" /> मान-मनुहार और हवाई जहाज का टिकट!, प्रवासियों की मुंबई वापसी

मान-मनुहार और हवाई जहाज का टिकट!, प्रवासियों की मुंबई वापसी

कंधे पर अंगोछा, हाथ में मामूली सूटकेस, भोजपुरी में बातचीत और चेहरे पर घबराहट मिश्रित इतमिनान। इन दिनों पटना हवाई अड्डे की फोटो देखिए – ऐसे ही लोग ज्यादा मिलेंगे। कितनी अलग है यह भीड़ अमेरिकन टू‌रिस्टर के सूटकेस और लैपटॉपवाले महंगे लेदर बैग लिये, सूट-बूट झाड़े और फर्राटेदार अंग्रेजी झाड़ते यात्रियों से। यही नजारा लखनऊ, गोरखपुर या रांची एयरपोर्ट पर भी मौजूद दिखेगा। कौन हैं ये? वे मजदूर, जो कोरोना त्रासदी के मारे भाग खड़े हुए थे और अब हवाई जहाजों से मुंबई वापस लौट रहे हैं, जिनके टिकट उनके रोजगारदाताओं ने भेजे हैं।
१ जून, जबसे ‘अनलॉक-१’ का पहला चरण शुरू हुआ है, तकरीबन १५-२० हजार लोग रोज ही उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और केरल से ट्रेनों से मुंबई पहुंच रहे हैं। इस लिहाज से करीब आठ लाख लोग, जो सरकार द्वारा चलवाई ट्रेनों व बसों से, वाहन जुटाकर, साइकिल से या पैदल ही गांव जा पहुंचे थे, अब मुंबई लौट आए हैं। ये हवाई यात्री इन्हीं में हैं। वापस उसी मुंबई की शरण में, जो सभी की अन्नदाता है। यह दोनों की जरूरत की घड़ी है।

बलिया से दो महीने बाद लौटे रजनीश कुमार इन्हीं लोगों में से हैं, जो कमरा खालीकर, अपनी सारी उधारी चुकाकर कांट्रेक्टर से यह करकर लौटे थे कि ‘दोबारा इस शहर में पांव नहीं रखूंगा।’ पेट की भूख ने उनके सारे भरम तोड़ डाले। जौनपुर के दिलाजीत पटेल लौटने की तैयारी में हैं, क्योंकि उन्हें नहीं मालूम कि गांव में कमाई का एकमात्र साधन-उनकी गाय अपने दूध से होनेवाली आय से कब तक रक्षा कर पाएगी। रजनीश की तरह दूधवाले, सब्जी व फलवाले, टैक्सी व ऑटोरिक्शावाले, मोची, धोबी व लांड्रीवाले, फरसाणवाले, सैलूनवाले, हमाल व ड्राइवर, दुकानदार, मंदिरों के पुजारी, छोटे-मोटे काम करनेवाले….. सभी उत्तर भारतीय अब लौटने लगे हैं।
अकेला रोजगार ही लौट रहे इन लोगों की वापसी की वजह नहीं है। अनगिनत दुःख झेलकर गांव-घर पहुंचे ये श्रमिक समाज के फ्रंट पर ही नहीं, अपने ही परिवार के आंगन में भी मिले कटु अनुभवों से लैस होकर लौट रहे हैं। इनमें कई कोरोना से भी ज्यादा दुःखी हैं अपनों की ही बेरुखी और बेगानों जैसे व्यवहार से। वसई के एक लांड्रीवाले – जिसे उसकी पत्नी और बेटे ने ही गांव आने पर घर में घुसने देने से साफ इनकार कर दिया है – ने बताया, ‘खून-पसीना एक करके कमाए रुपयों का बड़ा भाग परिवार के पालन-पोषण के लिए गांव में मनीऑर्डर करता रहा। खुद के शरीर को गलाकर गांव में बैठे आत्मीयों के लिए घुला दी। अब उन्हीं का ऐसा व्यवहार!’

समस्याओं का अंबार
अखबार, टी.वी. चैनल या सोशल मीडिया सभी इन दिनों लौट रहे लोगों की ऐसी ही कहानियों से छाये हैं। अपना सूबा, गांव हो या शहर, अपना परिवार ही क्यों न हो कम या बगैर पैसे के जीना कितना कठिन है इन लोगों को दो महीने में ही समझ में आ गया है। ग्रामीण समाज में फिर एक साथ रहने की इन स्थितियों में अपनों में ही आपसी रंजिश और अपराध के आंकड़े बढ़ रहे हैं, इसकी मिसाल हैं वहां से आ रही खबरें। वहां होनेवाली मौसम और बिजली जैसी दिक्कतों पर भारी पड़ गई है संबंध निभाने की दिक्कत। इससे भी ज्यादा गुजर-बसर की परेशानियां। अधिकांश लोगों के पास एक एकड़ जमीन भी तो नहीं होगी शायद एक आदमी के हिस्से में..। न ही बड़े कारखाने, मिलें और कंपनियां। गांव में कौन उन्हें खिलाएगा और कितने दिन?

फिर भी जो लोग गांवों में रुककर किसानी करना चाहते हैं उनके लिए समस्याओं का अंबार पहले से है। ‘फसल अच्छी हो या खराब हमारी खुशहाली कभी नहीं आती’, मिर्जापुर से मुंबई आकर दूध के धंधे में लगे राममूरत ने इनका खुलासा किया, ‘खेती के काम के मुख्य घटक पानी, डीजल, खाद-उर्वरक, मजदूरी वगैरह के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं। फसल अच्छी हो या खराब, उसकी लागत और मंडी में मिलनेवाले दाम में फर्क बना ही रहता है और कर्ज का बोझ अपार हो चला है।’ जो लोग शहर में रहकर गांव में मजदूरों के सहारे कृषि कर्म जारी रखना चाहते हैं उन्हें मजदूर नहीं मिलते। मिल भी जाएं तो नखरे झेलने पड़ते हैं, क्योंकि सरकारी योजनाओं के तहत रोजगार अब इन मजदूरों के लिए पहले जैसी समस्या नहीं रही।

उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों से कब पहले की तरह गुलजार होगी मुंबई, अभी यह तो कहना मुश्किल है, पर इतना तय है कि मुंबई को भी इन उत्तर भारतीयों की उतनी ही जरूरत है। मुंबई इतनी खुशहाल है तो उत्तर भारत से आए इन उत्तर भारतीयों के दम पर भी। महानगर का सबसे बड़ा यह प्रवासी समाज अपने शारीरिक श्रम, हुनर, जी-तोड़ मेहनत, लगन और निष्ठा के बूते‌ ही यहां टिका है। मुंबई उनकी कर्मभूमि है। वे इसे छोड़ सकते हैं, पर सिर्फ दोबारा लौटने के लिए। और वे यही कर रहे हैं।