मिग से चुनौती बड़ी भूल!, – ४८ घंटे में लेंगे बदला

परसों पाकिस्तानी बालाकोट में मिराज लड़ाकू विमानों द्वारा जैश के आतंकी अड्डे को ध्वस्त करने के बाद पूरे देश में जोश का माहौल था, वह कल कुछ फीका पड़ गया। कारण था कि एलओसी पर भारतीय वायुसेना का एक मिग-२१ विमान को पाकिस्तान ने न सिर्फ मार गिराया बल्कि उसके पायलट को कब्जे में भी ले लिया। हालांकि ऐसी खबरें आ रही हैं कि ४८ घंटे के भीतर इसका बदला लिए जाने की प्लानिंग हो रही है। मिग-२१ काफी पुराने किस्म के विमान हो चुके हैं और २०१३ के दिसंबर में इसे सेवा से बाहर किए जाने की भी खबर आई थी। ऐसे में जब एक दिन सुखोई, मिराज और जगुआर जैसे उन्नत विमानों के शौर्य की गाथा देश में सुनाई जा रही थी, उसके अगले दिन एलओसी पर मिग-२१ विमान वैâसे पहुंच गया?
जब पाकिस्तान ने खुलकर कहा था कि वो जवाबी कार्रवाई करेगा तो मतलब साफ था कि वह अपने एफ-१६ से ही करेगा। ऐसे में एलओसी पर एफ-१६ को मिग से चुनौती देना एक बड़ी भूल ही कही जाएगी।
हिंदुस्थान के पास जो मिग-२१ हैं ये काफी पुराने हो चुके हैं और ट्रेनिंग में ही इनका इस्तेमाल ज्यादा होता है। ऐसे में जानकारों का मानना है कि इन्हें मोर्चे पर भेजना ठीक नहीं है। विगत वर्षों में मिग-२१ ने दुर्घटनाग्रस्त होकर कई पायलटों की जानें ली हैं। ७० के दशक की शुरूआत में मिग-२१ मुख्य विमान था मगर ७० के दशक के ही आखिर में वायुसेना को ब्रिटिश जगुआर मिले, जो मुख्य युद्धक विमान बन गए थे। इसके बाद ८० के दशक में प्रâेंच मिराज २००० ने वायुसेना की शान बढ़ाई और ९० के दशक में रूसी सुखोई -३० के आने के बाद भारतीय वायुसेना दुनिया के ‘टॉप ६’ में शामिल हो गई थी। मिग-२१ कहीं बहुत पीछे छूट चुका था। मिग-२१ तो अपनी दुर्घटना के कारण इतना बदनाम हो चुका था कि इस पर आधारित बॉलीवुड में ‘रंग दे बसंती’ फिल्म भी बन गई थी। २०१३ तक वायुसेना में २५२ मिग-२१ ऑपरेशनल थे। हालांकि इन्हें अपग्रेड किया गया और ये ‘मिग-२१ बिशॉन’ हो गए पर चौथे और पांचवीं पीढ़ी के विमानों के सामने ये कहीं नहीं टिकते। यहां नीचे बॉक्स में मिग-२१ और एफ-१६ का मोटामोटी तुलनात्मक अध्ययन दिया गया है।
मिग काफी पुराने रूसी विमान हैं, जो १९६३ के बाद वायुसेना में शामिल होने शुरू हुए थे। एक समय वायुसेना में १,२०० मिग २१ थे। ९० के दशक में पुरानी तकनीक और उचित रखरखाव के अभाव में २०० से ज्यादा मिग-२१ दुर्घटनाग्रस्त हो गए। इस कारण इसे आसमान में अड़ता हुआ ताबूत भी कहा जाने लगा। अगर कीमतों की बात की जाए तो मिग-२१ की कीमत २ मिलियन डॉलर यानी करीब १४ करोड़ रुपए होती है जबकि एफ-१६ की कीमत १४ मिलियन यानी करीब १०० करोड़ बताई जाती है। ऐसे में अगर कल सुबह के नुकसान की बात की जाए तो हमारी वायुसेना ने उनका एफ-१६ गिराकर ज्यादा नुकसान किया। हालांकि ये कीमतें सिर्फ विमान की हैं जबकि विमान की असली कीमत तो उसके ऊपर तैनात हथियार के बाद तय होती है। फिर ये जो कीमतें हैं वे पुरानी और तब की हैं, जब इन्हें बनाया गया था। अब न तो मिग-२१ बनते हैं और न एफ-१६। इनकी जगह मिग-३५ और एफ-३५ ने ले ली है। सुखोई का भी नवीन संस्कार सुखोई-३५ आ चुका है।

– मिग-२१ विमान काफी पुराने हैं और लड़ाई के लिए उपयुक्त नहीं
– आधे से ज्यादा मिग-२१ हो चुके हैं व्रैâश
– लगभग २०० पायलट्स की दुर्घटनाओं में जा चुकी है जान
– ६० के दशक में वायुसेना में शामिल होना शुरू हुए मिग-२१
– मिग-२१ दुर्घटना के सिलसिले पर फिल्म भी बन चुकी है
– वर्तमान टेंशन को देखते हुए एलओसी पर मिग भेजना दुर्भाग्यपूर्ण
– पाकिस्तानी एफ-१६ भी पुराना पर मिग-२१ के मुकाबले काफी उन्नत

मिग-२१
खासी तादाद में गोला-बारूद ले जाने में सक्षम है।
कॉकपिट के बार्इं ओर से गोलियां बरसाने का इंतजाम है। ४२० राउंड ले जाए जा सकते हैं।
हवा से हवा और हवा से जमीन तक मार करनेवाली मिसाइलें ले जाई जा सकती हैं।
१००० किलो तक के वजनवाले कई तरह के बम भी मिग-२१ के जरिए ले जाकर दुश्मन पर बरसाए जा सकते हैं। इनमें केमिकल और क्लस्टर बम भी शामिल हैं।
कुल २००० किलो तक का गोला बारूद मिग पर लोड किया जा सकता है।
मिग-२१ की अधिकतम रफ्तार २,२३० किमी प्रति घंटा हो सकती है।

एफ-१६
एफ-१६ को फाइटिंग फाल्कन और वाइपर नामों से भी जाना जाता है। यह अमेरिका निर्मित विमान है।
ये दुनिया के सबसे मशहूर लड़ाकू विमानों में से है।
हवा से हवा में मार करनेवाली ६ मिसाइलें ले जाने में सक्षम। हवा से जमीन पर मार करनेवाली मिसाइलें ले जाना संभव।
एफ-१६ परमाणु हथियार ले जाने में भी सक्षम।
९ जगहों पर बम और मिसाइलें फिट की जा सकती हैं।
ये हर मौसम में अपने लक्ष्य का निर्धारण कर सकता है।
अधिकतम रफ्तार २,४१४ किमी प्रति घंटा।