मुख्यमंत्री के साक्षात्कार में खोए हुए जवाब, दिल्ली व महाराष्ट्र की राजनीति नए मोड़ पर!

महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ युति होनी चाहिए, ऐसा भाजपा के नेता अब बोलने लगे हैं। राजनैतिक विवशता के कारण उनके ऐसे बयान आ रहे हैं। ‘स्युडो सेक्युलरिस्ट’ लोगों के साथ शिवसेना नहीं जाएगी, ऐसा मुख्यमंत्री फडणवीस ने मुझसे कहा। मुख्यमंत्री के पास कई सवालों के राजनैतिक जवाब नहीं हैं।

भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस समारोह में शिवसेना से युति को बरकरार रखने के लिए आह्वान किया गया। पार्टी के अध्यक्ष श्री अमित शाह ने ऐसा किया। शिवसेना हमारे साथ चाहिए, ऐसा श्री शाह अब कहते हैं तथा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से लेकर भाजपा के सभी नेता अब ‘युति’ की डोर खींचते नजर आ रहे हैं। इसे चमत्कार कहना होगा। यह जादू की छड़ी अचानक कैसे घूमी। यह सवाल सभी के समक्ष उठ रहा है, क्योंकि २०१४ जैसी परिस्थिति अब नहीं रही और २०१९ तक महाराष्ट्र की हवा पूरी तरह बदली हुई होगी। इसलिए हवा के रुख के साथ चलने का यह प्रयास हो सकता है। भारतीय जनता पार्टी को आज शिवसेना के साथ युति चाहिए। बालासाहेब की शिवसेना हिंदुत्ववादी पार्टी के साथ रहेगी। थोथे धर्मनिरपेक्षतावादियों के साथ शिवसेना नहीं जाएगी, ऐसा मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा। अब ये थोथे धर्मनिरपेक्षतावादी कौन हैं? व शिवसेना उनके साथ जानेवाली है, ऐसा भाजपा नेताओं को किसने कहा?
मुख्यमंत्री क्या बोले?
‘लोकमत’ दैनिक के एक समारोह में मुख्यमंत्री श्री फडणवीस से खुलकर वार्तालाप करने का मौका मिला। मुख्यमंत्री ने सभी सवालों के उत्तर दिए लेकिन सरकारी भाषा व आंकड़ेबाजी के प्रेम में वे मोदी जैसे ही साबित हुए। सरकारी भाषा यह सामान्य जनता की भाषा नहीं है। महाराष्ट्र की कानून-व्यवस्था धराशायी हो गई है। महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री हैं लेकिन गृहमंत्री होने के लक्षण दिखाई नहीं देते। इस पर महाराष्ट्र का क्राइम रेट किस तरह से कम हुआ है, इसकी सरकारी आंकड़ेबाजी मुख्यमंत्री ने पेश की लेकिन ४ दिन पहले नगर में दो शिवसैनिकों की हत्या हो गई। उसमें भाजपा व राष्ट्रवादी के दो सहित तीन विधायकों पर हत्या का मामला दर्ज हुआ। महिलाओं के शोषण के मामले बढ़े हैं तथा भीमा-कोरेगांव प्रकरण में महाराष्ट्र जल रहा था। उस समय सरकार कहां खो गई थी। इन सवालों का किसी के पास उत्तर नहीं है। क्राइम रेट कम हो गया मतलब क्या? नगर की हत्या, भीमा-कोरेगांव का दंगा तथा उसके बाद जातियों में विभाजित हुआ महाराष्ट्र ये सब मामले अपराध में नहीं गिने जाते होंगे तो इस पर न बोलना ही उचित होगा।
युति क्यों टूटी?
शिवसेना द्वारा वर्ष २०१४ में अधिक जगह मांगने के कारण ‘युति’ टूटी, ऐसा श्री फडणवीस अब कहते हैं लेकिन वर्ष २०१४ में मोदी की हवा नहीं होती तो भाजपा ने अधिक सीटों की मांग नहीं की होती। शिवसेना राज्य की राजनीति में बड़े भाई की भूमिका में रही। भाजपा की महाराष्ट्र में कोई पहचान नहीं थी। यह पहचान शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने दिलाई लेकिन वर्ष २०१४ में मोदी का उदय हुआ और भाजपा यह पहचान भूल गई। शिवसेना को १५१ सीटें चाहिए थीं इसलिए युति नाकाम हुई लेकिन शिवसेना १५१ से भी ज्यादा सीटों पर महाराष्ट्र में लड़ ही रही थी और प्रत्येक विधानसभा चुनाव में अधिक सीटें मांगने का काम भाजपा करती थी। लोकसभा चुनाव के लिए दोनों के बीच सीटों के बंटवारे का आंकड़ा कभी नहीं बदला लेकिन विधानसभा का आंकड़ा बदलता रहा। वर्ष २०१४ में शिवसेना को १५० से नीचे लाया जाए और पेंच में फांसना ऐसा यह पूरा मामला था। ऐसा भाजपा ने सभी मित्रों के मामले में किया। तेलुगु देशम पार्टी ने अब भाजपा का साथ छोड़ दिया है। वे सरकार व एनडीए दोनों से बाहर निकल गए। उत्तर प्रदेश की कुछ पार्टियां जो भाजपा के साथ हैं वे दूर हो गर्इं। महाराष्ट्र में राजू शेट्टी व उनका शेतकरी संगठन भाजपा का साथ छोड़ चुका है। आज देश में भाजपा का कोई मित्र नहीं बचा। यह पहला सवाल तथा भाजपा अपने दम पर २८० जगह पर बहुमत हासिल करने की स्थिति में है क्या यह दूसरा सवाल। २८० जगह हासिल करने का ५ फीसदी विश्वास भी होता तो भाजपा शिवसेना की खुशामद नहीं करती क्योंकि जिन्होंने मदद की उन्हें खत्म करो और अपनी ताकत पर सत्ता हासिल करो, यही भाजपा का महत्वपूर्ण एजेंडा है। महाराष्ट्र में यह बेकार सिद्ध हुआ।
थोथी धर्मनिरपेक्षता!
शिवसेना हिंदुत्ववादी है इसलिए वह ‘स्युडो सेक्युलरिस्ट’ अर्थात थोथे धर्मनिरपेक्षतावादियों के साथ नहीं जाएगी, ऐसा भाजपा को विश्वास है लेकिन एक शिवसेना छोड़ दें तो भाजपा के मित्रों की सूची में सभी ‘स्युडो सेक्युलरिस्ट’ ही हैं। रामविलास पासवान से लेकर रामदास आठवले तक और ईशान्य के मित्रों से लेकर जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती की पीडीपी तक ये सभी आज भाजपा की ‘मित्र’ पार्टियां हैं। क्या ये सभी हिंदुत्ववादी हैं। सच कहें तो शिवसेना ही हिंदुत्व का एकमात्र राष्ट्रीय चेहरा है और शिवसेना आखिर में हाथ झटक लेगी तो भाजपा का थोथा हिंदुत्व नंगा हो जाएगा। अपनी इज्जत बचाने के लिए शिवसेना का साथ चाहिए व लोकसभा चुनाव में अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकेंगे, यह विश्वास होने के बाद ही शिवसेना को पुचकारा जा रहा है।
…उस समय क्यों चुप रहे?
सत्ता का इस्तेमाल करके शिवसेना को अपमानित करने का जो क्रम विगत साढ़े ३ वर्षों में घटा उसे मुख्यमंत्री व श्री अमित शाह भी रोक नहीं पाए। भाजपा के मुंबई के एक सांसद व मुंबई के अध्यक्ष शिवसेना के बारे में व शिवसेनापक्षप्रमुख के बारे में जिस भाषा में जहर उगलते रहे वो सब मामला ‘ऊपर’ वालों की सहमति के सिवाय हुआ होगा, यह मानने को मैं तैयार नहीं हूं। प्रधानमंत्री मोदी पर ‘सामना’ में टिप्पणी की जाती है, ऐसा इस पर किसी का कहना होगा तो यह पूरी तरह गलत है। सरकार की नीतियों की आलोचना करना यह समाचार पत्रों का कर्तव्य है। कश्मीर समस्या से लेकर नोटबंदी तक तथा महंगाई से लेकर किसानों की आत्महत्या तक कई विषयों पर शिवसेनापक्षप्रमुख बोलते हैं। वर्ष २०१९ में भाजपा की पूरी पराजय होगी तथा प्रधानमंत्री मोदी देश को फंसा रहे हैं, ऐसा श्री चंद्राबाबू नायडू ने अभी कहा और इस पर पूरी भाजपा चुप है।
खोए हुए उत्तर
वर्ष २०१९ में मित्र पक्षों के बगैर भारतीय जनता पार्टी लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाएगी और मजबूत मित्र आज उनके पास नहीं हैं। आंध्र में चंद्राबाबू उन्हें छोड़ गए। जगमोहन की वाई.एस.आर. कांग्रेस के साथ भाजपा हाथ मिलाएगी और जगमोहन भ्रष्टाचार व बेहिसाबी संपत्ति एकत्रित करने के मामले में कारावास भोग चुके आरोपी हैं। इसे वे भूल जाएंगे। महाराष्ट्र में कुछ अलग होने की संभावना नहीं है। मुख्यमंत्री ने ‘लोकमत’ के समारोह में साक्षात्कार के दौरान कहा कि वर्ष २०१९ में भाजपा की ही विजय होगी लेकिन यह संभव नहीं है। भाजपा १७० का आंकड़ा पार नहीं करेगी तथा महाराष्ट्र में अब ६५ से ७० जगहों तक भी नहीं पहुंच पाएगी। मुख्यमंत्री से ‘लोकमत’ के मंच से मेरे द्वारा पूछे गए कई सवालों के उत्तर अंधेरे में ही रहे। उनमें से दो प्रश्न महत्वपूर्ण हैं।
– आपके और श्री अमृता फडणवीस के बैंक खाते में मोदी द्वारा की गई घोषणा के अनुसार १५ लाख रुपए जमा हुए क्या?
मुख्यमंत्री : प्रधानमंत्री कई देशों में घूम रहे हैं और काला पैसा बाहर आ रहा है (मूल सवाल अनुत्तरित ही रहा)।
– आप शिवसेना से युति करनी चाहिए, ऐसा कहते हैं लेकिन जिन्हें गाजे-बाजे के साथ पार्टी में लिया वे श्री नारायण राणे शिवसेना से युति हुई तो भाजपा छोड़ देंगे, ऐसा कहते हैं।
मुख्यमंत्री : आप हमसे सौत के जैसा बर्ताव नहीं किए होते तो राणे को लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
श्री फडणवीस ने राणे को उनकी जगह दिखा दी। राणे बड़े नेता हैं अथवा भाजपा के विस्तार के लिए मदद होगी इसलिए उन्हें भाजपा ने राज्यसभा में सदस्यता नहीं दी, बल्कि शिवसेना को दबाने के लिए दी। फिर भी इन सभी को शिवसेना के साथ युति चाहिए और ‘स्युडो सेक्युलर’ लोगों के साथ शिवसेना नहीं जाए, ऐसा इन्हें लगता है। महाराष्ट्र की राजनीति नए मोड़ पर खड़ी है। हर मोड़ पर यह बदल रही है। वर्ष २०१४ में तेज रफ्तार से छूटी हुई गाड़ियां अब मोड़ पर आकर फंस गई हैं।