। इस स्पर्धा में अब चुनाव आयोग भी फिलहाल कूद पड़ा है। ऐसा आरोप फिलहाल विरोधी लगा रहे हैं। इन आरोपों को मजबूती देने का काम ये संस्थाएं आज करती दिख रही हैं। देश के निर्वाचन आयुक्त श्री अशोक लवासा की पत्नी नोवेल को ‘ईडी’ ने चुनाव के मौके पर नोटिस भेजी। श्रीमती नोवेल लवासा द्वारा भरे गए इनकम टैक्स रिटर्न की कुछ जानकारियों के संबंध में आयकर विभाग को आपत्ति थी। इस संदर्भ में नोवेल लवासा को यह नोटिस भेजी गई है। ऐसा स्पष्टीकरण बाद में आयकर विभाग ने दिया। इसमें जो कुछ भी तथ्य होंगे वे जांच के बाद सामने आएंगे ही परंतु श्री अशोक लवासा की छवि कुछ ऐसी है कि चुनाव आयोग में वे निष्पक्ष एवं स्वाभिमानी आयुक्त हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ आचार संहिता भंग की शिकायतें आर्इं। इन तमाम मामलों में आयोग ने मोदी को ‘क्लीनचिट’ दी लेकिन लवासा का मत अन्य दो सदस्यों से अलग था। प्रधानमंत्री को निर्दोष ठहराने का निर्णय एकमत से नहीं हुआ था। इस निर्णय का विरोध करनेवाले लवासा के घर ईडी और इनकम टैक्स ने नोटिस चस्पां कर दी। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले यह सब हुआ। विरोधियों ने इसके पीछे अलग आशंका जताई है।
जांच एजेंसियां किसकी?
विरोधियों की नकेल कसने के लिए देश की जांच एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है क्या? इसका दूसरा उदाहरण राज ठाकरे। कोहिनूर मिल मामले में ‘ईडी’ ने राज ठाकरे को बुलाकर पूछताछ की। इसके बाद राज ठाकरे के बोलने और बरताव में मंदी आ गई। अजीत पवार बोले ‘ईडी द्वारा बुलाए जाने के बाद से राज ठाकरे ठंडे पड़ गए हैं।’ अब उन्हीं ‘पवार’ के खिलाफ राज्य सहकारी बैंक प्रकरण में ईडी ने मामला दर्ज किया है और इससे राज्य का माहौल गर्म हो गया है। पवार ठंडा नहीं पड़े बल्कि ज्यादा ही उबल पड़े। यह सब एक बार फिर महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के मौके पर हुआ है। राज्य सहकारी बैंक द्वारा लोन बांटने में घोटाला हुआ है और इस मामले में एक याचिका हाईकोर्ट में दाखिल हुई। यह प्रकरण वर्ष २००५ से २०१० के बीच का है। कर्ज बांटने में गड़बड़ी हुई, इस मामले में ७४ संचालकों को दोषी मानना ठीक है परंतु शरद पवार उस बैंक के संचालक नहीं थे तथा साधारण सदस्य भी नहीं थे। फिर भी ‘ईडी’ ने उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया। इसका प्रतिसाद महाराष्ट्र में दिखाई दे रहा है। शरद पवार, बालासाहेब ठाकरे के बाद के महाराष्ट्र के सबसे बड़े नेता हैं। महाराष्ट्र में उनके कद के बराबर दूसरा नेता नहीं है। आज महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री हैं परंतु नेता के हैसियत से देखा जाए तो सिर्फ श्री पवार ही हैं। नरेंद्र मोदी पिछली बार बारामती आए तथा पवार को उन्होंने राजनैतिक गुरु की उपमा दी। पवार की उंगली पकड़कर हम राजनीति में आए हैं, ऐसा उन्होंने कहा था। कृषि और सहकार क्षेत्र में पवार का देश में बड़ा योगदान है। उनका गुणगान मोदी ने कई बार किया जबकि चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने ठीक उल्टी बातें कहीं। अब मोदी के राजनैतिक गुरु को ईडी ने गुनहगार ठहराया है।
बदले की राजनीति?
बदले की राजनीति करना महाराष्ट्र की संस्कृति नहीं है, ऐसा श्री उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट किया। बालासाहेब ठाकरे ने बदले की राजनीति पूरे जीवन में नहीं की। भाजपा में हाशिए पर जा चुके नेता एकनाथ खडसे ने भी एलान किया कि राज्य सरकारी बैंक के लोन बंटवारे में शरद पवार का नाम कभी भी नहीं था। इसे अब कौन घुसाया? राज्य सहकारी बैंक के लोन घोटाले में शक्कर कारखाना बिक्री घोटाला मामले की पहली शिकायत शेतकरी (किसान) संगठन के राजू शेट्टी ने दर्ज कराई थी। राजू शेट्टी इस मामले में ईडी तक गए। उन्होंने भी अब कहा है कि इस मामले में शरद पवार दोषी नहीं हैं। मैंने उनके खिलाफ आरोप नहीं लगाए हैं। बैंक के संचालक मंडल ने अयोग्य लोगों को लोन दिया। जिन्होंने कर्ज दिया और लिया, उसमें से बहुत से लोग भाजपा में चले गए। हैरानी की बात यह है कि अण्णा हजारे ने भी पवार के निर्दोष होने की घोषणा की। विजय सिंह मोहिते पाटील ने खाली पड़े शक्कर कारखाने की जगह पर कर्ज लिया। दिलीप सोपल ने भी ऐसे ही बड़ा कर्ज लिया। ईडी व अन्य लोगों का कहना है कि यह २५ हजार करोड़ रुपए का घोटाला है, यह संभव नहीं है। मूलरूप से राज्य सहकारी बैंक १२ हजार करोड़ का है, इसे ध्यान में रखना चाहिए। जो हुआ उसकी जांच होनी चाहिए परंतु इन्हीं लोन लेने और देनेवालों में से कई लोग आज भाजपा में जाकर ‘पावन’ हो गए हैं। उनमें से कई ने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में भाजपा में प्रवेश किया है फिर उनका तुम क्या करोगे? सभी पार्टियों के संचालक इसमें हैं परंतु शरद पवार कहीं नहीं होने के बावजूद आरोपी वैâसे? इस पर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं। दरअसल पवार के खिलाफ आरोप गलत है और इसके पीछे सिर्फ भाजपा का ही हाथ है, यह आरोप भी सत्य नहीं है। पुलिस राज्य सहकारी बैंक लोन बंटवारा मामले में गुनहगारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती इसलिए किसी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की और हाईकोर्ट ने पुलिस तथा सरकार को फटकारा। यह सब हाईकोर्ट के आदेश से हो रहा है परंतु १०० करोड़ रुपए से ज्यादा के घोटाले का यह इकलौता उदाहरण नहीं है, ऐसे कई मामले लावारिस अवस्था में घूम रहे हैं और उन्हें हाथ लगाने को कोई तैयार नहीं है।
२०१४ में क्या हुआ?
वर्ष २०१४ में शिवसेना-भाजपा युति के बगैर लड़ी। भाजपा ने १०० से ज्यादा सीटें जीती लेकिन बहुमत हासिल नहीं कर सकी। देशभर में सरपट दौड़ रहे भाजपा के घोड़े को रोकने का काम तब उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र में किया। भाजपा बहुमत के लिए छटपटा रही थी और शिवसेना विपक्ष में बैठने की तैयारी कर रही थी तभी राष्ट्रवादी कांग्रेस अचानक आगे आई और उसने भाजपा को सरकार बनाने के लिए समर्थन घोषित कर दिया। राष्ट्रवादी को यह सब करने की कोई आवश्यकता नहीं थी लेकिन दिल्ली के आदेश से यह समर्थन घोषित किया गया। महाराष्ट्र के राजनीतिक समीकरण बदल गए। आज श्री पवार बोले ‘दिल्ली के तख्त के सामने झुकेंगे नहीं, यह संस्कार नहीं है।’ वर्ष २०१४ में दिल्ली का आदेश मानने का गुनाह नहीं हुआ होता तो महाराष्ट्र अलग दिशा में गया होता। उसी दिल्ली ने पवार पर ‘ईडी’ से प्रहार किया, दिल्ली ने महाराष्ट्र का हमेशा ही मर्दन किया, शासक कोई भी हो।
बड़ी मछली
शरद पवार की पार्टी की बड़ी मछलियों को भाजपा ने जाल में फंसा लिया। ईडी का डर दिखाकर लोगों को फोड़ा, ऐसा कांग्रेस-राष्ट्रवादी का आरोप है। पवार पार्टी को मजबूत बनाने के लिए खुद महाराष्ट्र दौरे पर निकले तथा मराठवाड़ा सहित कई भागों में उन्हें अच्छा प्रतिसाद मिला। एक योद्धा की तरह शस्त्र से सज्ज होकर पवार जैसा नेता एक बार फिर मैदान में उतरता है तो उनका उत्साह युवकों को शर्मसार कर देता है। सातारा के सांसद उदयनराजे ने राष्ट्रवादी का त्याग निर्वाचित होने के महज तीन महीने बाद कर दिया। पवार सातारा गए और उनकी भव्य रैली में युवकों की भारी भीड़ हो गई। यहां एक बात ध्यान में रखना चाहिए कि तीन महीने में राष्ट्रवादी का त्याग करना था तो उदयनराजे को पहले ही भाजपा में जाकर लोकसभा चुनाव लड़ना चाहिए था। अब तीन महीने में फिर चुनाव। पहले चुनाव के २५ करोड़ और अब उपचुनाव के २५ करोड़ ऐसे पचास करोड़ का खामियाजा सरकारी तिजोरी पर पड़ा है। यह भी पैसे का और पद का दुरुपयोग है परंतु पवार पर अनियमितता का आपराधिक मामला दर्ज करनेवाले यहां चुप हैं क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने ही उदयनराजे को फोड़ा है इसलिए इस २५ करोड़ के छींटे उनके शरीर पर भी उड़े हैं। यह राजनैतिक भ्रष्टाचार है। विधानसभा चुनाव के साथ ही लोकसभा चुनाव भी कराए जाएं, ऐसी उदयनराजे भोसले की शर्त थी परंतु विधानसभा के कार्यक्रम का एलान करते समय सातारा लोकसभा उपचुनाव की तारीख घोषित नहीं की गई तो उदयनराजे भोसले चिढ़ गए परंतु आगामी तीन दिनों में सरकार सातारा उपचुनाव तय कर लेगी। संवैधानिक संस्था किस तरह काम करती है इसका यह एक और उदाहरण है। सातारा में उदयनराजे के खिलाफ आज जनमत है इसे स्वीकार किया जाए तो परिणाम अलग हो सकते हैं, ऐसा सातारा की जनता का मत है। महाराष्ट्र की राजनीति कल तक शिवसेना-भाजपा की युति के इर्द-गिर्द घूम रही थी और सामने तीसरा कोई नहीं था। बड़ी टूट-फूट के बाद शरद पवार रण के मैदान में उतरे। अब ईडी की कार्रवाई के बाद यह तीसरा भिड़ू ग्रामीण क्षेत्र में सहानुभूति का मुद्दा बन गया। ‘ईडी’ करने गई एक और हुआ दूसरा ही, ऐसा नहीं होना चाहिए। सीबीआई, इनकम टैक्स, निर्वाचन आयोग और ईडी को राजनैतिक कार्यकर्ता की भूमिका नहीं अपनानी चाहिए, स्वामी निष्ठा दिखाने के लिए अन्य कई कतारें लगी हैं। नोटबंदी के बाद जनता पंजाब महाराष्ट्र बैंक के द्वार पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कतार में खड़ी है। थोड़ा उनका आक्रोश कोई सुनेगा क्या?