मुंबई में मिलता था कराची पेट्रोल

हिंदुस्थान के तत्कालीन वायसराय लार्ड रिपन ने १९ दिसंबर १८९४ को मुंबई मनपा की आधारशिला रखी, उसके ९ साल बाद यह भव्य इमारत क्रीकशांक व हार्नबी रोड के जंक्शन पर साकार हो गई। १८९७ में बॉम्बे इंप्रूवमेंट ट्रस्ट बना और इसी साल बैलगाड़ी व घोड़ागाड़ी का जमाना लद गया। हिंदुस्थान की सड़कों पर मोटरकार दौड़ने लगी।
मुंबई में यातायात और परिवहन के शुरुआती साधनों में पालका, शिग्राम, रेकला था, बाद में विक्टोरिया आई। सामान खटारा यानी बैलगाड़ी से ढोया जाता था। फिर घोड़ागाड़ी-हॉर्स कोच का भी अपना समय रहा। रेकला से एक मील की दूरी के ३ आने लगते थे जबकि विक्टोरिया से ४ आना। जैसे आज के टैक्सी स्टैंड हैं वैसे विक्टोरिया स्टैंड होते थे। कुलाबा, गेटवे, गिरगांव नाका, भायखला, परेल, लालबाग, नाना चौक, ताड़देव, वरली, पुर्तगीज चर्च आदि २५ जगहों पर विक्टोरिया स्टैंड थे। सन् १८७४ में ट्राम शुरू हुई, १ घोड़ा ट्राम और २ घोड़ा ट्राम के रूप में। मुंबई में पहली मोटरकार आई १९०१ में।
बता दें कि सबसे पहले जर्मनी में साल १८७८ में गोटलिब डेमलर और कार्ल बेंज ने मोटर कार उद्योग की नींव रखी। १८८५ में उन इंजनों का आविष्कार किया गया, जो पेट्रोल से चलते थे। १८८६ में डेमलर ने मोटर कार की खोज की। १८९० में प्रâांस के दो नागरिकों लेवसर और पैनहार्ड ने डेमलर इंजन से चलनेवाले मोटर वाहनों के निर्माण कार्य की शुरुआत की थी। अमेरिकी चार्ल्स डूरेया ने १८९३ में पेट्रोल इंजन से चलनेवाली मोटर कार बनाई।
सन् १८९७ में हिंदुस्थान में पहली कार इं‍पोर्ट की गई थी। तब कारें आमतौर पर अमेरि‍का, ब्रि‍टेन और जर्मनी से इंपोर्ट होती थीं। १९०१ में तीन कर्वड डैश ओल्‍डमोबाइल मॉडल्‍स को इं‍पोर्ट कि‍या गया और उसे मुंबई में टाटा ग्रुप ऑफ इंडस्‍ट्रीज के फाउंडर जमशेदजी टाटा, अटॉर्नी रुस्तम कामा और बॉम्‍बे गैरेज के मालि‍क कावस्‍जी वाडि‍या को बेचा गया।
बहरहाल, मुंबई में १९०७ में इलेक्ट्रिक ट्राम आई और १९२० में डबल डेकर ट्राम चलने लगी। जो लोग अफोर्ड कर सकते थे, वे अपनी कारों या टैक्सी का उपयोग करते थे। मुंबई में टैक्सी २०वीं सदी के शुरू में ही चलने लगी और अब यह एक पहचान बन चुकी है। पर अब ओला, उबेर के दौर में इनका भी सूरज अस्त समझिए। फिर भी बॉलीवुड से लेकर टी शर्टों तक हर जगह काली-पीली नजर आती है। टैक्सी के लिए इस्तेमाल होनेवाली सबसे मशहूर कार पद्मिनी ही थी। इन टैक्सियों का रंग लंदन की काली और न्यूयॉर्क की पीली टैक्सी से लिया गया है।
सन् १९७४ में मुंबई की पहचान काली-पीली को चित्तौड़ की रानी पद्मिनी के सम्मान में `प्रीमियर पद्मिनी’ नाम दिया, जिसने प्रीमियर ऑटोमोबाइल पैâक्ट्री ने फिएट के साथ करार करके मुंबई में इस कार का प्रोडक्शन शुरू किया। ये गाड़ी साठ के दशक में मुंबई की सड़कों पर दौड़ने लगी। दरअसल, तब ट्रांसपोर्ट अथॉरिटीज ने भारी भरकम एंबेसडर के मुकाबले टैक्सी के रूप में पद्मिनी को चुना, जिसकी स्लीक डिजाइन और हल्की कदकाठी मुंबई के संकरे और भीड़-भाड़ वाले रास्तों के लिए मुफीद थी। जल्द ही ये टैक्सी मुंबई की पहचान बन गई। ७० और ८० का दशक इस गाड़ी का स्वर्णिम दौर था।
पद्मिनी कभी अपने कंफर्ट या स्पीड के लिए नहीं जानी गई। पद्मिनी की नीची सीलिंग, सिल्वर रंग के हैंडल- जिन्हें थोड़ी ट्रिक के साथ इस्तेमाल कर गाड़ी को खोला और बंद किया जाता है, इसकी पहचान बने। उदारीकरण के बाद बाजार में नई गाड़ियां आर्इं। साल २००० के बाद पद्मिनी का प्रोडक्शन बंद भी हो गया। २०१३ में सरकार ने प्रदूषण से मुकाबला करने के लिए तय किया कि बीस साल से पुराने वाहन नहीं चलेंगे। बहरहाल हम बात करनेवाले हैं पेट्रोल की। हिंदुस्थान में इस वक्त पेट्रोल की कीमत लगभग ८० रुपए प्रति लीटर है लेकिन कई देश ऐसे भी हैं, जहां पेट्रोल इससे भी ज्यादा महंगा है तो वहीं ऐसे भी कई देश हैं, जहां पेट्रोल की कीमत इससे बहुत कम है। दुनिया में एक ऐसा देश भी है, जहां एक लीटर पेट्रोल एक रुपए से भी कम कीमत में मिल जाता है। यह देश है वेनेजुएला। फिर सऊदी अरब, तुर्कमेनिस्तान अल्जीरिया और मिस्र हैं, जहां पेट्रोल लगभग २५ रुपए प्रति लीटर है जबकि सबसे महंगा पेट्रोल हांगकांग, नॉर्वे, आइसलैंड, ग्रीस और डेनमार्क में मिलता है।
जैसे आज पेट्रोल की कीमतों पर विवाद होता है वैसे एक सदी पहले भी होता था। ४ अक्टूबर १९२० के टाइम्स ऑफ इंडिया का संपादकीय यूं था- ‘मोटरिस्टों के लिए पेट्रोल की कीमतें कंफ्यूज कर देनेवाली हैं। कराची पेट्रोल जो कराची से लाया जाता था, उसकी कीमत सबसे ज्यादा होती थी। फिर कोलकाता पेट्रोल था जो रेलवे से कोलकाता से मुंबई लाया जाता था, उसकी कीमत ज्यादा तो नहीं पर कम भी नहीं होती थी। फिर आम पेट्रोल तो था ही। उस समय आज की तरह पेट्रोल पंप नहीं थे। तकनीक नहीं थी। पेट्रोल सीधे वाहन में नहीं भरा जाता था। ४ गैलन के ड्रम या २ गैलन के टीन में पेट्रोल मिलता था। उसे लेकर कार से गैरेज जाते थे, फिर गैरेजवाला ड्रम या टिन से पेट्रोल गाड़ी की टंकी में भरता था।