मिट्टी बेचकर रोटी का जुगाड़

सूरज उगने से पहले उठने और आधी रात तक जागनेवाले कुम्हार मिट्टी बेचकर अपनी रोटी का जुगाड़ करते हैं। अपने परिवार की रोजी-रोटी चलाने के लिए अब यह मिट्टी इन्हीं कुम्हारों के लिए पर्याप्त नहीं है। मिट्टी से दिवाली का दीए बनाकर मुंबई के घर-घर को रोशन करनेवाली धारावी के कुम्हारों के खुद के घरों में अंधेरा है। ये कुम्हार अपनी कमाई से अपने बच्चों को पढ़ाने और उनका पेट पालने में असमर्थ हैं। दिवाली के बाद ये साल भर वापस इसी त्योहार के आने का इंतजार करते हैं, पर मिट्टी को बेचने से मिली कीमत से ये खुद का घर नहीं संजो पाते।
कुम्हारों के लिए महंगाई ग्राहकों से मोलभाव के कारण अपना पेट पालना उनके लिए मुश्किल हो गया है। ग्राहक मोलभाव करते हुए २० रुपए प्रति जोड़ी दीए को १२-१३ रुपए में खरीदना चाहते हैं। कुम्हारों का कहना है कि इसमें तो वे अपनी लागत भी पूरी नहीं निकाल पाते। दीया बनाने के लिए चिकनी मिट्टी से उनको आकार देने, सेंकने, रंग करने और पैक करने जैसे तमाम चरणों से गुजरना पड़ता है। ग्राहकों की १२-१३ रुपए की मांग में तो वे अपनी लागत भी पूरी नहीं निकाल पाते। सुबह जल्दी उठकर और रातों को जाग-जागकर दीया बनाने के बावजूद उनके लिए अपना घर चलाना बेहद मुश्किल है। कुम्हारवाड़ा में ही रहनेवाले सुभाष प्रजापति का कहना है कि १२वीं के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़कर पीढ़ियों से चले आ रहे इसी काम को अपना रोजगार बना लिया, पर उन्हें नहीं लगता कि वो शादी के बाद इससे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा पाएंगे और उनका खर्च चला पाएंगे। इसी के साथ भावना वर्मा का कहना है कि वे शादी से पहले भी अपने परिवार के लिए दीए और मटकी बनाती थीं और शादी के बाद भी बना रही हैं। इससे उनके हाथों में घाव भी हो गए हैं, पर घर चलाने के लिए वह ये काम करने को मजबूर है।