महिलाओं को मिले निर्णय लेने की छूट

आज के  दौर में मुस्लिम समाज की महिलाओं की तरक्की, उनके पिछड़ेपन और उनके शोषण पर चर्चा तो होती है लेकिन आखिर में जाकर यह चर्चा बहस में तब्दील हो जाती है। अन्य समाज की तुलना में मुस्लिम समाज में महिलाओं की हालत सबसे बुरी है, इस बात से शायद ही किसी को इंकार हो। मुस्लिम महिलाएं शिक्षा, आर्थिक हालात और स्वास्थ्य के लिहाज से हिंदुस्थान की सबसे कमजोर नागरिक हैं। निकाह, तलाक, मुताअ, हलाला जैसे मामलों को लेकर अक्सर विवाद रहा है। एक धारणा बन गई है कि एकतरफा नियमों और पुरानी परंपराओं ने मुस्लिम महिलाओं को और अधिक कमजोर कर रखा है। धर्म के नाम पर महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने का मुस्लिम समाज की तरफ से हमेशा ही विरोध किया गया है। मुस्लिम समाज पुरुषों के वर्चस्व और वजूद को कायम रखने के लिए मुस्लिम महिलाओं के प्रति अक्सर नकारात्मक सोच रखता है।
लेकिन उसी मुस्लिम समाज में अनेकों मुस्लिम महिलाएं अपने संघर्ष से इन बनी बनाई धारणाओं को तोड़ देती हैं। पिंपरी-चिंचवड की सैयद सायरा नजीर ऐसी ही एक बहादुर महिला हैं, जिन्होंने विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने चार बच्चों को उच्च शिक्षा भी दिलाई और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा भी किया। इन चार बच्चों में तीन बेटियां हैं। ५७ वर्षीय सायरा ने केवल १२ वीं तक शिक्षा ग्रहण की है। आवेदन करने पर केंद्र सरकार के अधीन उन्हें विवाहोपरांत नौकरी के लिए पत्र भी आया था लेकिन पति और ससुराल को यह मंजूर न था। सायरा ने पति की आज्ञा को माना और नौकरी हाथ से चली गई लेकिन विधि के विधान में तो कुछ और लिखा था। सायरा के पति की गंभीर बीमारी ने जिम्मेदारियों का सारा बोझ सायरा के सिर पर रख दिया। हार न मानते हुए सायरा ने घर के सामने ही सायकल मरम्मत का काम शुरू कर दिया। देखते ही देखते सायरा ने पूरे घर की जिम्मेदारी उठा ली। उन्हें अपनी ३६ साल की कड़ी मेहनत का फल भी मिला और आज उनकी तीन बेटियां शिक्षित हैं, उनमें से दो का विवाह हो चुका है और वे खुशी-खुशी अपना जीवन जी रही हैं। सायरा की दो बेटियों ने कंप्यूटर इंजीनियर की पढ़ाई की है जबकि एक ने अन्य क्षेत्र में उच्च शिक्षा ली है। बेटा भी उच्च शिक्षा लेकर अब रोजगार में रम गया है। सराहनीय बात यह है कि सायरा के बच्चों ने भी अपनी मां की मजबूरी को समझा और उसे कभी तंग नहीं किया, न ही कोई मांग रखी।
सायरा का मामला तो सराहनीय है लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। समय के साथ-साथ मुसलमानों में शिक्षा और जागरूकता पैदा हो तो रही है लेकिन मुस्लिम समाज के लिए हितकारी होने का दावा करनेवाले उलेमा और मुस्लिम संगठन समय के साथ नहीं चल रहे हैं। वे अब भी रूढ़िवाद के संवाहक और पोषक बने रहना चाहते हैं, उनमें धारा के विपरीत चलने की सलाहियत नहीं है। यही कारण है कि मुस्लिम समाज तरक्की के मामले में औरों से काफी पीछे है। मुस्लिम समाज भी अन्य समाजों की तरह मूलत: पितृसत्तात्मक है, जहां उच्च स्तर पर लैंगिक असमानता है। निर्णय प्रक्रिया को व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी पुरुषों की होती है। सामाजिक और आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर महिलाएं उनका निर्णय मानने के लिए बाध्य होती हैं। सायरा का उदहारण भी सामने है। १२ वीं तक पढ़ी सायरा अगर सरकारी नौकरी के मिले अवसर को लपक लेती तो उसे सड़कों पर संघर्ष न करना पड़ता। वह सायकल के पंक्चर न बनाती बैठती। उसे नौकरी का विचार छोड़ना पड़ा क्योंकि उसे निर्णय लेने का अधिकार नहीं था। निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका उनकी स्वायत्तता या स्वतंत्रता को दर्शाती है जिसे पुरुषप्रधान समाज नहीं पचा पाता। आमतौर पर महिलाओं के संबंध में यही देखा जाता है कि उन्हें केवल कुछ घरेलू पारिवारिक निर्णय लेने का ही अधिकार होता है। मुस्लिम समाज में महिलाओं को और भी अधिक नियमों और प्रथाओं का पालन करते हुए अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष करना पड़ता है। उनके स्वतंत्र अधिकारों को ज्यादातर शरीयत और धर्म का हवाला देकर दबा दिया जाता है। यदि सायरा जैसी महिलाओं के पास स्वायत्तता और सामाजिक आर्थिक स्वतंत्रता हो तो वह अपनी निर्णय क्षमता का भरपूर उपयोग कर सकती हैं।
यूं तो हिंदुस्थान को आज तरक्कीयाफ्ता मुल्क कहा जाता है लेकिन अशिक्षा, गरीबी, बेरोज़गारी और अधिकारों के प्रति अनभिज्ञ होने के कारण देश का अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय पिछड़ा हुआ है। विशेषकर मुस्लिम महिलाएं तरक्की से दूर हैं। २०११ की जनगणना के आधार पर १४.६ प्रतिशत मुस्लिम आबादी है जो शैक्षणिक, आर्थिक एवं सामाजिक रूप से अत्यंत कमजोर है। यदि मुस्लिम महिलाओं का विकास नहीं हुआ तो पूरे समाज के उत्थान की कल्पना करना बेकार है। कुरआन और सही हदीस में इस्लाम ने मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, नागरिक, कानूनी और पारिवारिक मामलों में काफी अधिकार दिए हैं। उतने अधिकार लिखित रूप से किसी भी धर्म में नहीं दिए गए हैं। इस्लाम में औरतों को उच्च शिक्षा ग्रहण करने का पूरा अधिकार है और आवश्यकता पड़ने पर घर की चहारदीवारी से बाहर निकल कर रोजगार करने में भी कोई मनाही नहीं है। लेकिन इसके लिए कुछ इस्लामी और शरई कानून बनाए गए हैं जिनका उन्हें पालन करना होता है। हालांकि चंद मुस्लिम उलेमा ने इस्लाम की व्याख्या काफी जटिल कर दी है। बात केवल शिक्षा, आज़ादी और अधिकार की नहीं है, बल्कि ट्रिपल तलाक, बहुविवाह, शौहर का क्रूर व्यवहार, शारीरिक और मानसिक यातना जैसे मामले बहुदा मुस्लिम महिलाओं के सामने आते हैं। इसके बावजूद चुपचाप इन जुल्मों को सहना मुस्लिम महिलाओं का मुकद्दर बन गया है। कई गैर इस्लामी और गैर इंसानी रवायते हैं जिन्हें इस्लाम हरगिज कहीं से कहीं सही नहीं ठहराता। पैगंबर मोहम्मद साहब का इरशाद है; ‘‘औरतों के साथ सद्व्यवहार की ताकीद करो’’। रसूल-ए-खुदा ने फरमाया;‘‘नमाज और औरतों का ख्याल रखना’’। कितने मुसलमान इस बात का ख्याल रखते हैं यह अलग से शोध का विषय है। जिस तरह पुरुषों को बिन मांगे उनका जायज़ हक मिलता है उसी प्रकार महिलाओं को भी बिना किसी भेद-भाव के उनका जायज हक मिलना चाहिए क्योंकि इस्लाम में दूसरों का हक मारना बहुत बड़ा गुनाह है लेकिन सही शिक्षा के अभाव में ऐसा होता नहीं है।
 हालांकि शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं के योगदान को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। हिंदुस्थान का पहला कन्या स्कूल खोलने में एक मुस्लिम महिला की बहुत बड़ी भूमिका थी। ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के लड़कियों के लिए स्कूल खोलने के सपने को साकार करने में सावित्रीबाई फुले की सखी और सहयोगी फातिमा शेख का सबसे बड़ा योगदान रहा। फुले दंपति की इस मुहिम में उनका साथ देकर फातिमा शेख ने मुस्लिम बच्चियों के लिए भी शिक्षा की अलख जगाने का काम किया। उस दौर में मुस्लिम बच्चियों को स्कूल भेजना मानो नाकों चने चबाने जैसा था। तुर्रा यह कि उस जमाने में महिला शिक्षक मिलना भी मुश्किल था। लेकिन शिक्षा के महत्व को समझनेवाली फातिमा शेख ने सावित्रीबाई के स्कूल के लिए जमीन भी दी और स्कूल में पढ़ाने की जिम्मेदारी भी संभाली। इसके लिए उन्हें समाज के विरोध का भी सामना करना पड़ा। हिंदुस्थानी शिक्षा के इतिहास में फातिमा शेख पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका तो बनीं लेकिन उन्हें नजरंदाज भी किया गया। यह दु:ख की बात है कि सावित्रीबाई की तर्ज पर फातिमा शेख के काम को मुस्लिम समाज ने अपने समाज के सामने नहीं रखा।
अगर गौर किया जाए जाए तो यह बात शीशे की तरह साफ है कि सिर्फ खुद के लिए ही नहीं बल्कि समाज के लिए लाख बंदिशों के बावजूद विषम परिस्थितियों में भी मुस्लिम महिलाएं साहसी कार्य कर सकती हैं। यदि इन महिलाओं को अपना जीवन जीने की स्वतंत्र छूट दे दी जाए तो निश्चित ही महिलाएं समाज में व्याप्त कुरीतियों और रूढ़ियों के बंधनों को तोड़कर समाज का एक नया ढांचा खड़ा कर सकती हैं। मन में एक सवाल अक्सर आता है कि आखिर मुसलमान दूसरे तबकों से पीछे रहने को अगर सहन नहीं कर सकता तो क्यों नहीं सदियों से भेदभाव की पीड़ित महिलाओं को बराबरी के स्तर पर लाने की कोशिश करता?