" /> मुंबई-पुणे की भीड़!, गडकरी की चिंता!!

मुंबई-पुणे की भीड़!, गडकरी की चिंता!!

भविष्य में मुंबई-पुणे की जनसंख्या कम करनी पड़ेगी, ऐसा विचार केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने व्यक्त किया है। वर्तमान में विकास की दृष्टि रखनेवाले गडकरी एक महत्वपूर्ण नेता हैं। बड़ी योजनाओं और परियोजनाओं को साकार करने में उनका कोई सानी नहीं है। बड़े शहरों की जनसंख्या विकास और स्वास्थ्य के मामले में बड़ी बाधा है, इस मुद्दे पर गडकरी ने अपने विचार व्यक्त किए हैं। मुंबई और पुणे की जनसंख्या भविष्य में कम करनी पड़ेगी, यह भविष्य शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे पहले कई बार कह चुके थे। शिवसेनाप्रमुख जब ‘मुंबई को बाहरी लोगों से बचाओ’, ऐसा कहते थे और बाहरी लोगों की घुसपैठ के खिलाफ आवाज उठाते थे तो उन पर जातिवाद, प्रांतवाद तथा अलगाववाद के आरोप लगते थे। मुंबई देश की आर्थिक राजधानी वगैरह है, यह ठीक है। लेकिन उसके पहले ये महाराष्ट्र की राजधानी है। इसलिए मुंबई में बढ़ रही जनसंख्या के संदर्भ में जो वैश्विक अत्याचार और व्यभिचार होता आया है, उस पर संताप व्यक्त करते हुए शिवसेनाप्रमुख ने मुंबई में ‘परमिट’ पद्धति लागू करने की मांग की थी। उस समय केंद्र में वाजपेयी सरकार थी। उस दौरान उत्तर प्रदेश व बिहार के मंत्रियों और नेताओं ने ‘परमिट’ पद्धति पर संसद में हंगामा मचाया था। वाजपेयी सरकार को बचाने के लिए भाजपा की विनती के बाद शिवसेनाप्रमुख ने उस मांग को उस समय स्थगित कर दिया था। यह इतिहास संसद के कागजातों में दर्ज है। गडकरी के कारण वो इतिहास फिर से सामने आया है। मुंबई-पुणे जैसे शहरों में कोरोना का विस्फोट हुआ है। उसका कारण घनी आबादी है। मुंबई-पुणे ही नहीं, दिल्ली, नागपुर, नासिक और संभाजीनगर जैसे शहरों में भी जनसंख्या की समस्या है। इसलिए मुंबई-पुणे की जनसंख्या को कम करना मतलब क्या करना है, इसका रास्ता गडकरी को बताना चाहिए। गडकरी का कहना है कि मुंबई के बाहर स्मार्ट सिटीज और स्मार्ट विलेज जैसी परियोजनाओं को शुरू करना चाहिए। ये अच्छी योजना है लेकिन पूरे देश में ऐसी १०० स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा मोदी सरकार ने की थी। उसमें से कितनी परियोजनाओं की ईंट रखी गई? २५ जून, २०१५ को १०० शहरों के लिए ‘स्मार्ट सिटी मिशन’ कार्यक्रम शुरू हुआ। अब २०२० चल रहा है। स्मार्ट सिटी का १५ प्रतिशत काम भी शुरू नहीं हुआ है। मुंबई, दिल्ली, लखनऊ और कोलकाता जैसे शहरों के बाहर नए शहर बनाने की अच्छी योजना थी। लेकिन योजना घोषणा तक ही सीमित रह गई। महाराष्ट्र में पुणे, नासिक और नागपुर जैसे तीन शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की योजना थी। नागपुर स्मार्ट सिटी परियोजना ३ हजार ३५५ करोड़ की है। नागपुर और पुणे को अब तक कितने पैसे मिले? मुंबई ने देश की जनसंख्या और दिल्ली की तिजोरी का बोझ हमेशा उठाया। लेकिन संकट से निपटने के लिए केंद्र ने मुंबई को कभी उपयुक्त मदद नहीं की। मुंबई की जनसंख्या बढ़ी। उसका भार आखिरकार राज्य सरकार और मुंबई मनपा को ही उठाना पड़ता है। मुंबई वैâसी थी और आज उसकी क्या दशा हो गई है? आज के मुंबई शहर को देखकर यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि एक समय यहां पर जंगल था और जंगली जानवर भी यहां घूमते थे। लेकिन व्यापारी अंग्रेजों ने द्वीप पर कब्जा किया और राज करना शुरू किया। समुद्र किनारे के एक द्वीप (१६७०) और उस द्वीप पर डेढ़-दो हजार कोलियों की बस्ती, घनी झाड़ियां, नारियल और ताड़ के पेड़ ये मुंबई की तस्वीर थी। कोली, आगरी, भंडारी, पांचकलसी, पाठारे-प्रभु ये मूल मुंबईकरों की भूमि आज मराठी लोगों की बजाय बाहरी लोगों की ज्यादा हो गई है। मुंबई की कपड़ा मिलें एक समय यहां का वैभव थीं। मिल मजदूरों की ताकत से महाराष्ट्र को मुंबई और देश को आजादी मिली। मिलें बंद हो गईं। मुंबई का मजदूर आज बाहरी राज्यों का है। कोरोना संकट के बाद मुंबई से करीब सात-आठ लाख मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और ओडिशा आदि राज्यों में लौट गए। पुणे से तीन-साढ़े तीन लाख मजदूर अपने-अपने राज्यों में चले गए। इसलिए मुंबई पुणे की भीड़ थोड़ी कम हुई है। लेकिन अब ये मजदूर फिर से महाराष्ट्र में लौटने लगे हैं। अब तक लगभग डेढ़ लाख मजदूर मुंबई-पुणे में लौट आए हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश और बिहार में मजदूरों के लिए कोई काम ही नहीं है। इसका सीधा कारण यह है कि उन राज्यों में विकास नहीं हो पाया है। उत्तर प्रदेश और बिहार के मुख्यमंत्री कल तक छाती ठोंककर कहते थे ‘हमारे यहां जो मजदूर लौटे हैं, उनको दोबारा बुलाने के लिए इजाजत लेनी पड़ेगी। हम अपने मजदूरों को अपने राज्यों में ही काम देंगे।’ हालांकि ऐसा हो नहीं पाया। मजदूर वर्ग फिर से मुंबई-पुणे की ओर लौट रहा है। मुंबई की भीड़ कुछ ऐसी है। अब इसको कम वैâसे किया जाए? उत्तर प्रदेश व बिहार में मुंबई-पुणे जैसे स्मार्ट शहर बनाए जाएं और वहां रोजगार उपलब्ध होगा तब मुंबई-पुणे की भीड़ कम होगी। केंद्र ने उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों की ओर और दिल्ली जैसे शहरों की ओर ज्यादा ध्यान दिया तो मुंबई-पुणे की भीड़ कम होगी। महाराष्ट्र के विकास का काम हम देख लेंगे। मुंबई-पुणे में होनेवाली भीड़ को कम करने के लिए केंद्र को अन्य राज्यों में रोजगार और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए। तब गडकरी की चिंता दूर होगी। कोरोना की परवाह न करते हुए मुंबई-पुणे में भीड़ बढ़ती जा रही है। कोरोना संकट पर पेट की आग भारी पड़ रही है, इसका मतलब यही है। मुंबई की भीड़ का यही कारण है!