मुंबई पर घमासान

जिस राजकुमारी की शादी ने मुंबई की किस्मत का फैसला किया, वह राजकुमारी इन्फैंटा कैथरीन पहले लुईर्स ेंघ्न्न् की शाही दुल्हन बनने के लिए निर्धारित थी, पर होनी को कौन टाल सकता है। अब उसे एक पुरस्कार के रूप में, एक समझौते की एवज में चार्ल्स को, जो कि उसके देश पुर्तगाल को स्पेन के अतिक्रमण तथा बाहरी डच हमलों से बचाएंगे, सौंप दिया गया। यह विवाह संधि तब सैटल हुई जब लुईर्स ेंघ्न्न् ने व्यक्तिगत रूप से इसमें हस्तक्षेप किया और जब चार्ल्स एक गोपनीय खंड के जरिए डच व स्पेन के खिलाफ पुर्तगीज हितों की रक्षा करने पर सहमत हो गए। यह विवाह संधि यानी गठबंधन क्वीन रीजेंट ऑफ पुर्तगाल लुईसा डी गजमैन के लिए बेहद खुशी का मौका रहा क्योंकि पुर्तगाल अब अपने तेजी से गिरते हुए साम्राज्य की पुनर्प्राप्ति की आशा कर सकता था।
अंग्रेज नरेश के पास भी इस संधि पर दस्तखत करने के लिए एक खास उद्देश्य था। इसके जरिए न केवल भारी दहेज मिल रहा था, बल्कि इसके जरिए स्पेन पर (जो पुर्तगाल को निगल रहा था) लगाम लगाने का बढ़िया मौका भी हासिल हो रहा था। इससे इंग्लैंड को यूरोप में शक्ति नियंत्रण करने में मदद मिलनेवाली थी। संधि यह भी मौका दिला रही थी ईस्ट इंडीज में अंग्रेजी व्यापार को जो डचों से खतरा बढ़ रहा था, उसे भी रोका जा सकता था।
यह एकदम साफ है कि दोनों देशों के सामने खड़ी राजनैतिक अनिवार्यताओं ने विवाह संधि को जन्म दिया। वैसे भी वैवाहिक गठबंधनों ने इतिहास में कई राजनैतिक समस्याओं का समाधान किया है। अब इस खेल के एक हिस्से के रूप में इंग्लैंड को मुंबई रूपी उपहार मिलना था।
संधि अंगीकृत होने के बाद उसे कार्यरूप में परिणत करने की योजना थी। चूंकि मुंबई का सत्तांतरण मुद्दा था लिहाजा संधि का खंड ग्यारह यहां उद्धृत करना सामयिक होगा जिसके अनुसार… ‘पुर्तगाल नरेश अपनी मंत्रि परिषद की सलाह व सहमति से ईस्ट इंडीज में मुंबई बंदरगाह व द्वीप समस्त अधिकार, लाभ व क्षेत्रों तथा समस्त अनुलग्नकों समेत जिसमें सभी प्रकार की आय तथा राजस्व शामिल है, ग्रेट ब्रिटेन के नरेश तथा उनके वारिसों व उत्तराधिकारियों को हमेशा के लिए प्रदान करते हैं। इसके साथ ही बंदरगाह समेत मुंबई द्वीप एवं परिसर की संप्रभुता सभी रॉयल्टी समेत भी पूरी तरह से हस्तगत की जाती है। वे यह भी प्रतिज्ञा करते हैं कि उपरोक्त का यथाशीघ्र शांतिपूर्ण कब्जा ग्रेट ब्रिटेन के नरेश (या उस व्यक्ति को जिसे ग्रेट ब्रिटेन के नरेश इस उद्देश्य के लिए नियुक्त करेंगे) को उनके निजी उपयोग के लिए सौंप दिया जाएगा। इस सत्तांतरण के परिणामस्वरूप उस द्वीप के निवासी अब ग्रेट ब्रिटेन के नरेश तथा उनके कमांड्स, क्राउन, न्यायिक व सरकार के अधीन रहेंगे और उन्हें रोमन वैâथलिक धर्म का पालन करने की आजादी पूर्ववत प्राप्त होगी।’
अंग्रेजों को मुंबई पर कब्जा मिलना एक ऐसे सपने का पूरा होना था, जिसे अंग्रेज सन् १६२७ से देखते आ रहे थे। दरअसल राजा चार्ल्स अंग्रेज व्यापार के विकास व उसके संरक्षण के लिए व्यक्तिगत रूप से गंभीर थे। इसलिए उनके कुछ पैâसले इसी सोच को प्रदर्शित करते थे। सन् १६६१ में उनके द्वारा जो पहला चार्टर ईस्ट इंडिया कंपनी को मंजूर किया गया था, उसका उद्देश्य डच प्रतिस्पर्धा से अंग्रेज व्यापार की सुरक्षा करना भी था। पर आप यह कतई न सोचें कि इस सत्तांतरण के पीछे ईस्ट इंडिया कंपनी का कोई सुझाव या निवेदन था। ईस्ट इंडिया कंपनी के कहने पर ब्रिटेन सरकार ने इस सत्तांतरण को नहीं करवाया था और न ही इसके लिए पुर्तगीज इंडिया के प्राधिकारियों ने लिस्बन में अपनी सरकार पर कोई दबाव डाला था।
सच यह है कि सूरत पैâक्टरी उस समय काफी दबाव का सामना कर रही थी। तत्कालीन मुगल सरकार ने सूरत पैâक्टरी की नाक में दम कर दिया था। इससे आजिज होकर यह सोचा जाने लगा कि अपनी एक स्वतंत्र पैâक्टरी होनी चाहिए। इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने क्रामवेल को सुझाव दिया कि मुंबई सरीखी जगह का अधिग्रहण करने से बात बन जाएगी। क्रामवेल ने यह संदेशा चार्ल्स द्वितीय तक पहुंचाया था। हालांकि इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं, पर ये भी सच है कि मुंबई ईस्ट इंडिया कंपनी की अपेक्षाओं व चाहत पर खरी नहीं उतरती थी। इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस समय मुंबई के अधिग्रहण में कोई रुचि नहीं दिखाई थी।
दहेज में प्राप्त मुंबई रूपी उपहार का लंदन में ठंडा स्वागत हुआ तो लिस्बन में इस पर खुशियां मनाई गर्इं। इसे लिस्बन में इसलिए न्यायसंगत कहा गया क्योंकि इंग्लैंड को अपने साथ मिलाना उस समय की सबसे बड़ी मांग थी। सूरत में रहनेवाला अंग्रेज समुदाय बेहद खुश था क्योंकि उनकी बरसों की तमन्ना पूरी हुई थी पर लिस्बन के पैâसले से गोवा के पुर्तगीज दुखी व संतप्त थे। मुंबई अंग्रेजों को दहेज में दिए जाने के खिलाफ गोवा के पुर्तगीज समुदाय ने विरोध प्रदर्शन भी किया पर उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह दब गई।
मुंबई का सत्तांतरण अंग्रेजों के लिए अच्छा रहा। भले विवाह संधि के जरिए, भले दहेज के रूप में ही सही इंग्लैंड इससे प्रसन्न हुआ लेकिन मुंबई का सत्तांतरण हिंदुस्थान में एंग्लो-पुर्तगीज संबंधों के सबसे खट्टे एपिसोड्स में एक रहा। दोनों देशों पर बंधनकारी संधि की शर्तों के बावजूद हिंदुस्थान में उनके रिश्तों में खटास की शुरुआत मुंबई पर अंग्रेजी कब्जे के साथ हो गई। दोनों एक-दूसरे की जड़ें खोदने लगे और यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक अंग्रेजों ने पुर्तगाल को मुंबई में पूरी तरह से निगल नहीं लिया।