मुंबई की भी बन सकती है आतंकी फिल्म!

शुक्रवार को एक सिरफिरे ने न्यूजीलैंड के वेलिंगटन की दो मस्जिदों में नमाजियों पर अंधाधुंध गोलीबारी की। इस घटना में ४९ लोगों की मौत हो गई। हमलावर द्वारा लोन वुल्फ अटैक की तर्ज पर अंजाम दिए गए इस आतंकी कृत्य का फेसबुक पर लाइव प्रसारण होने से दुनियाभर में हड़कंप मच गया। इस हमले के बाद मुंबईकरों में दहशत है क्योंकि मुंबई हमेशा से आतंकियों के निशाने पर रही है। सुस्त सुरक्षा व्यवस्था को देखकर मुंबईकरों में ये खौफ है कि क्या मुंबई की भी ऐसी ही आतंकी फिल्म बनेगी?
बता दें कि वर्ष १९९३ ब्लास्ट और २००६ लोकल ट्रेनों में हुए शृंखलाबद्ध बम विस्फोटों सहित २६/११ जैसे भीषण आतंकी हमले का दंश मुंबई झेल चुकी है। पुलिस ऐसे हमलों को रोकने और अप्रत्याशित परिस्थितियों से निबटने की हरसंभव कोशिश करती है। फिर भी न्यूजीलैंड जैसा हमला यदि मुंबई में हुआ तो क्या होगा? ऐसी चिंता मुंबईकरों में देखने को मिल रही है। मुंबई के कई उपनगरीय रेल स्टेशन, रेल-बस टर्मिनस, धार्मिक स्थल, भीड़ भरे बाजार और मॉल वाली कई ऐसी जगहें हैं, जहां न्यूजीलैंड की तरह मुंबई की भी आतंकी फिल्म बन सकती है। २६/११ आतंकी हमले पर कसाब एंड कंपनी ने इसकी झलक दिखाई थी।
२६ /११ को समुद्री मार्ग से मुंबई में दाखिल हुए कसाब सहित १० पाकिस्तानी आतंकियों ने मुंबई में सीएसएमटी टर्मिनस, कामा अस्पताल, होटल ताज एवं लियोपोल्ड कैफे में १६६ लोगों का कत्ल कर दिया था। उस समय खुद कसाब और उसके साथी इस्माइल ने सीएसएमटी पर ५८ लोगों को मार डाला था। इतने बड़े आतंकी हमले के बावजूद आज भी मुंबई के रेलवे स्टेशनों एवं टर्मिनसों पर सुरक्षा के कोई खास इंतजाम नहीं किए गए हैं। मुंबई के लगभग कई रेलवे स्टेशनों पर कई ऐसे प्रवेश द्वार हैं, जहां आनेवालों की जांच की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। आरपीएफ, रेलवे पुलिसकर्मी अक्सर सुरक्षा से ज्यादा फेरीवाले व अपंग कोच में सफर करनेवालों की तलाश में लगे नजर आते हैं। जांच के नाम पर यात्रियों के मोबाइल और पर्स की जांच की जाती है, जो कि पुलिसकर्मियों की नीयत पर सवाल उठाती है। हालांकि मुंबई पुलिस आतंकी हमलों को रोकने और निपटने की मुकम्मल तैयारी का दावा करती  है। हाल ही में मुंबई पुलिस के प्रवक्ता मंजुनाथ सिंगे ने ऐसे ही एक सवाल के जवाब में कहा था कि मुंबई पुलिस की तमाम यूनिटें अपने काम में मुस्तैदी से जुटी रहती हैं। पुलिस भीड़-भाड़वाले इलाकों में संदिग्धों पर नजर रखकर तथा लगातार गश्त, नाकाबंदी एवं छापेमारी करके किसी भी अप्रत्याशित घटना को रोकने का प्रयास करती है लेकिन ९३ ब्लास्ट के पीड़ित कीर्ति अजमेरा का कहना है कि मुंबई पुलिस ने अतीत में हुए आतंकी हमलों से कोई सबक नहीं सीखा। अजमेरा के अनुसार मुंबई के समुद्री तटों, हाइवे और रेलवे स्टेशनों पर सुरक्षा के इंतजाम न के बराबर हैं। अजमेरा के अनुसार मानव बल पर निर्भरता से ज्यादा सुरक्षा के तकनीकी इंतजाम पर जोर दिया जाना चाहिए। हाइवे एवं धार्मिक स्थलों पर सीसीटीवी वैâमरे न के बराबर हैं। नाकाबंदी तो होती है लेकिन उनका निशाना शराबी और हेलमेट बगैर दोपहिया वाहन चालक होते हैं। आतंकी वारदातों को अंजाम देने से पहले ऐसी जानकारी निकाल लेते हैं। ऐसे में हम आतंकियों को रोकना तो दूर वारदात के बाद उनकी त्वरित पहचान करने में भी पीछे रह जाते हैं। इसी तरह कई अन्य लोगों ने कहा कि यदि शाम के समय कोई सिरफिरा या आतंकी ऐसा प्रयास करता है तो असंख्य लोग अकाल काल का शिकार हो जाएंगे।