‘माघ मकर गत रवि जब होई, तीरथपतिहि आव सब कोई’ मंगलवार-मकर संक्रांति पर्व 

भारतवर्ष में समय-समय पर प्रत्येक पर्व को श्रद्धा, आस्था, हर्षोल्लास एवं उमंग के साथ मनाया जाता है। पर्व एवं त्यौहार प्रत्येक देश की संस्कृति तथा सभ्यता को उजागर करता है। यहां पर  त्यौहार एवं उत्सव पृथक प्रदेशों में अलग-अलग ढंग से मनाए जाते हैं। मकर संक्रांति पर्व का हमारे देश में विशेष महत्व है। इस संबंध में संत तुलसीदास ने लिखा भी है `माघ मकर गत रवि जब होई। तीरथपतिहि आव सब कोई।’ ऐसा कहा जाता है कि गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर प्रयाग में मकर संक्रांति पर्व के दिन सभी देवी-देवता अपना स्वरूप बदल कर स्नान के लिए आते हैं। वहां मकर संक्रांति पर्व के दिन स्नान करना अनंत पुण्यों को एक साथ प्राप्त करना माना गया है। मकर संक्रांति प्राय: १४ जनवरी को पड़ती है लेकिन इस बार मंगलवार १५ जनवरी को मकर संक्रांति का पुण्यकाल आ रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि  सोमवार १४ जनवरी को रात्रि में २.१३ पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे। अत: मंगलवार  १५ जनवरी को ही मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा। सोमवार को रात्रि में सूर्य   २.१३ पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे इसी समय से सूर्य उत्तरायण हो जाएंगे। भारतीय ज्योतिष शास्त्र के मतानुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य की एक राशि से दूसरी राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर हुआ परिवर्तन माना जाता है। मकर संक्रांति से दिन बढ़ने लगता है और रात्रि की अवधि कम होती जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा और रात्रि छोटी होने से अंधकार की अवधि कम होगी। यह सर्वविदित है कि सूर्य ऊर्जा का स्तोत्र है। इसके अधिक देर चमकने से प्राणि जगत में चेतनता और उसकी कार्य शक्ति में वृद्धि हो जाती है इसीलिए हमारी संस्कृति में मकर संक्रांति पर्व मनाने का विशेष महत्व है।
खगोलशास्त्रियों के अनुसार इस दिन सूर्य अपनी कक्षाओं में दक्षिणायन से उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। जिस राशि में सूर्य की कक्षा का परिवर्तन होता है उसे संक्रमण या संक्रांति कहा जाता है, यही कारण है कि जब सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होता है तब उसे मकर संक्रांति कहते हैं। मकर संक्रांति पर्व में स्नान-दान का विशेष महत्व है। हमारे धर्मग्रंथों में स्नान को पुण्य जनक के साथ ही स्वास्थ्य  की दृष्टि से भी लाभदायक माना गया है। मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं। गर्मी का मौसम आरंभ हो जाता है इसलिए उस समय स्नान करना सुखदाई भी लगता है। उत्तर भारत में गंगा-यमुना के किनारे बसे गांवों में मेलों का आयोजन भी होता है। हिंदुस्थान में सबसे प्रसिद्ध मेला बंगाल में गंगा सागर में लगता है। गंगासागर के मेले के पीछे पौराणिक कथा है कि मकर संक्रांति को गंगा जी स्वर्ग से उतरकर भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम में जाकर सागर में मिल गई। गंगा जी के पावन जल से ही राजा सगर के साठ हजार श्रापग्रस्त पुत्रों का उद्धार हुआ था। इसी घटना की स्मृति में गंगा सागर नाम से तीर्थ विख्यात हुआ और प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के दिन गंगा सागर में मेले का आयोजन होता है। इसके अतिरिक्त दक्षिण बिहार के क्षेत्र में भी एक मेला लगता है। मकर संक्रांति पर्व पर प्रयाग के संगम स्थल पर प्रतिवर्ष लगभग १ माह तक माघ मेला लगता है, जहां भक्तगण कल्पवास भी करते हैं तथा १२ वर्ष में कुंभ का मेला लगता है। यह भी लगभग १ माह तक रहता है। इसी प्रकार ६ वर्ष में अर्धकुंभ का मेला लगता है।
सूर्य का उत्तरायण होना अर्थात सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना मकर संक्रांति कहलाता है। इसी दिन से शुरू उत्तरायण हो जाते हैं। शास्त्रों में उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। ऐसा शास्त्रसम्मत है कि जिन लोगों की मृत्यु सूर्य के उत्तरायण होने के पश्चात अगले छह माह के बीच में होती है उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति भी अवश्य होती है। मकर संक्रांति एक प्रकार से देवताओं का प्रभात काल कहा गया है। इस दिन स्नान, दान, जप, तप तथा अनुष्ठान आदि का अत्यधिक महत्व है। कहते हैं कि इस अवसर पर किया गया दान १०० गुना होकर प्राप्त होता है। आज के दिन घृत और कंबल के दान का भी विशेष महत्व है। इसका दान करनेवाला संपूर्ण भोगों को भोग कर अंत में मोक्ष की प्राप्ति करता है।