मुंबई पर `समुद्री संकट’

सभी को पता है कि प्रकृति जब अपना विकराल रूप धारण करती है तो हर चीज तहस-नहस हो जाती है। खासकर समुद्र के गुस्से से सब वाफिक हैं। अब कुछ ऐसा ही खतरा मायानगरी मुंबई पर मंडरा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार सदी के अंत तक समुद्री जल का स्तर बढ़ेगा, ऐसे में सबसे अधिक हानि मायानगरी मुंबई को हो सकती है।
दरअसल खबर है कि सदी के अंत में समुद्र का स्तर बढ़ जाएगा। भारतीय तटों पर २.८ फीट तक समुद्र स्तर में बढ़ोत्तरी होगी। स्तर बढ़ने की वजह ग्लोबल वार्मिंग बताई जा रही है। मुंबई समेत पश्चिमी तटीय इलाकों पर इसका असर पड़ना निश्चित है। साथ ही पूर्वी हिंदुस्थान के मुख्य डेलटाज (नदी के मुहाने पर बनी त्रिकोणी भूमि) इसकी चपेट में आ जाएंगी, ऐसे जानकारी शुक्रवार को सरकार ने दी। हैदराबाद स्थित-भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (इंडियन राष्ट्रीय सेंटर ऑफ ओसियन सेवा) के अध्ययन की जानकारी साझा करते हुए सरकार ने लोकसभा में कहा कि मुंबई और अन्य पश्चिम तटों में खिंचाव आएगा। खंबट, गुजरात का कच्छ, कोकण और दक्षिण केरल के कुछ हिस्से समुद्र के स्तर में वृद्धि के लिए कमजोर माने जाते हैं। इन स्थानों पर समुद्र स्तर बढ़ने से सबसे ज्यादा नुकसान इनका ही होगा।
खतरे की घंटी
सागर का स्तर बढ़ने से हिंदुस्थान के खाद्य सुरक्षा पर भी खतरा बढ़ेगा क्योंकि करोड़ों लोग सीधे तौर पर नदी जल प्रणालियों पर निर्भर हैं जो संभावित बाढ़ से प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। समुद्र स्तर वृद्धि होने से नदी प्रणालियों को खतरा होगा, जिससे बाढ़ का भी खतरा बढ़ेगा। बता दें कि इस वर्ष यूनेस्को की रिपोर्ट में चेताया गया था कि केंद्र और दक्षिण हिंदुस्थान २०५० तक पानी की आपूर्ति का भी उच्च स्तर पर सामना करेगा। इसका मतलब ये है कि बारिश, बाढ़ और सुनामी जैसी आपदाओं के कारण देश में जल स्तर बढ़ेगा।
ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए पर्यावरण राज्य मंत्री महेश शर्मा ने कहा कि तटीय भूजल में खारे पानी की मात्रा में अनुमानित वृद्धि हुई है। झीलों के लिए खतरा बढ़ा है और बहुमूल्य भूमि पर भी बाढ़ का खतरा बढ़ा है। हालांकि उन्होंने बाद में कहा कि सरकार देश के तटीय क्षेत्रों और समुदायों की सुरक्षा के लिए सक्रिय कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है।