मूडीज का मूड

मूडीज इंवेस्टर्स सर्विस ने बीते दिनों प्रमुख भारतीय वित्तीय संस्थानों के जैसे कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एचडीएफसी बैंक, एनएसई एनटीपीसी, की सॉवरेन रेटिंग को कम करने के बाद अपने रेटिंग आउटलुक को ‘स्टेबल’ से डाउनग्रेड कर दिया। वैश्विक रेटिंग फर्म के अनुसार रेटिंग आउटलुक में संशोधन छह वित्तीय संस्थानों तथा बुनियादी ढांचे और बिजली क्षेत्रों में काम करनेवाली कुछ अन्य संस्थानों के लिए था। मूडी ने एक्जिम इंडिया, हीरो फिनकॉर्प, हुडको और आईआरएफसी पर रेटिंग को नकारात्मक किया जबकि बैंक ऑफ इंडिया, वैâनरा बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, सिंडिकेट और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के लिए रेटिंग को अपरिवर्तित रखा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहुत ही विशेष परिस्थितियों के कारण हुआ है। अत: चिंता करने की उतनी जरूरत नहीं है। सरकारी प्रयासों और घोषणाओं के असर तीसरी तिमाही से आने शुरू होंगे। मूडीज ने भी कहा है कि इस परिवर्तन से गवर्नेंस को लेकर कोई विशेष चिंता की बात नहीं है।
मूडीज मानती है कि सुस्त विकास दर और कॉरपोरेट कर में कटौती के चलते राजस्व घटने से राजकोषीय घाटे के मोर्चे पर सरकार को झटका लग सकता है इसीलिए मूडीज ने मार्च २०२० में समाप्त वित्त वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में ३.७ फीसदी राजकोषीय घाटा रहने का अनुमान जाहिर किया जबकि सरकार इसे ३.३ फीसदी अनुमानित कर रही है। मूडीज ने कहा कि भले ही सरकार सुधार पर सुधार कर रही है लेकिन इससे बड़ी मंदी की आशंकाएं और बढ़ गई हैं। आर्थिक विकास में आई लंबी सुस्ती से आय में वृद्धि तो कम हुई लेकिन जीवन स्तर में सुधार से दीर्घावधि में भारी निवेश के लिए संभावित नीतिगत विकल्प खासे सीमित हो गए हैं। हालांकि मूडी के अलावा दो अन्य अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों फिच रेटिंग्स और एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने अभी तक हिंदुस्थान के आउटलुक को स्थिर रखा है।
इधर देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी करके मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में ४.२ फीसदी जीडीपी ग्रोथ रेट का अनुमान लगाया है। इसके साथ ही वित्त वर्ष २०१९-२० के लिए विकास दर का अनुमान ६.१ फीसदी से घटाकर ५ फीसदी कर दिया है। इसके लिए बैंक ने ऑटोमोबाइल की घटती बिक्री, एयर ट्रैफिक मूवमेंट में गिरावट, कोर सेक्टर ग्रोथ का सुस्त होना और निर्माण एवं इंप्रâास्ट्रक्चर सेक्टर में गिरावट को जिम्मेदार ठहराया है। रिपोर्ट में एसबीआई ने पॉलिसी के बारे में सरकार को सुझाया है कि सरकार को इस वक्त टेलीकॉम, पॉवर और एनबीएफसी सेक्टरों में कोई नेगेटिव पॉलिसी लागू करने से बचना चाहिए। एशियन डेवलपमेंट बैंक, वर्ल्ड बैंक, ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट, भारतीय रिजर्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मॉनिटरी फंड जैसी संस्थाएं भी चालू वित्त वर्ष के लिए हिंदुस्थान की जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े कम कर चुकी हैं।
इस वित्तीय वर्ष अप्रैल से सितंबर तक यानी चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में औद्योगिक विकास दर १.३ फीसदी रही। औद्योगिक उत्पादन में ७७ फीसदी से अधिक योगदान करनेवाले मैन्यूपैâक्चरिंग उद्योग में गत महीने उत्पादन ३.९ फीसदी घट गया। पिछले साल की समान अवधि में इस क्षेत्र का उत्पादन ४.८ फीसदी बढ़ा था। अप्रैल-सितंबर छमाही में इस क्षेत्र का उत्पादन महज एक फीसदी बढ़ा। पिछले साल की समान अवधि में इस क्षेत्र की विकास दर ५ फीसदी थी। अप्रैल-सितंबर छमाही में खनन उत्पादन महज एक फीसदी बढ़ा। एक साल पहले की समान छमाही में इस क्षेत्र की विकास दर ३.२ फीसदी थी। बिजली क्षेत्र का उत्पादन २.६ फीसदी गिर गया। एक साल पहले की समान अवधि में इसमें ८.२ फीसदी की बढ़ोतरी रही थी। अप्रैल-सितंबर छमाही में यह क्षेत्र ३.८ फीसदी की दर से बढ़ी थी जबकि एक साल पहले की समान छमाही में इसमें ६.२ फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी।
सरकार को देखना चाहिए था कि निजी निवेश की वृद्धि दर कम हो रही थी, उसी में नोटबंदी ने आर्थिक मंदी को और गति दी। नोटबंदी के सात महीने बाद जल्दी ही सरकार ने जुलाई २०१७ में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू किया। जबकि नकदी-निर्भर अनौपचारिक क्षेत्रवाले छोटे व्यवसायों को इसका अचानक से सामना करना पड़ा और एनबीएफसी की तरलता प्रभावित हुई। इस कारण ओवर-लीवरेज कॉर्पोरेट्स और कमजोर बैंकों की समस्या तेजी से बढ़ने लगी। दिवालिया कानून से जिस सकारात्मक परिणाम की उम्मीद थी, उसकी खबरों ने नकारात्मकता पैâलाने में अधिक भूमिका निभाई है।
मेरा भी मानना है की सिद्धांतत: नोटबंदी एक अच्छी दवा थी, जो वर्षों से जड़ जमाये काले धन को समाप्त कर सकती है लेकिन इस दवा देने के कोर्स का सही तरीके से पालन नहीं हुआ। प्रधानमंत्री की दृढ़ इच्छा के बावजूद तत्कालीन मशीनरी उन्हें सपोर्ट नहीं कर पाई। न तो करेंसी समय से एटीएम में पहुंच पाई और न तो करेंसी ही समय से छप पाई, कई जगह आधी छपी करेंसी छप गई, जिससे काले धन के चोरों को कुछ मोहलत मिल गई, साथ में नेपाल के साथ वहां पर पड़ी भारतीय करेंसी का कोई समझौता न होने से भी कई काले धनवालों को रास्ता मिल गया। नोटबंदी एक अच्छी दवा है या यूं कहें कि वैंâसर की तरह जड़ जमा चुके काले धन की इकोनॉमी के लिए कीमोथेरपी है लेकिन जिस तरह कीमोथेरपी के लिए कुशल डॉक्टर, कुशल प्रशिक्षण, कुशल तैयारी और शरीर के इम्यून सिस्टम की जरूरत होती है वैसी ही कुशल तैयारी, कुशल डॉक्टर और देश के इम्यून सिस्टम की जरूरत थी। सिर्फ यहां एक के निर्णय की जरूरत नहीं थी सर्वांगीण तैयारी की जरूरत थी। अकुशल तैयारी के कारण ही नोटबंदी जैसी दवा के ट्रीटमेंट के बाद भी देश को संभलने में ज्यादा वक्त लग रहा है।
नोटबंदी के डोज से अभी देश अपने आपको अनुकूल कर ही रहा था कि देश को आर्थिक इलाज का दूसरा डोज भी लग गया जीएसटी का। यह नोटबंदी से भी बड़ा इलाज था, जिसमें एक झटके से देश और राज्यों के कई कानून एक कानून में समाहित हो गए और इससे देश के व्यापार का स्वरूप बदल गया। इसे भी सरकार ने उस समय बिना एमनेस्टी के लांच कर दिया और धीरे-धीरे सुधार करते-करते इसे सही पटरी पर ला रही है। देश के व्यापारी नोटबंदी और जीएसटी से अपने आपको संगत में ला ही रहे थे कि देश में एनसीएलटी के मुकदमों की भी संख्या बढ़ने लगी। अब लेनदार अपने बकाया वसूली के लिए एनसीएलटी का दरवाजा खटखटाने लगे और देश की कई कंपनियों के ऊपर उनके समापन का खतरा मंडराने लगा। देश के व्यापारी को लगने लगा कि अचानक से देश के सारे कानून उसके सामने आ के खड़े हो गए हैं।
सिद्धांतत: और कानूनन यह सब सही है लेकिन देश का बृहद व्यापारी वर्ग इसका अभ्यस्त नहीं था, इन सभी सुधारों के डोज के बीच उसे संभलने के लिए भी थोड़ा वक्त चाहिए था। अगर वसूली कानून को सख्त बनाना था तो एक साल से पुराने बकाया को राजकीय बकाया का स्टेटस देकर उसकी वसूली निश्चित ब्याज सहित कर देते और एक समयावधि के बाद नहीं होता तो उसे राजस्व बकाए में ट्रांसफर कर देते। दरअसल सरकार की मंशा पे कोई शक नहीं है, सरकार लगातार निर्णय ले रही है और कोशिश कर रही है लेकिन सरकार की तेजी तथा जल्दबाजी से देश की पुरानी और जड़ जमा चुकी व्यवस्था के परिवर्तन की जो प्रसव पीड़ा है, वो असहय होती जा रही है।
सिद्धांतत: नोटबंदी हुआ, जीएसटी हुआ या एनसीएलटी कानून को सख्त करना हुआ, यह सब अच्छा माना जाएगा लेकिन हिंदुस्थान जैसे विशाल देश में ताबड़तोड़ इस सुधार को लागू कर देना वैसे ही है जैसे ताबड़तोड़ किसी को एक के बाद एक कई एंटी बायोटिक दवाएं खिला देना, वो भी जब मर्ज कई सौ साल पुराना हो। देश को इससे संभलने में वक्त लगेगा लेकिन एक बार संभल गया तो विकास की गति तेज हो जाएगी।