" /> माह के अंत तक गुलजार होगा लेह राजमार्ग

माह के अंत तक गुलजार होगा लेह राजमार्ग

अमूमन छह महीनों तक बर्फ से बंद रहने वाला लेह राजमार्ग इस माह के अंत में गुलजार होने जा रहा है। इतना जरूर है कि इस राजमार्ग के बंद होने पर जो लोग 6 महीनों तक पूरी दुनिया से कट जाते हैं उनकी हिम्मत काबिले सलाम है। बीआरओ की टीम ने 20 मार्च के बाद किसी भी समय नेशनल हाईवे 1डी के खुलने का अनुमान जताया है। करगिल से मीनामार्ग तक चल रहे बर्फ हटाने के कार्य का निरीक्षण करने पहुंचे अधिकारियों ने बताया कि दूसरी दफा तीन महीने बाद ही हाईवे खुलने जा रहा है। पिछले साल भी ऐसा ही हुआ था। बीस मार्च तक मार्ग खोलने का काम निपटाने का प्रयास किया जा रहा है। अधिकारियों ने बताया कि बर्फ हटाने के लिए 4 डोजर, 2 स्नो कटर लगातार लगाए गए हैं। एक डोजर और एक स्नो कटर मशीन को स्टैंड बाई पर रखा गया है।

श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर इस माह के अंत तक वाहन दौड़ने लगेंगे। लद्दाख में सर्दियों के छह महीनों के लिए स्टाक जुटाने में अगले पांच महीने अहम होंगे। जरूरत का सामान जुटाने के लिए मई से सितंबर के बीच ट्रकों के करीब 20 हजार से ज्यादा फेरे लगेंगे।  राजमार्ग के छह महीनों तक बंद होने से लाखों लोगों का संपर्क शेष विश्व से कट जाता है और ऐसे में उनकी हिम्मत काबिले सलाम है। बात उन लोगों की हो रही है जो जान पर खेल कर लेह-श्रीनगर राजमार्ग को यातायात के लायक बनाते हैं। बात उन लोगों की हो रही है जो इस राजमार्ग के बंद हो जाने पर कम से कम 6 माह तक जिन्दगी बंद कमरों में इसलिए काटते हैं क्योंकि पूरे विश्व से उनका संपर्क  कट जाता है।

श्रीनगर से लेह 434 किमी की दूरी पर है। पर सबसे अधिक मुसीबतों का सामना सोनमार्ग से द्रास तक के 63 किमी के हिस्से में होता है। पर बीआरओ के जवान इन मुसीबतों से नहीं घबराते। वे बस एक ही बात याद रखते हैं कि उन्हें अपना लक्ष्य पूरा करना है। तभी तो इस राजमार्ग पर बीआरओ के इस नारे को पढ़ जोश भरा जा सकता है जिसमें लिखा होता हैः‘पहाड़ कहते हैं मेरी ऊंचाई देखो, हम कहते हैं हमारी हिम्मत देखो।’ भयानक सर्दी, तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे। खतरा सिरों पर ही मंडराता रहता है। पर बावजूद इसके बीआरओ के जवान राजमार्ग को यातायात के योग्य बनाने की हिम्मत बटोर ही लेते हैं।

आप सोच भी नहीं सकते कि मौसम इस राजमार्ग पर कितना बेदर्द होता है। सोनमर्ग से जोजिला तक का 24 किमी का हिस्सा सारा साल बर्फ से ढका रहता है और इसी बर्फ  को काट जवान रास्ता बनाते हैं। रास्ता क्या, बर्फ की बिना छत वाली सुरंग ही होती है जिससे गुजर कर जाने वालों को ऊपर देखने पर इसलिए डर लगता है क्योंकि चारों ओर बर्फ  के पहाड़ों के सिवाय कुछ नजर नहीं आता। याद रहे साइबेरिया के पश्चात द्रास का मौसम सबसे ठंडा रहता है। जहां सर्दियों मंे अक्सर तापमान शून्य से 49 डिग्री भी नीचे चला जाता है।

राजमार्ग को सुचारू बनाने की खातिर दिन-रात दुनिया के सबसे खतरनाक मौसम से जूझने वाले इन कर्मियों के लिए यह खुशी की बात हो सकती है कि पिछले दो सालों से किसी हादसे से उनका सामना नहीं हुआ है। सोनमर्ग से जोजिला तक का 24 किमी का हिस्सा बीकन के हवाले है और जोजिला से द्रास तक का 39 किमी का भाग प्रोजेक्ट हीमांक के पास। बीकन के कर्मी इस ओर से मार्ग से बर्फ हटाते हुए द्रास की ओर बढ़ते हैं और प्रोजेक्ट हीमांक के जवान द्रास से इस ओर।
काबिले सलाम सिर्फ बीआरओ के कर्मी ही नहीं बल्कि इस राजमार्ग के साल में कम से कम 6 महीनों तक बंद रहने से दुनिया से कटे रहने वाले द्रास, लेह और करगिल के नागरिक भी हैं। इनमें रहने वालों के लिए साल मंे छह महीने ऐसे होते हैं जब जिन्दगी बोझ बन जाती है। असल में छह महीने यहां के लोग न तो घरों से निकलते हैं और न ही कोई कामकाज कर पाते हैं। जमा पूंजी खर्च करते हुए पेट भरते हैं। चारों तरफ बर्फ के पहाड़ों के बीच लद्दाख के लोगों को अक्तूबर से मई तक के लिए खाने पीने की चीजों के अलाव रोजमर्रा की दूसरी चीजें भी पहले ही एकत्र कर रखनी पड़ती हैं। नमक हो या फिर तेल सब कुछ 6 महीने के स्टाक के साथ जमा होता है।