मुझ पर तेरी कृपा है माता

तेरे गर्भ में पलकर हे माता
इस धरा पर मैं आई हूं।।
तेरे सीने से लिपट-लिपट कर,
तेरा अमृत मैं पाई हूं।।
मुझ पर तेरी कृपा है माता,
जना है मुझको अपनी कोख से,
तू मेरे जीवन की दर्पण है माता,
मैं उम्रभर तेरी परछाई हूं।।
तेरे उर की गर्मी से,
ऊर्जा मिली है मेरे तन मन को,
तेरी ही कृपा के कारण माता,
मैं भी आज बहन-जाई हूं।।
तेरे आंचल की छाया में,
तिल-तिलकर मैं पली बढ़ी हूं,
आज मैं भी हूं किसी की अर्धांग्निी,
किसी की मां-ताई हूं।।
पुल्कित है मैरा रोम-रोम,
जीवन के इस भवसागर को पाकर,
तेरे ही कारण आज दुनिया के
रिश्ते में, मैं भी समाई हूं।।
भूली नहीं मैं कोई भी वो पल,
जो मैंने तेरे साथ बिताई है,
तेरे संग कितनी ही बार हे माता,
एक ही थाली में खाई हूं।।
दस्तूरे-दनिया के कारण,
आज मैं दूर हूं तेरी नजरों से,
इस संसार में आने के कारण ही,
बेटे-बेटी का सुख पाई हूं।।
बचपन से यौवन तक माता,
आंखों में बसाकर तुने रखा मुझे,
गर्व है आज दुनिया को मुझ पर
मैं दुनिया में तेरी जाई हूं।।

-बिभाषचंद्र मस्ताना, दिवा पूर्व

सार्थक है…
‘धन’ तभी सार्थक है…
जब ‘धर्म’ भी साथ हो।।
सुंदरता तभी सार्थक है…
जब ‘चरित्र’ भी शुद्ध हो।।
‘संपत्ति’ तभी सार्थक है…
जब ‘स्वास्थ्य’ भी अच्छा हो।।
‘मंदिर’ जाना तभी सार्थक है…
जब ‘हृदय’ में भाव हो।।
‘व्यापार’ तभी सार्थक है…
जब ‘व्यवहार’ भी अच्छा हो।।
‘ज्ञानी’ होना तभी सार्थक है…
जब ‘सरलता’ भी साथ हो।।
‘प्रसिद्धि’ तभी सार्थक है…
जब ‘मन अहंकार’ रहित हो।।
‘बुद्धिमता’ तभी सार्थक है…
जब ‘विवेक’ भी साथ हो।।
‘अतिथि’ बनकर जाना तभी सार्थक है..
जब वहां ‘सत्कार’ हो।।
‘परिवार’ का होना तभी सार्थक है…
जब उसमें ‘प्यार’ और ‘आदर’ हो।।
‘रिश्ते’ तभी सार्थक हैं…
जब आपस में ‘विश्वास’ हो।।
-आरडी अग्रवाल ‘प्रेमी’
खेतवाड़ी, मुंबई