मीलॉर्ड को मिलेगी रेटिंग, कहीं खुशी, कहीं गम

देश में आज भी लोग न्याय के लिए सबसे ज्यादा विश्वास न्यायालय पर करते हैं, परंतु न्यायालय से न्याय मिलने में हो रही देरी भी लोगों के लिए एक बड़ी मुसीबत है। देशभर के न्यायालयों में आज भी २.८ करोड़ मामले प्रलंबित हैं। कोर्ट के कामकाज में तेजी लाने और मामलों का जल्द से जल्द निपटारा हो इसलिए नीति आयोग अब जजों को जज करके उन्हें रेटिंग दिए जाने को लेकर एक प्रस्ताव बना रही है। इस प्रस्ताव के तहत आगे चलकर जजों के काम-काज के आधार पर उन्हें रैंकिंग व पदोन्नती प्रदान की जाएगी और उसे सार्वजनिक किए जाने की बात भी कही जा रही है। नीति आयोग द्वारा लाए जानेवाले इस प्रस्ताव को लेकर कहीं खुशी, कहीं गम देखा जा सकता है। कुछ पूर्व जजों और वकीलों की मानें तो इससे न्याय प्रक्रिया को गति मिलेगी और पारदर्शिता आएगी बशर्ते जजों को जज करनेवाली बॉडी कौन होगी? इस पर सब कुछ निर्भर करता है। वहीं दूसरी ओर न्यायपालिका से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि न्यायाधीशों के लिए पफॉर्मेंस के आधार पर रेटिंग देना एक तरह से कार्यपालिका का न्यायपालिका पर अतिक्रमण है। इससे न्यायपालिका कमजोर होगी।
फिल्म ‘दामिनी’ का तारीख पर तारीख…डायलॉग आज भी काफी प्रसिद्ध है। कोर्ट में इंसाफ के लिए कतार में खड़े लोग अक्सर तारीख का ही जिक्र करते हैं। वित्त मंत्रालय द्वारा किए गए अध्ययन की मानें तो देश में लंबित २.८ करोड़ मामलों को यदि वर्तमान स्पीड से चलाया गया तो इसे निपटाने में देश के १७ हजार न्यायाधीशों को ३२४ साल लग जाएंगे। न्यायायिक प्रक्रिया को गति देने के लिए उन्हें रेटिंग देने का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। न्यायपालिका में मुकदमों की सुस्त स्पीड से सुनवाई का जो हाल है उसे देखकर फिलहाल यही कहा जा सकता है कि नौ दिन चले अढ़ाई कोस!
बता दें कि जिस तरह निजी ऑफिस में प्रदर्शन के आधार पर हर साल अप्रेजल होता है। बिल्कुल उसी प्रकार देश भर के सभी न्यायालयों में कार्यरत न्यायाधीशों के प्रदर्शन को देख उन्हें रेटिंग व रैंकिंग दी जाने की योजना पर काम चल रहा है। नीति आयोग के सूत्रों की मानें तो प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है। लोकसभा चुनाव के बाद सरकार के समक्ष इसको पेश किया जाएगा। जजों का मूल्यांकन का पैमाना कुछ इस प्रकार होगा, जैसे एक जज के पास केसों की संख्या, प्रत्येक केस में लगनेवाला समय, प्रत्येक केस की लागत, निस्तारण की संख्या और कोर्ट का बजट शामिल है। इस प्रस्ताव का कुछ ने स्वागत किया है तो कुछ ने इसे हस्तक्षेप बताया हैं। बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व जज अभय थिप्से ने ‘दोपहर का सामना’ से इस संदर्भ में कहा कि जजों के प्रदर्शन को जज करना बिल्कुल सही है लेकिन उनके प्रदर्शन को कौन जज कर रहा है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। आज भी निचली कोर्ट के जजों का प्रदर्शन हाई कोर्ट द्वारा जज किया जाता है लेकिन जब बात प्रमोशन की हो तो वरिष्ठता को तव्वजो दिया जाता है न कि मेरिट को। सरकार की यह पहल अच्छी है बशर्ते जजों को जज करनेवाली बॉडी में पूर्व जज, प्रख्यात वकील और बुद्धजीवी लोग होने चाहिए जो कानूनी प्रक्रिया को पूरी तरह समझते हों। प्रख्यात पब्लिक प्रॉसिक्यूटर एड उज्ज्वल निकम ने कहा कि यह अच्छा प्रस्ताव है और मैं इसका स्वागत करता हूं क्योंकि पारदर्शिता होना काफी जरूरी है। अब तक ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि इसमें सरकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए और परफॉरमेंस को रेट जजों की बॉडी द्वारा ही किया जाना चाहिए। एड सलिल खान ने कहा कि आवश्यक कानून पहले से ही हैं, कुछ संशोधनों की आवश्यकता है। यह ध्यान में रखना चाहिए कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता सर्वोपरि है और कार्यपालिका या विधायिका के हस्तक्षेप से उसे मुक्त होना चाहिए।