मी टू!

हिंदुस्थान में कब किस विषय पर बवंडर मच जाएगा और उस बवंडर में बड़े-बड़े लोग किस तरह डूबते-उतराते नजर आने लगेंगे, कहा नहीं जा सकता। ऐसे मामलों में देश की बदनामी होती है, इसका विचार कोई नहीं करता। दिल्ली में ‘निर्भया’ बलात्कार कांड हुआ। उसके बाद देश की अनेक बलात्कार की घटनाओं को ख्याति मिलने लगी, दिल्ली बलात्कार की राजधानी के रूप में बदनाम हुई। अब ‘मी टू’ का बवंडर उठा है। इस बवंडर का रूपांतर दावानल में बदल चुका है। नाटक, साहित्य, पत्रकारिता, फिल्म जैसे सभी क्षेत्रों के दिग्गजों पर विनयभंग तथा यौन शोषण का आरोप लगानेवाली महिलाओं ने पुरुष प्रधान संस्कृति पर सवाल खड़ा कर दिया है। तनुश्री दत्ता-नाना पाटेकर से शुरू हुआ ‘मी टू’ मामला केंद्रीय मंत्री एम.जे. अकबर तक पहुंच चुका है और ये सारे मामले देश-विदेश के लोग बड़े चाव से पढ़ रहे हैं। पिछले २५ वर्षों में देश की साहित्य, संस्कृति, कला तथा राजनीति में कुछ अच्छा नहीं हुआ और यहां सिर्फ हैवानशाही का ही राज था, ऐसी तस्वीर बन गई है। हालांकि इस तस्वीर को बदलने का काम अब इस मामले के ‘संदेहास्पद’ लोगों को ही करना पड़ेगा। महिलाओं के बारे में होनेवाला दुर्व्यवहार सभी दृष्टिकोण से गंभीर मामला है। इसे रोकने के लिए सख्त कानून भले ही बनाए गए हों, फिर भी समाज को भी चाहिए कि महिलाओं के बारे में किसी भी तरह के दुर्व्यवहार को बर्दाश्त न करे। सच तो यह है कि हमारे समाज में स्त्री को देवी माना जाता है, माता के रूप में संबोधित किया जाता है फिर भी स्त्री अत्याचार की घटनाएं होती हैं और ‘मी टू’ जैसी मुहिम के माध्यम से कहानियां बाहर आती हैं तो ये दुर्भाग्यपूर्ण है। हालांकि जिन महिलाओं ने अब ‘मी टू’ की लहर पर सवार होकर शिकायतें की हैं, वे कोई गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी जीनेवाली अशिक्षित महिलाएं नहीं हैं। उन्हें कानून का ज्ञान था ही लेकिन उसके साथ घटना होने के ५, १०, १५ वर्षों बाद उन्होंने ये सारे मामले सामने लाए हैं जबकि इस तरह के मामलों को तत्काल सामने लाना चाहिए। तनुश्री दत्ता, प्रिया रामाणी, नवनीत निशान, विनिता नंदा जैसी प्रतिष्ठित महिलाओं ने ‘मी टू’ में शामिल होकर नाना पाटेकर, एम.जे. अकबर, आलोकनाथ, वरुण ग्रोवर, विकास बहल जैसे लोगों पर आरोप लगाया है। बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा ने भी उनके साथ किए गए गलत व्यवहार का जिक्र किया है। इसमें से कई लोगों को सरकार ने ‘पद्म’ पुरस्कार से सम्मानित किया है इसलिए ये मामले दोनों तरफ से विचार करने जैसे हैं। पर्दे पर और अखबारों में नैतिकता की भूमिका रखनेवालों पर ये आरोप लगे हैं। आलोकनाथ ने अब कहा है कि, ‘विनिता नंदा से बलात्कार हुआ होगा इससे मैं इंकार नहीं करता लेकिन वो बलात्कार मैंने नहीं किया है।’ फिलहाल सिर्फ महिलाओं की ही सुनी जाती है, पुरुषों की कोई नहीं सुनता, ऐसा आलोकनाथ कहते हैं। संभवत: एम.जे. अकबर और विकास बहल का भी यही कहना होगा। भाजपा के दिल्ली के सांसद उदित राज ने तो ‘क्रांतिकारी’ बयान दिया है। उनका कहना है कि, ‘इस तरह के गंदे आरोप लगाने के लिए महिलाएं पैसे लेती हैं। किसी के कहने पर वे अन्य पुरुषों को निशाना बनाती हैं। सभी महिलाएं परफेक्ट होती हैं क्या? उनका गलत इस्तेमाल नहीं हो सकता क्या? इस तरह के आरोप लगने के बाद किसी व्यक्ति की जिंदगी चौपट हो जाती है।’ ऐसा उदित राज का कहना है। कई लोगों को उनके आरोपों में सच्चाई लगने की संभावना है। स्त्रीत्व का अपमान करनेवाली अन्य घटनाओं के समय महिला सम्मान का दर्शन दुर्भाग्य से नहीं होता। भाजपा के मुंबई के एक विधायक ने महिलाओं के बारे में अशोभनीय बयान दिया था। मनपसंद लड़कियों को भगाकर लाने की बात करने के बावजूद उसे पार्टी तथा सरकार ने संभाला लेकिन आक्रोशित महिलाओं का उग्र रूप उस बारे में दिखाई नहीं दिया। महिलाओं की सुविधा के लिए अदालत ने व्यभिचार को मान्यता देनेवाली धारा-४९७ रद्द कर दी। यह संस्कार और विवाह संस्कृति पर आघात है। लेकिन इस निर्णय के बारे में कितनी महिलाओं ने आवाज उठाई? विनयभंग, व्यभिचार और बलात्कार जैसी विकृति को समाज में स्थान नहीं मिलना चाहिए और उसे किसी तरह का कवच-कुंडल भी प्राप्त न हो। पुरुष प्रधान संस्कृति का समर्थन कोई भी नहीं करेगा लेकिन पुरुष प्रधान संस्कृति नष्ट करते समय नई विकृति की संस्कृति उदित होनेवाली होगी तो उस खतरे को भी रोका जाना चाहिए। ‘मी टू’ का मामला गलत इस्तेमाल का हथियार न बने। महिलाओं की रक्षा ही हमारी संस्कृति है और उसका जतन हमें करना ही होगा।