" /> महासत्ता की मानहानि!

महासत्ता की मानहानि!

अमेरिका और तालिबान के बीच गत १८ वर्षों से शुरू युद्ध के थमने के आसार नजर आ रहे हैं। कतर की राजधानी दोहा में तालिबान तथा अमेरिका के बीच बातचीत सफल हुई और तटस्थ देशों में गत दो दशकों से शुरू संघर्ष पर पूर्ण विराम लगने की संभावना बढ़ गई। इस ऐतिहासिक शांति चर्चा में हिंदुस्थान सहित लगभग ५० देशों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। आतंकवाद को समर्थन न देनेवाली अमेरिकी शर्तों को तालिबान ने स्वीकार कर लिया और सब कुछ योजना के अनुसार ही अमल में आया। आगामी १४ महीनों में अमेरिका की पूरी सेना अफगानिस्तान से वापस बुला लेने का ऐतिहासिक समझौता तटस्थ देशों में हुआ। अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रंप के प्रतिनिधि के रूप में विदेश मंत्री माइक पांपियो और तालिबान के प्रमुख नेताओं ने समझौते पर दस्तखत किए। इस बातचीत में तालिबान के लगभग ३१ प्रतिनिधियों ने भाग लिया। अमेरिका और तालिबान में गत १८ सालों से चल रहे युद्ध और अब दोहा में हुई मुलाकात के बाद के घटनाक्रमों को देखते हुए इसे अमेरिका के पीछे हटने की बजाय उसकी हार ही कही जाएगी। अमेरिका ने जिस प्रकार अलकायदा और आइसिस जैसे कुख्यात आतंकवादी संगठनों और संगठनों के सरगनाओं ओसामा बिन लादेन और अबू बक्र अल बगदादी के खिलाफ युद्ध जीता था उसकी तुलना में अमेरिका तालिबान से नहीं जीत पाया। वास्तव में तालिबान के जन्म के पहले ९० के दशक में अफगानिस्तान पर रशिया का दबदबा था। उसे खत्म करने के लिए अमेरिका और पाकिस्तान ने मिलकर तालिबान बनाया। वही राक्षस अमेरिका पर भारी पड़ गया। १९९६ में कम्युनिस्ट राष्ट्राध्यक्ष नजीबउल्लाह को संयुक्त राष्ट्र संघ की अदालत से बाहर खींचकर तालिबानियों ने बीच चौराहे पर फांसी पर लटका दिया और अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा जमा लिया। इसके बाद वहां इस्लामी शरियत लागू करके तालिबानियों ने क्रूरता की हदें पार कर दीं। इसी दौरान लादेन के आतंकवादी संगठन अलकायदा ने अमेरिका पर ‘९/११’ का भीषण हमला कर दिया। हमले के बाद लादेन और अलकायदा के आतंकवादियों को तालिबान ने पनाह दी। इससे अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपनी सेना घुसाकर तालिबान से युद्ध छेड़ दिया। अमेरिका ने उस वक्त घोषणा की कि तालिबान को खत्म कर देंगे, तालिबान के आतंकी अड्डों को नष्ट कर देंगे और अफगानिस्तान की जनता को तालिबान के जुल्मी और अत्याचारी शासन से हमेशा के लिए मुक्त कर देंगे। हालांकि इतने साल लड़ने के बावजूद अमेरिका के हाथ कुछ नहीं लगा। तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर का खात्मा तो जरूर हुआ लेकिन महासत्ता तालिबान को जड़ से उखाड़ने में नाकामयाब रही। उल्टे उन्हीं तालिबानी प्रतिनिधियों से चर्चा करने की नौबत अमेरिका पर आन पड़ी। इसे महासत्ता की बड़ी नाकामयाबी ही कहा जाना चाहिए। तालिबान के खिलाफ शुरू युद्ध में अमेरिका के थोड़े-बहुत नहीं बल्कि १४६ लाख करोड़ रुपए खर्च हो गए। लगभग ३ हजार अमेरिकी जवान अफगानिस्तान में मारे गए। पहले इराक और बाद में अफगानिस्तान में भेजी गई सेना की टुकड़ियों में से अमेरिकी जवानों की लाशों की शव पेटियां देखकर अमेरिका में बड़ा असंतोष निर्माण होने लगा। पिछले चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने वादा किया था कि अफगानिस्तान में भेजे गए सैनिकों को वापस बुलाया जाएगा। चुनाव के मद्देनजर उस वचन को पूरा करते हुए प्रे. ट्रंप ने सैन्य अस्मिता का ट्रंप कार्ड बाहर निकाला है। तालिबान से हुआ समझौता इसका उदाहरण है। १८ साल के युद्ध के बाद तालिबान के हाथ में देश सौंपकर अफगानिस्तान से पीछे हटना महासत्ता की मानहानि है। ये वियतनाम जैसे छोटे से देश से हुई हार की पुनरावृत्ति है। अफगानिस्तान से अमेरिका का पीछे हटना हिंदुस्थान के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है। पाकिस्तान के इशारे पर नाचनेवाले तालिबानियों का सत्ता में आना हिंदुस्थान के लिए ठीक नहीं है। अमेरिका से युद्ध समाप्त होने के कारण बेकार होनेवाले तालिबानियों को जम्मू-कश्मीर में घुसाने का प्रयास पाकिस्तान की ओर से हो सकता है। इसलिए युद्ध समाप्त होना खुशी की बजाय चिंताजनक है। एक समय अफगान पूरी तरह से हिंदू था। अखंड हिंदुस्थान का एक भाग था। महाभारत के गांधार और गंधारी अफगानिस्तान के ही थे। वहां का हिंदूकुश पर्वत इसका साक्षी है। अखंड हिंदुस्थान के प्राचीन क्षेत्र पर तालिबानी कब्जा कहीं दूसरा महाभारत तो नहीं करवाएगा न?