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मुंबई का अफगानी ठाट!

ईसाइयों का मशहूर गिरजाघर और नाम ‘अफगान’। क्यों? क्योंकि कुलाबा का यह मशहूर चर्च अफगान युद्ध में मारे गए योद्धाओं की स्मृति में बनाया गया चर्च है। मुंबई बंदरगाह में प्रवेश करनेवाले पोतों के लिए कभी ६० मीटर ऊंचा यह चर्च ही सबसे बड़ा लैंडमार्क था, जो अन्य कारणों से भी प्रसिद्ध हुआ इसमें एक था विश्वप्रसिद्ध पॉप स्टॉर मडोना का प्रेयर के लिए यहां आना।

अफगान स्नो, ‘दमपुख्त’ और ‘खैबर’ रेस्तरां, अफगानी मेवे, एक्टर फिरोज खान, क्रिकेटर इरफान पठान, रवींद्रनाथ टैगोर की ‘काबुलीवाला’ कहानी, अमिताभ बच्चन की ‘खुदागवाह’ फिल्म और ‘यारी है ईमान’ गाना …। ‘अफगान’ सुनकर ही दिमाग में कौंध जाता है ढीले शलवार-कुर्ते वाले पठानी सूट व पगड़ी में सजा लंबे बालों और मेहंदी लगी दाढ़ी वाला शख्स और मूल से ज्यादा सूद पर निगाह गड़ाए पठानी साहूकार। ड्रग की तस्करी में यदा-कदा पकड़े जानेवाले अफगानी छुटभैयों को छोड़ दें तो मुंबई वाले भी अब भूल गए कि करीम लाला के रूप में अपराधियों का वह सरताज भी अफगानियों ने ही दिया, जिसे पूरा देश ‘मुंबई का पहला डॉन’ के रूप में जानता है। अफगानिस्तान में ‘पख्तून समुदाय का आखिरी राजा’ कहलाने वाले करीम लाला, उर्फ अब्दुल करीम शेर खान के बारे में मुंबई पुलिस के इतिहासकार दीपक राव ने लिखा है, ‘अपने जीवन काल में वे ही मुंबई की अफगान बिरादरी के अघोषित प्रमुख थे। बिरादरी की तरफ से अच्छे चाल-चलन की गारंटी देने और रिहायशी परमिट के नवीनीकरण के लिए हर साल उन्हें सीआईडी, मुंबई की स्पेशल ब्रांच के सामने खड़े देखा जा सकता था।’

ढाई शताब्दी पुराना इतिहास
मुंबई में अफगानियों का इतिहास ढाई शताब्दी से मिलता है। १९वीं सदी से खासकर, जब काम-धंधे के सिलसिले में वे मुंबई आना शुरू हुए। मुंबई पुलिस की १९७८ की रिपोर्ट के अनुसार स्पेशल ब्रांच में रजिस्टर्ड पठानों की तादाद ८६० थी, पर आज अगर गिनें तो मुंबई में ४००-६०० से ज्यादा पठान नहीं मिलेंगे। अब ये सात रास्ता (जैकब सर्किल), फोर्ट के बेलार्ड पियर, गोदियों से लगी बस्तियों और मालाड के पठानवाडी इलाके में ही दिखते हैं। ज्यादातर अफगान बड़ा सा कमरा किराए पर लेकर २०-३० के ग्रुप में रहते हैं और दस्तरख्वान बिछाकर एक ही साथ अफगानी खाना खाते हैं। इतने वर्षों से यहां रहते उनकी नई पीढ़ी ने यहीं का बाना अपना लिया है। मुंबई में बसे अफगानियों में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बलूचिस्तान व पख्तूनिस्तान के यूसुफजई, अहमदजई, दुर्रानी (अब्दाली), शाह, कक्कड़ और अफरीदी जनजातियों के लोग ही ज्यादा मिलते हैं। मुंबई में कान्वेंट स्कूलों और अंग्रेजी माध्यम में पढ़कर पीढ़ी भी उच्च-शिक्षित हो गई है, पर अफगानियों को बेटियों का नौकरी करना पसंद नहीं। इसलिए बहुत सारे अफगानों ने मिडिल-ईस्ट और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में बेहतर काम-धंधे तलाश लिए हैं।
अफगानियों में शरणार्थी काफी हैं। देश के दूसरे हिस्सों की तरह मुंबई के अफगानी भी चार खेपों में भारत आए हैं। पहली खेप १९७०-१९८० में, जब अफगानिस्तान तत्कालीन सोवियत संघ के कब्जे में था। दूसरी खेप १९९० से १९९६ के बीच, जब वह गृहयुद्ध की चपेट में था। तीसरी खेप १९९६ में तालिबान के आने के बाद। २००१ के बाद जो अफगानी यहां आए उन्होंने आर्थिक और सुरक्षा कारणों से यहां का रुख ‌किया। एक अलग श्रेणी इलाज के लिए आने वाले छात्रों, मेडिकल टूरिस्ट्स और घूमने-फिरने आए संपन्न लोगों की है। अपने देश की राजनीतिक अनिश्चितता के कारण ज्यादातर अफगानी यहीं बसे रहने के ख्वाहिशमंद हैं। इसके लिए वे लंबी अवधि के वीजा या एलटीवी के भरोसे हैं, जो पांच साल के लिए मान्य होता है। इनमें करीब एक चौथाई मामले अफगान हिंदू और सिखों के हैं।

रोजी-रोटी का सवाल इन लोगों के लिए बड़ा मसला है। ज्यादातर अफगानी मिल मालिकों और समृद्ध उद्योगपति-व्यापारियों के बंगलों में, वॉचमैन, मिल, गोदी और रिफाइनरी कामगार जैसे कामों में लगे हैं। कुछ अफगानी अफगान रेस्तरांओं में हैं और कुछ खास अफगानी रोटियों और साहूकारी के धंधे में। पठान पीढ़ियों से घोड़े, मेवे, केसर, कालीन, जवाहरात आदि का व्यापार करते रहे हैं। अंजुमन-ए-पख्तून ट्रस्ट के महासचिव याकूब खां बताते हैं, ‘अंग्रेजों के जमाने में रेजिडेंशियल परमिट के जरिए डूरंड रेखा के दोनों ओर खुलेआम आवाजाही थी। आज जब भारत-पाकिस्तान के संबंध खराब दौर में हैं भारत में बसे पठानों के लिए – खासकर जब उन्होंने भारतीय नागरिकता ले ली हो-संबंधियों से मिलने और पुश्तैनी जमीन-जायदाद की देखभाल के लिए पाकिस्तानी वीजा मिलना बहुत कठिन हो गया है। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर-जो पठान गांवों से गुजरता है-उसके पूरी तरह बन जाने के बाद ये बंदिशें और कठोर होंगी। ऐसे में पठान समुदाय, खासकर कारोबारी वर्ग बेसब्री से इंतजार कर रहा है ईरान के चाबहार बंदरगाह और २१८ किलोमीटर लंबे जरंज-देलहाम सड़क और रेल कॉरिडोर पूर्ण होने का, जिसके बाद परिवहन के लिए पाकिस्तान पर आश्रित रहने की जरूरत ही खत्म हो जाएगी।

‘जिरगा’ में होता है कबायली फैसला
अफगानी भले हिंदू या सिख हों, आपस में अफगानी, पश्तो और दारी में ही बातें करना पसंद करते हैं। उनकी लिपि है दारी और फारसी। अफगानी बहुत ही उदार स्वभाव के, मेहमानवाज, पर लो-प्रोफाइल, राजनीति के किनाराकशी करने और अपने-आप में सिमटे रहने वाले, पर अपने धर्म और सांस्कृतिक पहचान को लेकर बहुत संवेदनशील और परंपराओं के मामले में तो कट्टर। मुंबई में अपनी तीसरी पीढ़ी गुजार रहे बेदर खां इसका कारण बताते हैं, ‘हमारी रिश्तेदारियां पाकिस्तान और अफगानिस्तान में हैं और रोटी-बेटी का संबंध भी, पर जिन आदिवासी गांवों में वे रहते हैं वहां ईर्ष्या-द्वेष, उठा-पटक और हफ्ता-वसूली चरम पर है। इसलिए उनसे संपर्क करते समय हमें बहुत संभल कर रहना पड़ता है।’ अफगानियों की अपनी आचार-संहिता (‘पख्तो’ या ‘पख्तूनवाडी’) है, जिसका वे बहुत कड़ाई से पालन करते हैं। अपने पारस्परिक विवादों के निबटारे के लिए वे बिरादरी की सयानों की पंचायत ‘जिरगा’ पर निर्भर हैं। अपनों में गरीबों की मदद के लिए १९४२ से उनका ‘अंजुमन-ए-पख्तून’ ट्रस्ट है, पर शहर में अपनी खुद की मस्जिद या स्कूल आदि की कमी उन्हें अखरती है। १९१५ से यहां उनका वाणिज्य दूतावास भी है।